गायत्री की आँखों से आंसू छलक पड़े. यह आंसू दुख के नहीं थे. यह उस बर्फ के पिघलने जैसे थे जो बरसों से उनके सीने में जमी थी. 30 साल की गृहस्थी में आज पहली बार उनके पति ने उन्हें अपने हाथ से निवाला खिलाया था. वह भी तब, जब रसोई में काम बाकी था.
रसोई में एग्जॉस्ट फैन की घरघराहट के बावजूद जुलाई की उमस ने गायत्री देवी के पसीने छुड़ा दिए थे. तवे पर फुलका डालते ही भाप का एक भभका उनके चेहरे पर लगता, लेकिन उनकी उंगलियां मशीनी रफ़्तार से चल रही थीं. आज रविवार था, और मेनू में मटन कोरमा और गरम-गरम फुलके थे. घर में रविवार का मतलब ही होता था—त्योहार जैसा भोजन, और गायत्री के लिए इसका मतलब था—दोपहर के तीन बजे तक रसोई में खड़े रहना.
बाहर डाइनिंग टेबल पर हंसी-मजाक की आवाज़ें आ रही थीं. उनके पति, दीनानाथ जी, और बेटा-बहू खाना खाने बैठ चुके थे.
"माँ, और कितनी देर? भूख से पेट में चूहे दौड़ रहे हैं!" बेटे रोहन की आवाज़ आई.
"बस बेटा, दो मिनट. गरम-गरम ही अच्छी लगेंगी," गायत्री ने पल्लू से माथे का पसीना पोंछते हुए आवाज़ लगाई. उन्होंने जल्दी से घी लगाया और चार रोटियों का कैसरोल लेकर बाहर निकलीं.
डाइनिंग टेबल पर एसी की ठंडक थी, जो रसोई की तपिश के बिल्कुल विपरीत थी. गायत्री ने दीनानाथ जी की थाली में रोटी रखी, फिर रोहन की थाली में. अंत में जब वह नई-नवेली बहू, सौम्या की थाली की ओर बढ़ीं, तो रोहन ने अचानक अपना हाथ सौम्या की थाली के ऊपर रख दिया.
"रहने दो माँ," रोहन ने शांत स्वर में कहा.
गायत्री का हाथ हवा में ही थम गया. "क्या हुआ? सौम्या को भूख नहीं है क्या?"
"भूख तो बहुत तेज़ है माँ," रोहन ने अपनी कुर्सी पीछे खिसकाते हुए कहा, "लेकिन आज नियम बदलेगा."
पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया. दीनानाथ जी ने कोरमे में डूबा हुआ निवाला मुंह तक ले जाते-ले जाते रोक लिया. सौम्या अपनी हथेलियां मलने लगी, उसे शायद अंदाज़ा था कि रोहन क्या करने वाला है, और वह थोड़ी घबराई हुई लग रही थी.
"कैसा नियम?" गायत्री ने आश्चर्य से पूछा, उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि बात क्या है.
रोहन उठा और गायत्री के हाथ से रोटियों का कैसरोल ले लिया. उसने उसे मेज पर रखा और माँ को कंधों से पकड़कर उस कुर्सी पर बिठा दिया जो आमतौर पर खाली रहती थी—जब तक कि सब खा न लें.
"आज आप बनाएंगी नहीं, खाएंगी. और वो भी हमारे साथ," रोहन ने दृढ़ता से कहा.
गायत्री हड़बड़ा गईं. "अरे, यह क्या पागलपन है? तुम्हारे पापा खा रहे हैं, रोटियां ठंडी हो जाएंगी. मुझे जाने दो, अभी दो लोइयां और बची हैं."
वह उठने को हुईं, लेकिन रोहन ने उन्हें वापस बैठा दिया. "माँ, पिछले 28 सालों से मैं देख रहा हूँ. पापा खाते हैं, मैं खाता हूँ, मेहमान खाते हैं. आप बस रोटियां सेंकती रहती हैं. जब तक आप टेबल पर आती हैं, सालन ठंडा हो चुका होता है, रोटियां पसीज जाती हैं और हड्डियां बचती हैं. आज ऐसा नहीं होगा."
