निशा के पति के एक निकटतम परिचित आकाश के बेटे दिलीप ने करोना काल में बाहर अपने परिवार के साथ रह रही निशा को फोन करके कहा। आंटी जी, करोना काल में हम किराये का मकान छोड़ कर अपने गांव चले गए हैं। अब मेरी बोर्ड की परीक्षा होने वाली है तो प्लीज़ आप मुझे अपना ऊपर का एक कमरा दे दीजिए, क्यों कि मेरा गांव बहुत दूर पड़ता है और गर्मी में इतनी दूर परीक्षा देना बहुत ही कष्ट मय रहेगा। प्लीज़ आप मुझे अपना ऊपर का एक कमरा दे दीजिए, परीक्षा के बाद मैं कमरा छोड़ कर अपने घर चला जाऊंगा।
निशा ने कहा, लेकिन उसकी चाबी तो मेरे नीचे वाले घर में है, मैं कैसे तुम्हें वो कमरा दे सकतीं हूं। दिलीप गिड़गिड़ाते हुए बोला, प्लीज़, आंटी,कुछ भी उपाय करिए, अन्यथा इस भीषण गर्मी में आते जाते मैं बीमार हो जाऊंगा और मैं फेल हो जाऊंगा। पापा की नौकरी भी छूट गई है, इसलिए हम इतना किराया और बिजली पानी का पैसा नहीं दे पा रहे थे, इसलिए गांव आ गये।
निशा सोच में पड़ गई, लड़का पढ़ने में बहुत तेज था,उसकी जिंदगी ना बर्बाद हो इसलिए उसने कहा, अच्छा बेटा, तुम ताला तोड़ दो, ऊपर चार कमरे में से किनारे वाला एक कमरा ले लो।
उसके कुछ दिन बाद दिलीप का फिर फोन आया, आंटी, मैं ये किनारे वाला रसोई का कमरा ले लूं,आपका इतना खूबसूरत कमरा खाना बनाने से ख़राब हो जाएगा।
ठीक है ले लो।
करोना काल के बाद जब निशा वापस लौट कर आई तो ये देखकर हक्का बक्का रह गई,दिलीप ने चारों कमरे का ताला तोड़ दिया था और उसका पूरा परिवार वहां डेरा जमाये बैठा था। सारे कमरे सामान से भरे हुए थे।
वह बहुत चिल्लाई, तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई,सब कमरों का ताला तोड़ने की। अभी आज ही मेरा घर खाली करो। तुम्हारी परीक्षा हो गई अब सब अपने गांव जाओ।
दिलीप की मां ने सीधे मुंह बिचकाते हुए कह दिया,हम तो अब कहीं नहीं जाएंगे। तो इसका किराया दो। बेशर्मी से बोली,किराए की तो कोई बात ही नहीं हुई थी। तो काहे का किराया? आपने ही तो कहा था,ताला तोड़ कर रहने लगो, तो हम रहने लगे।आप नहीं रहतीं हैं तो आपके घर की रखवाली तो हम ही करते हैं ना।
निशा ने अपना सिर पीट लिया।
बच्चों से कहा तो वो भी बोले, आपने कैसे उनका विश्वास कर लिया, आपने तो अपने ही " पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली" ।।
आज़ तीन साल हो गए पर उन्होंने घर खाली नहीं किया।
सुषमा यादव प्रतापगढ़ उ प्र
स्वरचित मौलिक अप्रकाशित
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