कौरवों के अमर्यादित व्यवहार के कारण पाण्डवों में आक्रोश उमड़ रहा था।दुर्योधन खुद को सत्ता का उत्तराधिकारी मानकर पाण्डवों के साथ सेवकों-सा व्यवहार करता था।अन्य पांडव तो दुर्योधन के दुर्व्यवहार को सहन कर लेते थे,परन्तु भीम दुर्योधन के सामने राज्य का हिस्सेदार के रुप में डटा रहता था।उनका वैमनस्य बढ़ता जा रहा था।
उनके बीच कलह को टालने के लिए घृतराष्ट्र ने यमुना किनारे बसे खांडवप्रस्थ नामक जंगल देकर पांडवों को शान्त करने की कोशिश की।पांडव इस बंजर जंगल पाकर भी खुश थे।भगवान कृष्ण ने पांडवों के सहायतार्थ विश्वकर्मा और मय दानव को भगवान इन्द्र की अमरावती के समान स्वर्ग -सी नगरी बनाने को कहा।
जब यह नगरी बनकर तैयार हुई, तो इसकी सुन्दरता अद्भुत थी।भव्य महलों ,अट्टालिकाओं और प्रासादों से सुसज्जित यह नगरी इन्द्र की अमरावती से मुकाबला करती थी।मयासुर ने इस महल में मयसभा नामक भ्रमित करनेवाला महल बनवाया।जमीन पर कहीं पानी होता था और लगता था कि वहाँ पानी नहीं है और कहीं लगता था कि पानी भरा हुआ है,पर पानी नहीं होता था।
उस भव्य महल के गृहप्रवेश में दुर्योधन पहुँचा।उस खंडहर रुपी जंगल में इतनी विशाल और अद्भुत नगरी देखकर अचंभित हो उठा।वह मन-ही-मन ईर्ष्या से जलभुन बैठा।फिर भी कलेजे को थामकर महल घूमने निकला।महल का वैभव देखकर उसकी आँखें दामिनी के समान चुधियाँ गईं।आगे मय महल में उसे सही जगह पर पानी होने का आभास नहीं होता है और वह पानी से भरे कुंड में गिर जाता है।द्रौपदी उसे देखकर हँसने लगती है और व्यंग्य करते हुए कहती है-'अंधे का पुत्र अंधा।'
एक तो युधिष्ठिर का वैभव और महल देखकर दुर्योधन पहले से जला-भुना था,उसपर द्रौपदी के व्यंग्य ने जख्म पर नमक का काम किया।द्रौपदी की व्यंग्यपूर्ण हँसी ने उसके सीने को तीर की भाँति चीरकर रख दिया।इस अपमान का बदला दुर्योधन ने जुएँ में द्रौपदी को जीतकर भरी सभा में उसको निर्वस्त्र करने की कोशिश की।इसके प्रतिकार स्वरुप पांडवों ने बदला लेने का निश्चय किया और महाभारत जैसा विनाशक युद्ध हुआ।
समाप्त।
लेखिका-डाॅक्टर संजु झा(स्वरचित)
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