बदलते रिश्ते

 चार दिन हुए नीला को मायके आए ...

उसकी भाभी रोज नए-नए पकवान बना-खिला रही है...आखिर ननद इतने सालों बाद जो आई है मगर आज नीला ने भाभी को हटा रसोई पर खुद कब्जा किया था आज वह सबकी पसंद का बनाएगी भी...और खिलाएगी भी ...

अर्सा हुआ मायके की रसोई में घुसे...

“आप ही का है सब ....

बनाइए-खिलाइए …आज हम भी मौज करते है..

” हँसते हुए भाभी रसोई से निकल अपनी सिलाई मशीन लेकर बैठ गई...

खूब रचपचकर भाई की पसंद की खीर ...

आलू की कचौड़ी...

खट्टा-मीठा काशीफल ...

उबले आलू की खूब चटक ,रसेदार तरकारी, बूंदी का चटपटा झन्नाटेदार रायता जिसे गांव में सब सन्नाटा बुलाते ,और गरम-गरम पूड़ियाँ बना रही है रजनी...

सब रस ले लेकर ,उंगलियां चाटते हुए खाए जा रहे है... सबके खाने के बाद रजनी उत्साह से भर उठी है...

हिम्मत कर ,जतन से थाली परोसकर रसोई से निकली।

“भाभी.....सामने छोटे भैया को भी दे आऊं....

छोटी भाभी भी मायके गई हैं ना...

खुद ही बना-खा रहे है...

कहते हुए नीला हिचक गई

“दीदी.... अपने भैय्या से पूछ लीजिए...

कहकर भाभी ने मशीन का चक्का तेजी से घुमा दिया...

थोड़ी देर पहले के भाभी के शब्द नीला के कानों में गूँज उठे -आप ही का है सब ,बनाइए-खिलाइए…...

तभी पीछे से एक गीत के बोल सुनाई देने लगे...

नाजाने कैसे पल मे बदल जाते है

ये दुनिया के बदलते रिश्ते ....

निशब्द  अनिल जैन


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