नीरा कुछ वर्ष पहले अपने बेटे की शादी अमीर घराने में करने के बाद फूली न समाती थी।समाज में घमंड के कारण उसके पैर जमीन पर नहीं पड़ते थे।सभी के सामने बहू के मायकेवालों की अमीरी का बखान करते हुए उसकी जीभ नहीं थकती थी।उसके पति उसे टोकते हुए कहते -"पगली!अभी तो पिक्चर का ट्रेलर ही है,फिल्म चलने तो दो।"
नीरा पति की बातों पर झल्लाते हुए कहती -" आपने कभी मेरी प्रशंसा की है,जो आज इतनी अमीर घराने की बहू लाने पर करोगे?"
नीरा के पति -" मुझे तो मेरे दोस्त की बेटी बहुत पसन्द थी,भले ही वह बहुत अमीर घराने की नहीं थी।उस लड़की का आचार-विचार,सुघड़,सुसंस्कृत आचरण मुझे बहुत पसन्द था।"
नीरा पति से कहती है-" क्या आपने जिन्दगी में कभी ऊँचा उठने की बात सोची?"
अब कुछ समय से वही नीरा बहू के व्यवहार से काफी आहत है।एक दिन बहू ने उनका अपमान करते हुए स्पष्ट शब्दों में कह दिया -" माँ जी!मेरे माता-पिता ने इतना दहेज इसी कारण दिया है कि मुझे न कोई काम करना पड़े और न किसी की बातें सुनने पड़ी।"
नीरा जी के लिए अपमान की सबसे बड़ी बात यह थी कि वहाँ खड़ा उनका बेटा पत्नी की बातों से मूक सहमत नजर आ रहा था।
अब नीरा जी बेटे-बहू के व्यवहार से अंदर-ही-अंदर घुटता रहतीं।उनकी मनःस्थिति को उनके पति अच्छी तरह समझ रहे थे।एक दिन उनका आक्रोश पत्नी पर फूट ही पड़ा और उन्होंने कहा -" अब घुट-घुटकर जियो।पैसे के कारण तुमने मेरे दोस्त की बेटी को नापसन्द कर अपने पैरों में खुद कुल्हाड़ी मार ली।"
नीराजी के पास अब अपनी गल्ती पर पश्चाताप करने के सिवा कुछ नहीं बचा था।उनकी आँखों से दो मोटे आँसू ढ़ुलक पड़े।
समाप्त।
लेखिका-डाॅक्टर संजु झा(स्वरचित)।
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