अरे ,नहीं... नहीं, वो मेरे लड़के के लायक नहीं! क्या कहती हैं आप!! उससे बेटे की शादी करूंगी? हरगिज़ नहीं! रवि की मां ने राधिका जी को बोलने का मौका ही नहीं दिया। जरूरत से ज्यादा ही घमंड पाल रखा है रवि की मां ने। माना रवि सौम्य, सुशील, हैंडसम है और नौकरी भी ऑफिसर ग्रेड की है उस पर से इकलौता संतान, फिर भी...। रवि
के पापा एक सज्जन व्यक्ति हैं और मां उतनी ही नकचड़ी! बेटे की नौकरी क्या हुई दिमाग सातवें आसमान पर। रिश्ते आते रहे पर रवि की मां को कोई जंचती ही नहीं। रवि की बस दिली इच्छा थी,लड़की देखने में भले ही उन्नीस-बीस हो पर पढ़ी -लिखी हो, ढंग की हो। मां को तो सर्वगुण संपन्न हूर की परी चाहिए! जहां भी जिससे मिलती थी, बेटे का ही बखान करती थी। लोग उनसे कटने लगे थे। धीरे-धीरे पूरे शहर में बात आग के धुंए की तरह फैल गई कि वे लड़कियों की छंटनी करती हैं। नतीजा लड़की वाले आते ही नहीं थे! समय भला किसके लिए रुका है कभी! देखते-देखते 5 साल बीत गए। रवि के लायक कोई लड़की मिली ही नहीं। चिंताएं घर करने लगी,। घमंड चूर -चूर हो गया। "अब क्या करें।"रवि की मां सोच में पड़ गई थी। अच्छी-अच्छी लड़कियों को उन्होंने इंकार कर दिया था। रवि के पापा भी चिंता में बीमार हो गए थे।
एक दिन राधिका जी रवि के यहां आ पहुंची। कुछ कहती, इसके पहले ही रवि की मां ने कहा,"बहन, कोई लड़की बताओ, मुझे जल्द रवि की शादी करनी है।"
"क्यों ?नहीं मिली ,तुम्हारे रवि के लायक लड़की??"राधिका जी ने व्यंग में कहा।
"अब आगे कुछ नहीं बोलो बहन, मैंने खुद अपने पांव में कुल्हाड़ी मारी है। बेटा भी मुझे माफ नहीं करेगा। अच्छे -अच्छे रिश्ते मैंने ठुकरा दिये।"कहकर रवि की मां रो पड़ीं थीं....।
संगीता श्रीवास्तव
लखनऊ
स्वरचित, अप्रकाशित।
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