रजत की आदत थी कि पूजा से जरा सी नोंकझोंक हुई नहीं कि वो घर छोड़ने की धमकी देता था। एक रात वो झगड़ कर कुछ घंटों के लिए घर से चला भी गया था, बस पूजा की हालत खराब हो गई थी।
अब वो उसके सामने मुंह खोलने से भी डरती थी कि कहीं वो हमेशा के लिए ही न चला जाए। अगर ऐसा हुआ तो वो अपने छोटे छोटे बच्चों को कैसे पालेगी। यूं ही दस साल बीत गए। दोनों के बीच पति पत्नी का नहीं बल्कि बॉस और एम्प्लॉय का रिश्ता सा बन गया था। पूजा को अपने बच्चों के लिए भी बहुत बुरा लगता था क्योंकि इस माहौल का उनकी परवरिश पर बुरा असर पड़ रहा था।
पर एक दिन रजत जब बहुत ज्यादा चीखने चिल्लाने लगा तो पूजा से बर्दाश्त नहीं हुआ, वो भी उसे जवाब देने लगी। रजत ने उसे चुप करने लिए पुराना हथकंडा अपनाया कि ज़्यादा बकवास की तो मैं मैं घर छोड़ कर चला जाऊंगा । हिम्मत करके पूजा बोली, "बहुत हुआ , रानी का महल तो एक दिन गिरना ही है, तुम्हें जहां जाना है जाओ, मैं पढ़ी लिखी महिला हूँ, अपने बच्चों को नौकरी करके पाल लूंगी।"
रजत को पूजा से इस जवाब की उम्मीद नहीं थी, वो समझ गया कि अब ये धमकी काम नहीं करेगी। क्योंकि वो अच्छी तरह जानता था कि पूजा अपनी व बच्चों की गुज़र बसर अच्छे से कर सकती है और साथ ही ये भी जानता था कि उसका गुजारा भी पूजा के बिना संभव नहीं है।
पूनम अग्रवाल " पँखुरी"
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