माँ का दिल

 


 सुबह -सुबह चाय की प्याली लिए  मैं उपर के कमरे में गई तो देखा चाचीजी अपना सामान बाँध रही थीं। मुझे देखा तो थोड़ी ठिठक गईं। मैंने उन्हें चाय की प्याली पकड़ाते हुए कहा-" चाचीजी यह सुबह -सुबह क्या कर रही हैं। "


वह थोड़ी ठिठक गईं और बोली-" बेटा माँ हूँ न अपनी ही ममता से मैं हार जाती हूँ यह मुझे जीतने ही नहीं देती है। "

"क्या बात है चाचीजी आप पहेली क्यों बुझा  रही हैं  कुछ तो मुझसे कहिये!


वह बोलीं "- बेटा वो देख ना  मोबाइल में मेरे बेटे का मैसेज है और वही पढ़कर मैं विचलित हो गईं हूं ।"


मैंने मोबाइल में देखा उनके बेटे का मैसेज था-

"माँ मैं बहुत बीमार हूँ मुझे स्वस्थ्य देखना चाहती हो तो  आ जाओ प्लीज मना मत करना!"

फोन पर मैसेज देख चाचीजी व्यग्र हो उठीं थीं। माँ जो थीं।

रेलवे-स्टेशन पर बैठे रोते हुए मिली थीं वह मुझे। संयोग से मैं उनके बगल में अपना सामान रख गाड़ी का इंतजार कर रही थी। अचानक मेरी नजर उनपर पड़ी। वह छुपा कर अपने आँचल के कोर से अपनी आँख पोंछ रही थीं। मुझसे रहा नहीं गया और मैं हिम्मत जुटा कर पूछ बैठी-" चाचीजी कोई तकलीफ है क्या?"


"नहीं बेटा, पर इंतजार था कि घर से कोई न कोई तो आएगा। सुबह से शाम हो चला है पर कोई मुझे ढूंढने नहीं आया।"

धीरे -धीरे मैंने उनके रोने का कारण जान लिया। गाड़ी आने वाली थी पर न जाने क्यों उन्हें अकेले छोड़ कर  जाने का मन नहीं कर रहा था । मैंने जल्दबाजी में एक निर्णय लिया और चाचीजी का सामान उठाते हुए बोली-" चाचीजी आप मेरे साथ चलिए मैं आपको छोड़ कर नहीं जा सकती। चाचीजी कुछ समझ पातीं उससे पहले ही मैंने उनका सामान उठा लिया और दूसरे हाथ से उनका हाथ पकड़ कर उठा लिया। छोटे बच्चे की तरह वो मेरे पीछे पीछे आकर मेरे साथ गाड़ी में बैठ गईं। मैं उन्हें लेकर अपने घर आ गई। वो मेरे परिवार के साथ रहने में संकोच कर रही थीं इसीलिए मैंने उन्हें मकान के ऊपर वाले कमरे में रहने के लिए मना लिया। 

लगभग एक साल हो गये तब से अब तक पर कोई उन्हें ढूंढने नहीं आया । कोई बात नहीं नहीं आये, मेरे लिए तो वो माँ के समान हैं। बस हम दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं।


पर आज मैं देख रही थी ,बेटे की तबीयत खराब सुन वह विह्वल होकर  इधर- उधर  चहलकदमी कर रहीं थीं पर कुछ बोल नहीं पा रहीं थीं। मैंने कहा -" चाचीजी आपके बेटे की तबीयत खराब हो गई है आपको जाना चाहिए।"


लेकिन बेटा उसने पत्नी के बहकावे में आकर मुझे घर से निकल जाने के लिए कह दिया था। और जब मैं घर से निकल रही थी तो उसने एक बार भी नहीं रोका ।"


यह कहते हुए चाचीजी की आंखे भर आयी थीं। उन्होंने अपनी आंखों को पोछते हुए कहा मैं किसी भी सूरत में उसके पास नहीं जा सकती।


चाचीजी आप खुद को नहीं रोक पायेंगी आप माँ हैं न! पुरानी बातों को भूल जाइए वैसे भी कहा गया है कि माफ करने वाले का दिल बहुत बड़ा होता है और वह तो आपका बेटा है।


इतना कह कर मैं नीचे अपने कमरे में आ गई ।शाम को चाचीजी नीचे मेरे कमरे में आईं और बोली-" रेणु बेटा  तुम मुझे मेरे बेटे के पास भिजवा दोगी क्या !"


हाँ- हाँ चाचीजी क्यूँ नहीं आप पैकिंग कीजिए मैं आपको लेकर आपके घर चलूँगी।

चाचीजी की आँखें खुशी से चमक उठी उन्होंने मुझे गले से लगा लिया और भरे गले से बोलीं-" बेटा तू भी तो एक माँ है  न  मेरी व्यथा समझ गई थी खग जाने खग की ही भाषा  है ना !"



स्वरचित एवं मौलिक

डॉ अनुपमा श्रीवास्तवा

मुजफ्फरपुर ,बिहार 


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