अनिल ...मोहनभाई कहा चल दिए लंच टाइम मे हेलमेट उठाए....
अनिल-क्यो आज टिफिन नही लाए ?
आओ ना मैंने भी बाहर वाले रेस्टोरेंट से मंगवाया है दोनों भाई साथ खाएंगे...
मोहन - थेंक्यू यार ....
पर वो ..... घर जाऊंगा.... वो यार तेरी भाभी से आजकल गृहयुद्ध चल रहा है और गुस्से मे टिफिन ....
यार अगर मे यहां खा लूंगा ना तो उसे लगेगा मै पूरे दिन भूखा हूं कुछ नही खाया होगा और वो भी पूरे दिन भूखी रहेगी और कुछ नही खाएगी ....
यार ये जो हमारी पत्नियां होती है ना हम से लडती जरूर है और ऐसे दिखाएगी जैसे उन्हें कोई फर्क नही पडता मगर सच तो ये है उन्हें फर्क पड़ता है ...
और वैसे ही हमें भी फर्क पड़ना चाहिए ...
सोच यार वो अपने परिवार को छोडकर हम जैसे अजनबियों के साथ हमारे परिवार के साथ जुड जाती है ...
और वो कहते है ना एक स्त्री की पूरी दुनिया उसके पति से शुरू हो कर उसीपर खत्म होती है
तो मेरे भाई हम कैसे भूल जाए उन्हें....
अनिल मोहन की बातें सुनकर सोच मे पड गया...
आज वो भी तो अपनी बीबी से लडकर आया था आँफिस ....
गुस्से मे ये कहकर की वो बाहर से खा लेगा ...
समय पर काम नही होते उसके....
इसीलिए तो उसने बाहर से आॅडर दिया था लंच का...
अनिल-भाई ...मोहन रुक ...मुझे भी घरतक ड्राप कर दियो यार ...
मोहन-क्यो ...तेरा तो लंच बाहर रेस्टोरेंट से....
अनिल-हां...मगर केंसिल कर देता हूं सचमुच यार ...बहुत कुछ करती है हमारी पत्नियां ...और वो भी तो मेरे बगैर नही खाती कभी ...आज मै भी नही लाया था टिफिन ...
कही वो भी भूखी ना हो ?और छुप छुपकर रो ना रही हो?
नही यार ...मैं भी चलूंगा घर ....
दोनों दोस्त मुस्कराते चल दिए ...
अनिल जैन
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