रघु रोते रोते घर आया, घुटने में से खून भी बह रहा था, जैसे ही कांता ने अपने बेटे को देखा तो दौड़ी दौड़ी आई और पूछा " क्या हुआ बेटा...? तब रघु ने कहा " मां हम सब दोस्त खेल रहे थे, तभी बंटी जब हारने लगा तो उसने मुझे बहुत मारा और धक्का दिया तो मैं गिर पड़ा और घुटने में से खून भी निकल आया "
" बेटा तुझे कितनी बार कहा है, उस तरफ खेलने मत जाया कर, उस कॉलोनी में सब अमीर लोग रहते हैं l हमारा उनका क्या मेल, और उनसे जाकर शिकायत भी नहीं कर सकते उनके घरों में काम करके हमारी रोजी-रोटी चलती है पर तू मेरी एक नहीं सुनता...! अब कभी मत जाना उधर चल आ तुझे हल्दी लगा दूं "
उधर बंटी ने अपनी गलती छुपाने के लिए अपनी मां रमा को बताया कि उसे रघु ने आज फिर बहुत मारा और भाग गया तो रामा ने कहा " तू क्यों उन बस्ती वाले बच्चों के साथ खेलता है..? उनसे दूर रहा कर इन लोगों को कोई तमीज नहीं है....! उसकी हिम्मत कैसे हुई मेरे बच्चे को हाथ लगाने की, तू चल मेरे साथ में अभी उनको उनकी औकात बताती हूं "
थोड़ी ही देर में तमतमाती हुई रमा अपने बेटे बंटी को लेकर रघु के घर पहुंच गई और आग बबूला होके कांता को बहुत खरी-खोटी सुनाई " कहा तुम मुझसे तो पंगा लेना मत तुम मुझे जानती नहीं...! मैं क्या कर सकती हूं , दो मिनट में ही इस बस्ती का सफाया करवा सकती हूं.... और जो यह तुम घर घर जाकर झाड़ू बर्तन करती हो ना...वह भी सब छुड़वा दूंगी, समझा लो अपने बेटे को अब कभी उस तरफ नजर नहीं आना चाहिए, इस बार तो माफ कर देती हूं पर आगे से ऐसा हुआ तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा..समझी...!! चल बेटा बंटी "
कांता बेचारी क्या बोलती मजबूरी ने उसके मुंह पर ताला लगा रखा था, और वह सोचने लगी " उल्टा चोर कोतवाल को डांटे " हम गरीब लोगों को शिकायत करने का भी हक नहीं है..., हमारे " जख्मों पर मरहम लगाना तो दूर उल्टे उन पर नमक छिड़क " दिया उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे, उसने रामा से कहा गलती हो गई.....! "रघु अभी बच्चा है, मैं इसे समझा दूंगी अब उस तरफ कभी नहीं जाएगा l
मौलिक एवं स्वरचित
लेखक: रणजीत सिंह भाटिया
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