किचन से देविका जी की आवाज जोर-जोर से बोलने की आ रही थी। वे बहू शुचि से किसी बात पर चर्चा कर रही थीं या यों कहो कि अपनी राय उससे मनवाने का प्रयास कर रहीं थीं।
हुआ कुछ ऐसा कि शुचि किचन में भिन्डी की सब्नी बना रही थी। उसकी सब्जी कुछ ज्यादा ही गल कर लसलसी हो जाती थी। उसी बात को लेकर सास बहु में गर्मागर्म बहस चल रही थी। वे एक दूसरे को अपने अपने तरीके को सही ठहरा रही थी तर्क दे दे कर ।
यह इनके घर में आये दिन का किस्सा था। देवकी जी अपने जीवन भर के अनुभव को बहू शुचि के सामने बौना होता नहीं देख पा रहीं थीं और शुचि अपने नये मार्डन तरीके को गलत ठहराये जाने पर गुस्सा होती ।ऐसे ही छोटे-छोटे कामों को लेकर दोनों में मतभेद हो जाते और दोनों जोरजोर से बोलकर अपना अपना पक्ष रखतीं। पिता-पुत्र इस नोंक- झोंक को देख कर आंनद लेते।
आज कढ़ी को लेकर अनबन हो रही थी
कि बेसन ज्यादा डालना या दही।
देविका जी का कहना था वेसन कम दही ज्यादा जबकि शुचि बोल रही बेसन ज्यादा डाल दो तो झट बन जाती है। अपनी बात रखने के बाद दोनों एक दूसरे से उलझ जाती।
फिर देविका जी बोली शुचि दो कप चाय बना ला कुछ स्नेक्स भी ले आना।
शुचि चाय और स्नेक्स ले आई। दोनों सास- बहू बैठ गप्पे मारती हंस-हंस कर चाय का आनंद ले रहीं थीं। यह नित का काम था। दोनों में किसी न किसी
बात को लेकर झडप हो जाती , मतभेद होते किन्तु सब भुला साथ चाय, खाने का दोनों आंनद लेती।
यह एक प्रतिक्रिया थी जो जनरेशन गैप के कारण उपजती थी। देविका जी का उम्रभर का लम्बा अनुभव घर गृहस्थी को सम्हालने का कोई भी परिवर्तन उन्हें चुनौती देता लगता। वहीं शुचि को यह पुराना तरिका लगता और वह मार्डन तरीका अपना कर तुरत-फुरत काम करना चाहती। इस काम में देविका जी का टोकना उसे चुनौती लगता । देविका जी कहतीं जल्दी-जल्दी बनाने से खाने में वह स्वाद नहीं आता जो पारम्परीक तरीके बनाने में आता है
शुचि का तर्क रहता क्या हुआ जो थोडा स्वाद कम हो गया,बन तो जल्दी जाता है।
इतनी बहस के बाद दोनों फिर साथ बैठीं थीं हंस बोल रहीं थीं और चाय का आनंद ले रही थीं ।उन दोनों के बीच मतभेद तो थे किन्तु मनभेद नहीं था सो झट एक हो जीवन का मजा लेतीं एक दूसरे के साथ को इनज्वाय करतीं।
मतभेद होते हुए भी जीवन रस के माधुर्य का रसपान करती वे खुशहाल जीवन व्यतीत कर रहीं थीं।
शिव कुमारी शुक्ला
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