बच जाती तो....

    हमारी काॅलोनी में सुनंदा नाम की एक महिला की एंट्री हुई तो महिलाओं ने उनका इतिहास-भूगोल खंगालना शुरु कर दिया।पता चला कि पति प्राइवेट बैंक में काम करते हैं।एक बेटा है जो कनाडा में नौकरी करता है।उनके काले-उजले बालों से इतना तो मुझे भी समझ आ गया था कि वो हमउम्र हैं।बस तनिक विलंब न करते हुए एक दिन मैंने उनके घर पर धावा बोल दिया।अचानक एक परिचित महिला को देखकर वो चौंक उठी तो मैंने कहा," अंदर आने को नहीं कहेंगी।"

       " जी- जी..आइये ना..।" उनकी आवाज़ लड़खड़ा गई थी लेकिन चेहरे पर मुस्कान थी।मैंने एक वाक्य में अपना परिचय दिया, उनका परिचय लिया और बोली," हम सात महिलाओं का एक ग्रुप है।एक निश्चित समय पर हम एक-दूसरे के घर पर मिलते हैं और चाय-काॅफ़ी पीते हुए अपने सुख-दुख, देश-समाज की बातें करके अपना मन बहला लेते हैं।आज से आप भी हमारे ग्रुप में शामिल हो गईं।"

      " नहीं-नहीं..मुझे रहने दीजिए...मैं कहाँ...।" वो ना-नुकुर करने लगी लेकिन मैंने उन्हें मना लिया और अपने वाट्सअप ग्रुप में उनका नाम जोड़ दिया।

      स्वभाव से सुनंदा मिलनसार थीं लेकिन उनके कम बोलने की प्रवृत्ति से किसी ने उन्हें घमंडी मान लिया तो कोई उन्हें एटीट्यूड वाली कहती।तब मैंने उन सबसे कहा कि कुछ लोगों का कम बोलने का स्वभाव होता है।औरों की तरह उन्होंने कभी भी बेटे के विदेश में होने की बड़ाई नहीं की बल्कि यही कहती कि विदेश तो बस नाम है..परेशानियाँ तो वहाँ पर भी होती है।

      मेरी बात से वो सभी सहमत हो गईं।एक दिन दिल्ली में काॅलेज़ जाने वाली एक छात्रा के साथ दुर्व्यवहार होने और उसके आत्हत्या करने की घटना सामने आई।सुनकर हमारा तो दिल दहल गया।टेलीविजन के सभी चैनल इस खबर को अपने-अपने तरीके से लोगों तक पहुँचा रहें थें।अगले दिन ही सभी महिलाएँ मेरे घर पर एकत्रित हुईं।हम सभी दुखी थें..सभी का मानना था कि लड़की को आत्हत्या नहीं करना चाहिए...माता-पिता से कहना चाहिए था..जीवन अनमोल होता है..वगैरह-वगैरह।हम सभी बोल रहें थें लेकिन सुनंदा एकदम चुप थी..उन्होंने हाँ- ना भी नहीं कहा था।उस दिन हम में से किसी ने भी हँसी-मज़ाक नहीं किया था।थोड़ी देर बैठकर कोई यह कहकर चला गया कि आज मिस्टर जल्दी आयेंगे तो कोई यह कहकर चला गया कि आज बेटे का हाफ़ डे है।

       सुनंदा का निर्विकार चेहरा मुझे बेचैन किये जा रहा था।जब वो चलने को उद्यत हुई तो मैंने उनका हाथ पकड़कर रोक लिया और पूछा," क्या बात है सुनंदा...आपने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी...।" वह उसी निर्विकार भाव से बोली," क्या प्रतिक्रिया देती..आप लोग तो उसे बचाने की बात कर रहीं थीं।मेरे विचार से तो वह मर गई तो अच्छा ही हुआ।" मेरे कलेजे पर जैसे किसी ने घूँसा मार दिया हो।मन में तो आया कि कह दूँ , बेटी नहीं है ना..माँ की पीड़ा को कैसे समझेंगी।

       किसी तरह से मैंने अपने मन के भावों को छिपा लिया और खुद को संयत करके बोली," लेकिन सुनंदा..उस माँ की पीड़ा...।"

    " को समझती हूँ विभा...आखिर मैं भी तो एक बेटी की माँ हूँ।" कहते हुए उनकी आँखें नम हो आईं।

      " बेटी...।" विस्फारित नेत्रों से मैंने उनकी तरफ़ देखा तो वो बोलीं," हाँ...मेरी एक बेटी भी थी।गाजियाबाद के काॅलेज़ में पढ़ती थी।कम बोलना उसका स्वभाव था लेकिन उसके सहपाठियों ने उसके स्वभाव को उसका एटीट्यूड समझ लिया था।एक दिन उन्हीं में से एक लड़के ने काॅलेज़ कंपाउंड के भीतर ही उसका दुपट्टा छीन लिया..उसके साथ बत्तमीज़ी की तो उसने उस लड़के को थप्पड़ मार दिया।कुछ दिनों के बाद उस लड़के ने अपने दो दोस्तों के साथ...।" सुनंदा चुप हो गई और मैं सन्न रह गई।फिर वो बोली," हम पति-पत्नी भागकर गाजियाबाद पहुँचे।बेटी हमसे लिपटकर रो पड़ी।पुलिस कंप्लेन की लेकिन कोई फ़ायदा नहीं हुआ।वो लड़के अमीरज़ादे थे...हमारी बेटी को ही चरित्रहीन ठहरा दिया।तब हमने बेटी की काउंसिल करवाई..उसे उस ट्राॅमा से बाहर निकाला।वह फिर से काॅलेज़ जाने लगी लेकिन...उसके क्लासमेट उसे देखकर कमेंट पास करते..टीचर-स्टाफ़ उसे घूर-घूरकर देखते रहते।यहाँ तक कि उसकी सहेलियाँ उससे कतराने लीं थीं।उसने अपनी डायरी में लिखा था," मम्मी..जीना बहुत मुश्किल हो रहा है।उस दिन की पीड़ा तो कुछ समय की थी लेकिन अब तो मैं रोज मरती हूँ।"  फिर एक दिन उसने अपने कमरे के पंखे से ही...।" सुनंदा फूट-फूटकर रोने लगी।मैं नि:शब्द थी।उनसे क्या कहूँ...कैसे दिलासा दूँ, समझ नहीं आ रहा था।कुछ देर पहले मैंने उनके बारे में न जाने क्या-क्या सोच लिया, ये सोचकर मुझे आत्मग्लानि हो रही थी।मैंने उन्हें पानी का गिलास दिया और हाथ जोड़कर बोली," सुनंदा, मुझे माफ़ कर दीजिये...अनजाने में मैंने...।"

      " कोई बात नहीं...बस ऐसी घटना सुनती हूँ तो मुँह से निकल जाता है क्योंकि मैं जानती हूँ कि यदि बच गई तो समाज न तो उसे जीने देगा और न ही मरने देगा।" सुनंदा ने एक ठंडी साँस ली और अपने घर चली गई।जाते-जाते उन्होंने मुझे एक कड़वी सच्चाई से रुबरू करा दिया था।

                                विभा गुप्ता

                                 स्वरचित🖋


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