ईर्ष्या मन का एक नकारात्मक भाव हैं जो दूसरों से अपने आपको को कमतर आंकते हुए, मन में उत्पन्न होता है। वैसे तो मानव मन दूसरे के दुःख में दुःख़ी होता है परन्तु जब उसका मन दूसरे के सुख से दुःखी होता है तो उससे ईर्ष्या उत्पन्न होती है। इस विषय पर एक मुहावरा भी प्रचलित है... "छाती पर सांप लोटना (ईर्ष्या होना) इसी प्रकरण पर एक लघुकथा ....
राकेश ने जैसे ही कॉलेज की केन्टीन में कदम रखा तो देखा...रूपा दीपेश के साथ बैठी कॉफी पी रही है और खिलखिलाकर बातें भी कर रही है। उसके मन में ईर्ष्या का बीज अंकुरित हो उठा। राकेश और रुपा पहली कक्षा से बारहवीं तक एक ही विद्यालय में साथ साथ पढें थे और एक ही कॉलोनी में रहते थे। राकेश पढ़ने में होशियार था। रूपा हमेशा पढने में राकेश की मदद लेती थी। दोनों में अच्छी दोस्ती थी। दीपेश उनकी कॉलोनी में कुछ महीने पहले ही रहने आया था। तीनों को प्रवेश एक ही कॉलेज में मिला था। कुछ महीनों में ही दीपेश और रूपा की नजदीकियां बढ़ने लगीं राकेश को यह बिल्कुल रास नहीं आता था। वह अन्तर्मुखी हो गया पढ़ाई में भी उसका मन न लगता था, सो क्लास में भी पीछे रह गया।
कॉलेज के अंतिम वर्ष में दीपेश और रूपा को एक अन्तर्राष्ट्रीय कम्पनी से साक्षात्कार के लिए पत्र आया। दोनों का चुनाव लगभग निश्चित था क्योंकि दोनों ही प्रतिभाशाली विद्यार्थी थे। अपने माता पिता को सरप्राइज देने के लिए दीपेश,रूपा ने अपने घर वालों को साक्षात्कार के विषय में कुछ नहीं बताय़ा। इधर राकेश को कहीं से भी साक्षात्कारपत्र नहीं मिला क्योंकि पढ़ाई में वह काफी पीछे रह गया था।उसे लगता दीपेश, रूपा के बढ़ते कदमों ने उसे पीछे ढकेल दिया है। अब राकेश के सीने पर सांप लोटने लगे....राकेश सोचने लगा...वह इन दोनों को आगे नहीं बढने देगा। साक्षात्कार से एक दिन पूर्व राकेश ने रुपा और दीपेश को अपने घर पार्टी पर बुलाया। तरल पदार्थ में एक ऐसी नशीली दवा दे दी जो दो घण्टे के बाद अपना असर करती और फिर 24 घण्टे तक व्यक्ति गहरी नींद में सोता रहता। दोस्त राकेश के द्वारा शरबत के रूप में ईर्ष्या का विष दिया गया।दीपेश, रूपा अपने अपने घर जाकर सो गये और धीमे ज़हर के कारण 24 घण्टे तक सोते ही रहे। साक्षात्कार का समय बीत चुका था। दोनों के हाथ से एक जानी मानी अंतरराष्ट्रीय कंपनी निकल गई। ईर्ष्यालु मित्र की छाती पर ऐसा सांप लोटा कि उसके फुंकार रूपी विष ने कुछ समय के लिए दीपेश,रूपा का मार्ग अवरुद्ध कर दिया....
स्व रचित मौलिक रचना
सरोज माहेश्वरी पुणे ( महाराष्ट्र)
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