मन की उड़ान के कटते पर

 14 साल का गगन छत पर खड़े होकर, उड़ती पतंगों को निहार रहा था।

तभी उसकी मम्मी आवाज लगाती हैं, "नीचे आजा। पढ़ ले,तेरे पापा आने वाले हैं।"

 गगन बेमन से नीचे आकर अपने बंद कमरे में किताब लेकर बैठ गया। लेकिन उसका मन उड़ान पर था, उड़ती पतंग की डोर जैसा।

पापा के डर की वजह से किताबों को हाथ में तो पकड़ लेता किंतु अंदर कुछ नहीं कर पाता। गगन का मन ज्यादा पढ़ने लिखने में नहीं लगता। उसे प्रकृति और खुली हवा, खुला वातावरण बहुत पसंद था।

गगन को फोटोग्राफी का बहुत शौक था। वह खेल में भी काफी अच्छा था।

पर उसके पिता की प्रबल इच्छा थी कि उनका बेटा किसी प्रतिस्पर्धा में पीछे ना रह जाए। रिश्तेदारी के बच्चों से उसके अंक कम ना आ जाए।

उन्होंने जबरदस्ती उसका प्रवेश कोटा की एक महंगी संस्था में करा दिया। गगन का जाने का बिल्कुल भी मन नहीं था। पर पिता के आगे उसकी एक न चली। बेमन से अपने दोस्तों को छोड़कर,कोटा अकेले कमरे में रहने लगा। वहां उसका बिल्कुल भी मन नहीं लग रहा था।

एक महीने बाद उसका हाई स्कूल का रिजल्ट आया। मात्र 50% नंबर से पास हुआ है। छोटा सा मासूम किशोर अपने पापा की,उसके पढ़ाई के प्रति जुनून और प्रतिस्पर्धा से इतना भयभीत हो गया कि उसने अपने कमरे में फांसी का फंदा लगाकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली।

अंधी प्रतिस्पर्धा के बढ़ते जुनून ने एक बच्चे को गलत कदम उठाने पर मजबूर दिया।

गगन की माताजी बिलाप करते हुए कहती हैं कि यह आत्महत्या नहीं है बल्कि एक साइलेंट किलिंग है। सभी की नम आंखों से पानी बह रहा था।

गगन के पिता अपना सिर पीटते हुए बिलाप कर रहे थे। उन्हें बहुत पछतावा हो रहा था। उन्होंने गगन को कोचिंग में भेज कर अपने पाँव में खुद कुल्हाड़ी मार ली। बच्चे की इच्छा का मान ना रखकर सिर्फ अपनी चलाना उनकी सबसे बड़ी भूल थी।

और इस भूल की उन्हें इतनी बड़ी सजा मिली जिसकी कोई भरपाई ना थी।


स्वरचित मौलिक

  प्राची लेखिका

बुलंदशहर उत्तर प्रदेश


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