अपनी देवरानी ऊषा की चारों काबिल बेटियों को देखकर सुधा के कलेजे पर साँप लोटने लगते।ईर्ष्या,द्वेष से उसका सर्वांग सुलग उठता। चार-चार बेटों की माँ बन जाने पर सुधा को बहुत घमंड हो गया था।उसे लगता कि भगवान ने उसे चार बेटे देकर चार कंधा देनेवाला भेज दिया है।वह अपने चारों बेटों को हमेशा लोगों की नजरों से बचाने की कोशिश करती।वह अपने चारों बेटों को खुद स्कूल पहुँचाती और लाती।
एक दिन उसकी देवरानी ने कह दिया -" दीदी! मेरी तरह आप भी इन बच्चों को क्यों नहीं स्कूल के लिए रिक्शा या बस करवा देतीं हैं।आपको परेशान भी नहीं होना पड़ेगा।"
बेटों के घमंड में चूर सुधा ने कहा-"ऊषा!तुम्हें क्या पता?तुम्हें तो केवल बेटियाँ ही बेटियाँ हैं!बेटियों को कोई नजर नहीं लगती,नजर तो बेटों को ही लगती हैं।"
जेठानी सुधा की व्यंग्यपूर्ण बातों से ऊषा का मन कसैला और आहत हो उठा।उसने अपने पति को सारी बातें बताई। उसके पति ने कहा -"ऊषा!तुम भाभी की बातों को दिल से लगाकर दुःखी मत हो।अगर उनके लिए चारों बेटे अजूबा हैं,तो मेरी भी बेटियाँ अजूबा और अनमोल हैं!"
सचमुच वक्त के साथ जहाँ ऊषा की चारों बेटियाँ पढ़-लिखकर अच्छी नौकरी कर रहीं हैं,वहीं सुधा के चारों बेटे माँ के अत्यधिक लाड-प्यार के कारण ज्यादा पढ़-लिख नहीं सके और आज अपना गुजर-बसर भी मुश्किल से कर रहें हैं।ऊषा की काबिल बेटियों से जब-जब सुधा का सामना होता है,तो उसके कलेजे पर साँप लोटने लगता है।
सचमुच ईर्ष्या बहुत बुरी बला है।
समाप्त।
लेखिका-डाॅक्टर संजु झा(स्वरचित)
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