दीनानाथ जी ने चश्मा ठीक करते हुए बेटे को देखा. उनकी आँखों में गुस्सा नहीं, बल्कि एक अजीब सा कौतूहल था.
"बेटा, यह हमारे घर का रिवाज नहीं है," गायत्री ने दबी आवाज़ में कहा, उनकी नज़रें अपने पति पर थीं. उन्हें डर था कि कहीं दीनानाथ जी नाराज न हो जाएं. "औरत को सबका पेट भरने के बाद ही सुकून मिलता है."
"यह सुकून नहीं, यह सज़ा है माँ, जिसे आपने कर्तव्य मान लिया है," रोहन ने अपनी थाली गायत्री के सामने खिसका दी. "सौम्या, तुम सर्व करो."
सौम्या, जो अब तक चुप थी, तुरंत उठी. लेकिन इससे पहले कि वह कुछ करती, गायत्री ने उसे रोक दिया.
"नहीं रोहन, यह ठीक नहीं है. सौम्या अभी नई है, वह क्या सोचेगी? और बेटा, मुझे आदत है. मुझे गरम खाने का शौक नहीं है."
"शौक किसे नहीं होता माँ?" रोहन की आवाज़ थोड़ी ऊंची हो गई, फिर उसने खुद को संभाला. "याद है, पिछले हफ़्ते जब हम बाहर रेस्टोरेंट गए थे? वेटर ने सबसे पहले आपको सर्व किया था. तब आपके चेहरे पर जो चमक थी, वो मैंने देखी थी. वहां आपको 'गरम' खाना अच्छा लगा था न? तो अपने ही घर में यह दोयम दर्जा क्यों?"
गायत्री निरुत्तर हो गईं. वह सच था. रेस्टोरेंट में जब उन्हें तवज्जो मिली थी, तो उन्हें बहुत खास महसूस हुआ था. लेकिन घर की चारदीवारी में वह 'गायत्री' नहीं, सिर्फ 'अन्नपूर्णा' बनकर रह जाती थीं. एक ऐसी मशीन जिसे भूख नहीं लगती, जिसे गर्मी नहीं लगती.
तभी दीनानाथ जी ने अपना गला साफ किया. "खें... खें..."
गायत्री का दिल बैठ गया. अब डांट पड़ेगी. वह जानती थीं कि दीनानाथ जी को खाने के बीच में कोई भी नाटक पसंद नहीं था.
दीनानाथ जी ने अपनी थाली से एक रोटी उठाई. उसे तोड़ा, कोरमे में डुबोया और गायत्री के मुंह के पास ले आए.
"खा लो, भाग्यवान. बेटा सही कह रहा है. शायद देर मैंने कर दी समझने में, पर आज शुरुआत यह कर रहा है तो इसे रोकने का हक़ मुझे भी नहीं है."
गायत्री की आँखों से आंसू छलक पड़े. यह आंसू दुख के नहीं थे. यह उस बर्फ के पिघलने जैसे थे जो बरसों से उनके सीने में जमी थी. 30 साल की गृहस्थी में आज पहली बार उनके पति ने उन्हें अपने हाथ से निवाला खिलाया था. वह भी तब, जब रसोई में काम बाकी था.
गायत्री ने कांपते होठों से निवाला खाया. मटन का स्वाद वैसा ही था जैसा वह बनाती थीं, लेकिन आज उसमें 'सम्मान' का नमक घुला हुआ था, जिसने उसे दुनिया का सबसे स्वादिष्ट भोजन बना दिया था.
"लेकिन रोटियां..." गायत्री ने फिर से रसोई की तरफ देखा. पुरानी आदतें इतनी आसानी से नहीं जातीं.
"मैं ले आती हूँ मम्मी जी," सौम्या ने मुस्कुराते हुए कहा.
