एक जख्म बरसों से उसके दिल के एक कौने में समाया हुआ था। वह रिसता था,जब वह देखती कि उसके पति को परिवार की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए कितना परिश्रम करना पड़ता है, या उसकी मित्र नौकरी कर रही है और वह..... । ऐसे समय में परिवार वालो के व्यंग्य बाण 'क्या करती हो दिन भर देखो उसे वह नौकरी करती है, उसके भी दो बच्चे हैं' अच्छा कमाती है, दोनों कमाते हैं शान से रहते हैं, और यहाँ महारानी आराम करती है। ' उस जख्म पर नमक छिड़कने का काम करते। परिवार के लोग तुलना करते समय यह भूल जाते हैं कि उनके घर पर सारे कार्य नौकर चाकर करते हैं, और बच्चों को भुआ और दादी सम्भालती है।मुक्ति एक पढ़ी लिखी समझदार गृहिणी है, मितव्ययी है, सोच समझकर खर्च करती है, बचत करती है, बच्चों को स्वयं पढाती है, अपने कपड़े स्वयं सिलती है, कपड़ो की प्रेस करती है ताकि घर खर्च कम हो।सिर्फ उसके पति अविनाश के प्यार और विश्वास का का मल्हम ही था,जो उसे इस जख्म को सहने की शक्ति देता। मगर आज तो गजब हो गया ,अविनाश ने भी कह दिया मैं अकेला क्या करूँ, तुम भी कुछ कमाई के बारे में सोचो। यह नमक जख्म पर ऐसा लगा कि वह नासूर हो गया। हालांकि यह बात अविनाश के मुंह से अनायास अपनी परेशानियों के कारण निकली थी, उसे इसका अहसास भी हो गया। माफी भी मांगी मगर.... जख्म रिसता रहा और मुक्ति की अपनी आत्मकथा डायरी पर अंकित होती रही, बहते आँसू के साथ लेखनी चलती रही- "मैं मुक्ति बिल्कुल सहज, सरल और साधारण परिवार में पली बढ़ी, पापा की परेशानियों और मॉं की विवशता को बचपन से देखा। हम पॉंच भाई बहिनों का लालन पालन करना, पढ़ाना लिखाना आसान नहीं था। मॉं की साधारण सी दो साड़ी और पापा के फटे जूते मैंने देखे हैं। बचपन से बस एक ही ख्वाब मन में पलता था, कि मैं पढ़-लिख कर आत्मनिर्भर बनूँ, न सिनेमा देखे, न पार्टी पिकनिक में गई। बस एक ही लक्ष्य था पढा़ई का। पापा ने उसमें कोई कमी नहीं रखी। शिक्षिका की नौकरी लग गई। घर की बड़ी बेटी थी, अत:शादी भी जल्दी ही हो गई, ससुराल में नौकरी करना बहुत कठिन था, फिर भी पूरे उत्साह से सारी जिम्मेदारी निभाती, ताने भी सुनती मगर खुश थी कि मैं आत्मनिर्भर हूँ, दोनों मिलकर बच्चों की परवरिश आराम से कर सकेंगे। बच्चों के लिए नौकरी करना चाहती थी, और उनके कारण ही छोड़नी पड़ी। नन्हें राजू के जन्म साथ ही घर में मेरी नौकरी को लेकर बवाल उठ गया, सबने उसे सम्हालने के लिए मना कर दिया, मैंने अविनाश की तरफ आशाभरी नजर से देखा मगर वे भी परिवार के विरूद्ध नहीं जा सके, अगर उनका सहयोग मिलता तो मुझे नौकरी नहीं छोड़ना पढ़ता, और न वह जख्म होता और न कोई उस पर नमक छिड़कता।"लिखते लिखते उसे नींद आ गई। रोने से मन हल्का हो गया, सुबह एक उत्साह के साथ उठी । बच्चे अब बड़े हो गए थे, उसने दृढ़ संकल्प किया कि वह अब फिर से स्कूल में आवेदन देगी और नौकरी करेगी।
प्रेषक-
पुष्पा जोशी
स्वरचित, मौलिक, अप्रकाशित
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