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गच्चा खाना

 आओ दीदी! आपके पैर में तेल लगा दूँ.. हाँ शांता! अच्छे से मालिश कर दे। मेरे पैर बहुत दुःख़ रहे हैं.. तेल लगाकर कपड़े मशीन में डाल देऩा और कल के कपड़े प्रेस करके रख देना। रीमा मैडम ने शांता बाई को झाडू पोंछे को लिए रखा था.. पर ऐसे छोटे मोटे काम रीमा कोई न कोई बहाना करके शांता बाई से करा लेती थी.. शांताबाई भोली भाली  ईमानदार स्त्री थी उसे रीमा मैडम एक दयालु स्त्री लगती थी..

      शांताबाई की दो बेटियां थी जो पढ़ने में कुशाग्रबुद्धि थीं। वह अपनी बेटियों को पढा लिखाकर योग्य बनाना चाहती थी.. शांताबाई के पति का देहांत हो चुका था.. रीमा शांता बाई से हमेशा कहती ं अरे शांता! तू चिंता मत कर । मैंने तुझे झाड़ू पोंछे के लिए रखा है । मेरा छोटा मोटा काम कर दिया कर इसके बदले में तेरे एक्स्ट्रा काम के पैसे मैं अपने पास जमा कर लिया करूँगी.. तेरी बेटी की पढ़ाई के समय वह पैसे काम आ जाएंगे.. शांताबाई रीमा मैडम पर विश्वास कर सिर हिला देती।

       एकदिन शांताबाई बोली.. मैडम! बड़ी बेटी को अच्छे कॉलेज में एडमीशन मिल गया है..  मेरे पास कुछ पैसे तो हैं मेरे एक्स्ट्रा काम के जमा पैसे दे दीजिए मुझे फीस जमा कराने के लिए जरूरत है । रीमा बोली ..शांताबाई! मैं तुम्हारी इस समय कोई मदद नहीं कर सकती.. अभी हमें छुट्टियों में घूमने जाना है।  शांताबाई बोली.. मैडम! आपने ही तो एक्स्ट्रा काम के पैसे अपने पास जमा करने बात कही थी.. मैं रोज तीन घण्टे आपके घर में ज्यादा काम करती रही.. इस उम्मीद से कि जमा पैसे बेटी की पढ़ाई में काम आएँगे।  मेरी मेहनत के पैसे आपके पास जमा हैं उसपर मेरा अधिकार है। रीमा बोली .. थोड़े से काम के कौन पैसे देता है। मैडम! तीन घण्टे और कहीं काम करती, तो कितना पैसा जमा कर लेती है... ऐसा धोखा खाकर मुझे अब आपका काम नहीं करना है कहते हुए शांताबाई भारी मन से चली गई..

       एक दिन सीढ़ियों से गिरने के कारण रीमा की पैर की हड्डी टूट गई, रीमा के पति दो महीने के लिए टूर पर विदेश गए थे.. घर और बच्चों की देखभाल के लिए कोई हेल्पर नहीं मिल रही थी। चार गुने पैसों में एक नई आशाबाई को रखा.. जिसका ध्यान फोन पर अधिक, काम पर कम था।वह एक दिन रीमा से बोली .. मेरी सास बीमार हैं , मुझे कुछ पैसों की जरूरत है। आप मुझे २० हजार रुपये दोगी, तभी मैं काम कर पाऊँगी वरना मुझे अपनी सास को लेकर गांव जाना पड़ेगा। वहां से पैसों का जुगाड़ करना पड़ेगा.. कोई बाई रीमा के घर काम करने को तैयार न थी। मरता क्या न करता.. रीमा को मजबूरी में पैसे देने पड़े..  पैसे लेकर आशाबाई फिर कभी लौटकर नहीं आई.. भोली , सच्ची शांताबाई को गच्चा देने वाली रीमा को आशाबाई से गच्चा खाना मंहगा पड़ा... यही कर्मों का गुणा फल है.. 

       मासूम, ईमानदार, मेहनतकश इंसान की आत्मा से निकली बदुआ और धोखेबाज़ का कर्मफल अवश्य ही उसके सामने आता है... 


स्वरचित मौलिक रचना 

सरोज माहेश्वरी पुणे ( महाराष्ट्र) 


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