मेहमानों से सारा घर खचाखच भरा था। बन्ना- बन्नी के गीतों की झंकार से घर गुलजार हो रहा था। मेहंदी और हल्दी का रश्म था। अपूर्व की बहनें उसे मेहंदी लगा रहीं थीं ।खुशी से अनामिका के पैर जमीन पर नहीं थे। इधर से उधर आ -जा रही थी और हंसी-ठिठोली भी कर रही थी।
पूजा अपने कमरे में एक तरफ खामोश बैठी थी। कमरे से गुजरते हुए अपूर्व की दूर के रिश्ते की बुआ उसे देख बोली,"तुम यहीं रहना बहू, सुहागिनों का रश्म हो रहा है, तुम्हें वहां नहीं जाना है, समझी!"पूजा को ऐसा लगा जैसे उसके जख्म पर नमक छिड़क दिया हो बुआ जी ने। उसकी आंखें डबडबा गईं थीं। पूजा के पति को 3 साल पहले कोरोना ने अपने गिरफ्त में ले लिया था और...। मरा मुंह भी नहीं देख पाई थी पति का।
पूजा,अनामिका की छोटी देवरानी थी। पूजा जब कहीं नहीं दिखी तो अनामिका ढूंढते हुए, पूजा के कमरे में आ बोली,"तुम यहां बैठी हो छोटी?चल, मेंहदी लगवानी है।" "नहीं दीदी, मैं कैसे.... मैं तो विधवा....।"
" चूप रह! इसके आगे एक शब्द नहीं!"उसके हाथ पकड़ उसे हॉल में ले गई, और कहा,"पहले पूजा को मेहंदी लगेगी उसके बाद मैं लगवाऊंगी।"
बुआ जी हक्का-बक्का-सा उन्हें देखती हुई बोली,"बड़ी बहू, ये तुम क्या कर रही हो, सुहागिनों के बीच इसका क्या काम?"अनामिका तमतमा गई। "प्लीज बुआ जी, आप चुप हो जाइए। यदि आपको आपत्ति है, तो आप..... इसके आगे मैं कुछ नहीं कहूंगी। एक बात और, मेरे बेटे अपूर्व को हल्दी पहले पूजा लगाएगी,उसके बाद मैं या कोई और।"पूरे हॉल में सन्नाटा छा गया। अपूर्व मन ही मन बुदबुदाया," छोटी मां विधवा हो गईं ,उसमें उनकी क्या गलती ??? क्या वे जीना छोड़ दे? नहीं, बिल्कुल नहीं। सही किया मां ने! बदलाव जरूरी है।
सन्नाटे को तोड़ते हुए, अपूर्व उठा और पूजा को पकड़ ठुमके लगाने लगा माहौल को खुशनुमा बना दिया। जहां बुआ जी ने पूजा के जख्म पर नमक छिड़का वही अनामिका ने पूजा के जिजीविषा को जागृत किया।
संगीता श्रीवास्तव
लखनऊ
स्वरचित, अप्रकाशित।
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