"बैठो तुम," रोहन ने सौम्या को भी रोक दिया. "आज कोई नहीं उठेगा. जो रोटियां बनी हैं, हम सब मिल-बांट कर खाएंगे. और अगर कम पड़ीं, तो ब्रेड खा लेंगे. लेकिन आज इस टेबल से कोई बीच में उठकर उस भट्ठी में नहीं जाएगा."
उस दोपहर का खाना गायत्री के जीवन का सबसे यादगार खाना बन गया. रोटियां थोड़ी ठंडी हो गई थीं, कोरमा भी गुनगुना रह गया था, लेकिन उस भोजन में जो हंसी-ठिठोली हुई, वह गायत्री ने पहले कभी अनुभव नहीं की थी. वे हमेशा रसोई से कान लगाकर सुनती थीं कि बाहर क्या बातें हो रही हैं, लेकिन आज वह उन बातों का हिस्सा थीं.
खाना खत्म होने के बाद, गायत्री आदत के अनुसार झूठे बर्तन उठाने के लिए उठीं.
"मम्मी जी, आप रहने दीजिए. आज रविवार है. डिशवॉशर का काम रोहन का है," सौम्या ने शरारत से पति की ओर देखा.
"क्या?" रोहन चौंका. "यह कब तय हुआ?"
"अभी. जब तुमने समानता का झंडा उठाया, तो वह सिर्फ खाने तक सीमित थोड़ी रहेगा? बर्तन धोने में भी समानता होनी चाहिए," सौम्या ने हंसते हुए कहा.
गायत्री हंस पड़ीं. खुलकर. बिना मुंह पर पल्लू रखे.
दोपहर ढल चुकी थी. दीनानाथ जी अपने कमरे में झपकी लेने चले गए थे. रोहन और सौम्या अपने कमरे में थे. गायत्री बालकनी में अपनी आराम कुर्सी पर बैठी थीं, हाथ में अदरक वाली चाय का कप था.
आसमान में बादल घिर आए थे. ठंडी हवा चल रही थी. गायत्री ने एक गहरा घूंट भरा. उन्हें याद आया कि शादी के बाद उनकी सास ने उनसे कहा था, "बहू, घर की औरत वह धुरी है जिस पर पूरा परिवार घूमता है. धुरी दिखे या न दिखे, उसे अपनी जगह से हिलना नहीं चाहिए."
गायत्री हिलना नहीं चाहती थीं, लेकिन आज उनके बेटे ने उन्हें बताया कि धुरी होने का मतलब कुचल जाना नहीं होता.
तभी सौम्या पीछे से आई और उनके पास जमीन पर बैठ गई. उसने अपना सिर गायत्री की गोद में रख दिया.
"मम्मी जी, आप नाराज़ तो नहीं हैं न?"
"किस बात से बेटा?" गायत्री ने उसके बालों में उंगलियां फेरते हुए पूछा.
"रोहन ने जो आज किया... मुझे लगा कहीं आपको बुरा न लगा हो कि मैंने आपके अधिकार क्षेत्र में दखल दिया," सौम्या ने संकोच से कहा.
गायत्री मुस्कुराईं. "अधिकार? बेटा, चूल्हे के सामने पसीना बहाना कोई अधिकार नहीं होता, वह तो बेबसी होती है जिसे हम कर्तव्य का नाम दे देते हैं. आज रोहन ने मेरा अधिकार छीना नहीं, बल्कि मुझे मेरा असली अधिकार वापस दिलाया है. एक माँ होने का अधिकार, एक पत्नी होने का अधिकार, और सबसे बढ़कर, एक इंसान होने का अधिकार."
सौम्या ने सिर उठाकर सास की आँखों में देखा. "मुझे डर लग रहा था. मेरी माँ हमेशा कहती थीं कि ससुराल में सबसे बाद में खाना, सबकी सेवा करना. आज जब रोहन ने मुझे रोका, तो मुझे लगा मैं कोई पाप कर रही हूँ."
