हैलो दीदी, सुना है आपने उर्मि के रिश्ते के लिए मना कर दिया। इकलौता उच्च शिक्षित लड़का, पिता शहर के सफल कारोबारी व्यवसायी, तीनो ननदों की शादी हो चुकी है और क्या चाहिए, घर परिवार सब कुछ तो अच्छा है फिर..... मधु अपनी बड़ी बहन सुधा से फोन पर पूछ रही थी।
हां सब कुछ अच्छा तो था पर उन लोगों ने पहले ही बता दिया है कि उर्मि को शादी के बाद नौकरी नही करने देंगे। सब तुम ही बताओ भला ये भी कोई बात हुई, मेरी उर्मि ने इतनी ऊंचाई पढ़ाई लिखाई क्या इसीलिए की थी। भई हमारी जिंदगी तो रसोई में रोटियां बनाते ही गुजर गई पर अपनी बेटी को मैं बेहतर जीवन देना चाहती हूं।
सुधा ने दम्भ भरी वाणी में बताया।
लेकिन दीदी आप तो जानती ही है लड़के की माता जी का स्वास्थ्य खराब रहता है बेटियों की भी शादी हो चुकी है तो बहु घर गृहस्थी संभाल ले, यही सोचकर उन्होंने मना किया हो शायद। पढ़ने लिखने का मतलब ये तो नही न कि हम लड़कियों के कर्तव्य बदल जाएं। एक बार शादी हो जाये, तो सास ससुर और पति के दायित्व निभाने के बाद भी करियर फिर से सम्भाला जा सकता है लेकिन सही समय और उम्र निकलने के बाद फिर अच्छे रिश्ते नही मिलते...
अच्छा चलो ठीक है बच्चों के स्कूल से आने का समय हो गया फिर बाद में बात करती हूं... कहकर मधु ने फोन रख दिया।
अब सुधा सोच में थी कि बेटी की उच्च महत्वकांक्षा की चाह में कंही उसने खुद के पैरों पर कुल्हाड़ी तो नही मार ली।
वर्तमान में उच्च शिक्षित लड़कियों के माता पिता अपनी बेटियों को पढ़ा लिखा कर आत्मनिर्भर तो बना रहे हैं। लेकिन कंही न कंही उन्हें पारिवारिक जिम्मेदारियों का बोझ न उठाना पड़े इस आशा में अच्छे अच्छे रिश्तों को ठुकरा कर खुद ही अपने पांव में कुल्हाड़ी मार लेते हैं। बहु ऐसी चाहते हैं जो घर रहकर सेवा करे और बेटी घर से बाहर जाकर अपनी विजय पताका लहराए, समाज का ये दोगला व्यवहार न जाने कब बदलेगा।
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