"यही तो बदलना है, सौम्या," गायत्री ने दूर क्षितिज को देखते हुए कहा. "हम औरतें खुद ही अपनी बेड़ियों की पहरेदार बन जाती हैं. हमें लगता है कि अगर हम त्याग नहीं करेंगी, तो हम अच्छी औरतें नहीं हैं. लेकिन त्याग और शोषण में बहुत बारीक लकीर होती है. आज रोहन ने उस लकीर को गहरा कर दिया."
"पता है मम्मी जी," सौम्या ने कहा, "जब रोहन ने आपको निवाला खिलाने के लिए पापा को मजबूर कर दिया, तो मुझे उस पर इतना प्यार आया कि बता नहीं सकती. जो बेटा अपनी माँ की इज़्ज़त करना जानता है, वह अपनी पत्नी की इज़्ज़त भी हमेशा करेगा."
गायत्री ने सौम्या के माथे को चूम लिया. "हाँ, वह बदल गया है. या शायद, उसने वक्त को बदलते हुए देख लिया है."
शाम को जब दोबारा चाय का वक्त हुआ, तो गायत्री रसोई की तरफ नहीं भागीं. वह बैठी रहीं.
"गायत्री! चाय नहीं मिलेगी क्या?" दीनानाथ जी की आवाज़ आई.
गायत्री उठने ही वाली थीं कि रोहन की आवाज़ आई, "पापा, दो मिनट रुकिए. मैं और पापा मिलकर चाय बनाते हैं. आज 'मेंस डे' है रसोई में."
दीनानाथ जी रसोई के दरवाजे पर खड़े होकर बेटे को देख रहे थे जो भगोने में पानी डाल रहा था.
"तुझे चाय बनानी आती भी है?" दीनानाथ जी ने झिझकते हुए पूछा.
"सीख लूँगा पापा. आखिर आपका ही बेटा हूँ. जब आप 60 साल की उम्र में अपनी पत्नी को अपने हाथ से खाना खिलाना सीख सकते हैं, तो मैं चाय बनाना तो सीख ही सकता हूँ," रोहन ने आँख मारते हुए कहा.
दीनानाथ जी मुस्कुरा दिए. वह अंदर आए और अदरक कूटने वाला दस्ता उठा लिया. "अदरक ज़्यादा डालना, तुम्हारी माँ को कड़क चाय पसंद है."
बाहर बैठी गायत्री ने यह सुना. उनकी आँखों के कोर फिर भीग गए.
यह कहानी सिर्फ एक वक्त के खाने की नहीं थी. यह कहानी उस अनकहे समझौते के टूटने की थी जो सदियों से औरतों को रसोई के धुएं में कैद रखता आया था. आज उस धुएं के पार, गायत्री को एक नई रोशनी दिखाई दे रही थी.
उस रात, डिनर में खिचड़ी बनी. सादी, हल्की खिचड़ी. और उसे बनाने में किसी एक का हाथ नहीं था. रोहन ने चावल धोए थे, सौम्या ने तड़का लगाया था, दीनानाथ जी ने सलाद काटा था और गायत्री... गायत्री सिर्फ वहां खड़ी होकर उन्हें निर्देश दे रही थीं, जैसे कोई महारानी अपने रसोइयों को आदेश देती है.
जब वे सब खाने बैठे, तो गायत्री ने पहला निवाला मुंह में डाला और महसूस किया कि आज़ादी का स्वाद शायद इस सादी खिचड़ी जैसा ही होता है—हल्का, सुपाच्य और सुकून देने वाला.
"अरे वाह, खिचड़ी तो बहुत स्वादिष्ट बनी है," दीनानाथ जी ने तारीफ की.
"होगी ही," गायत्री ने इतराते हुए कहा, "आखिर रेसपी तो मेरी थी."
सब खिलखिला कर हंस पड़े. उस हंसी में घर की दीवारों ने भी साथ दिया, जो अब तक सिर्फ बर्तनों के खटकने की आवाज़ सुनने की आदी थीं. एक नई परंपरा की शुरुआत हो चुकी थी—एक ऐसी परंपरा जहाँ प्यार का मतलब खुद को मिटाना नहीं, बल्कि साथ मिलकर जीना था.
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