टैलीफोन की घंटी से सुकुमारने उठाया रिसीवर उठा कर उन्होंने कहा,
हैलो, बाबा, मैं सुब्रत बोल रहा हूं...
‘‘हां बेटा, बोलो सब कैसे है..
‘‘बाबा, हम सब ठीक हैं...
आप की तबीयत कैसी है...
‘‘ठीक ही है, बेटा. अब इस उम्र में तबीयत का क्या है, कुछ ना कुछ लगा ही रहता है. अब तो जिंदगी दवा के सहारे चल रही है. बेटा, बहुत दिन बाद आज मेरी याद आई है....
‘बाबा, क्या करूं....इतनी व्यस्तता हो गई है कि समय ही नहीं मिल पाता. रोज ही सोचता हूं, फोन करूं परंतु किसी न किसी काम में व्यस्तता हो जाती है.’’ ‘‘सच कह रहे हो बेटा. जैसेजैसे तुम्हारी पदोन्नति होगी, जिम्मेदारियां भी बढ़ेंगी और व्यस्तता भी.’’
‘‘मैं सोच रहा था, मां के चले जाने के बाद आप बिलकुल अकेले हो गए हैं. आप की तबीयत भी ठीक नहीं रहती है. हम लोग भी आप से मिलने कभीकभार ही कोलकाता आ पाते हैं. अगर आप ठीक समझें तो कोलकाता का मकान बेच कर आप भी अमेरिका चले आएं. यहां गुडि़या और राज के साथ आप का समय भी कट जाएगा और हम लोग भी आप की ओर से निश्चिंत हो सकेंगे.’’ सुब्रत का प्रस्ताव सुकुमार को ठीक ही लगा. सोचने लगे, ‘नौकरी से रिटायर हुए 10 वर्ष बीत चुके हैं और कितने दिन चलूंगा. किसी दिन आंख बंद हो जाने पर सुब्रत मेरी अर्थी को कंधा भी देने नहीं आ पाएगा.’ लिहाजा सुकुमार ने अपनी सहमति दे दी. सुकुमार ने पेपर में विज्ञापन दे कर मकान का सौदा कर लिया और निश्चित समय पर कोलकाता आ कर सुब्रत ने पैसों का लेनदेन कर लिया. पोस्ट औफिस से एमआईएस और बैंक में जो कुछ सुकुमार ने रखा था, उसको भी सुब्रत ने अपने खाते मे जमा करा लिया. सिवाय PF मे जमा 15 लाख के बेचने के बाद वे लोग अमेरिका जाने के लिए तैयार थे.
निश्चित समय पर वे लोग दमदम एअरपोर्ट पर पहुंच गए. सुब्रत ने कहा, ‘‘बाबा, आप यहां सोफे पर बैठिए. मैं चैकइन कर के आता हूं, फिर आप को ले कर चलूंगा.’’ बहुत देर बाद काउंटल पर पुछा कार्यरत महिला ने यात्रियों की लिस्ट देख कर बताया, ‘‘जी हां, सुब्रत बनर्जी नाम के यात्री ने चैकइन किया था.
अमेरिका की फ्लाइट निकले हुए 1 घंटे से अधिक हो गया है.’’ ‘‘परंतु मैडम, उसी फ्लाइट से तो मुझे भी अमेरिका जाना था. ऐसा कैसे हो सकता है कि मुझे बिना लिए ही फ्लाइट चली गई?’’ ‘‘अंकलजी, जितने भी यात्री उस फ्लाइट में जाने वाले थे, सभी गए हैं. कोई यात्री छूटा नहीं है, अन्यथा हमारी ओर से घोषणा जरूर की जाती है,’’ महिला ने कहा. ‘‘तो क्या मुझे बिना लिए ही सुब्रत अमेरिका चला गया? इस का मतलब तो यह हुआ कि उस ने मेरा टिकट लिया ही नहीं था. यह कैसी जालसाजी है?’’
सुब्रत क्या इतना निष्ठुर हो सकता है, जिस को पढ़ानेलिखाने में हम ने अपने जीवन के सुनहरे दिन न्योछावर कर दिए. हर तरह की कटौती कर के सुब्रत की पढ़ाईलिखाई में कोई भी कमी हम ने नहीं आने दी. लेदे कर सुब्रत हमारा इकलौता बेटा है. मैं और पत्नी हमेशा ही उस की सुखसुविधा का खयाल रखते थे. आज जब मुझे उस के सहारे की जरूरत थी तो वह मुझे बेसहारा छोड़ कर धोखा दे गया.’ सरकार की ओर से छात्रवृत्ति मिलने पर वह आगे की पढ़ाई करने के लिए कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी जाना चाहता था.सुब्रत को बाहर भेजने के चक्कर में सुकुमार ने क्याक्या पापड़ नहीं बेले? किस के सामने हाथ नहीं पसारे दोस्त व भाई से मनमुटाव हुआ
अब इस मुसीबत की घड़ी में किस के पास जाऊं? कौन मुझे सहारा देगा?’ बचपन के दोस्त दीपंकर की याद आई.उसकी बेटी के रिश्ते की मना होने पर नाराज था मै। थोड़ी ही देर पश्चात दीपंकर के घर वे पहुंच गए।दीपंकर ने सुकुमार के कंधे पर हाथ रखते हुए पूछा, ‘‘सुकुमार, क्या बात है? इस तरह जारजार रोए जा रहे हो? यह क्या हालत बना रखी है?‘लो, पहले थोड़ा जल पियो. शांत हो. अब तुम मेरे पास हो, अपने जिगरी दोस्त के पास.’’
‘यार, मैं क्या बताऊं तुझे. इस उम्र में आ कर मैं अपनों के द्वारा ही छला गया. सारी घटना दीपंकर के सामने बयां कर दी. आजकल के बच्चे कितने स्वार्थी हो गए हैं? मांबाप अपने 4 बच्चों को पालपोस कर, पढ़ालिखा कर कामयाब बनाते हैं, परंतु 4-4 बच्चे एक मांबाप की देखभाल नहीं कर सकते. जब उन्हें सहारे की जरूरत होती है तो बच्चे उन के साथ इस तरह का सुलूक करते हैं.’’
इस से अच्छी तो लड़कियां होती हैं, जो पराए घर जा कर भी जीवनभर मांबाप के सुखदुख को बांटने की कोशिश करती हैं.
‘‘दीपंकर, अब मैं क्या करूं, कहां जाऊं? कुछ समझ में नहीं आ रहा है. बेहतर हो मुझे किसी वृद्धाश्रम में भेज दो.’’ ‘‘क्या कह रहे हो, सुकुमार? मेरे रहते तुम्हें वृद्धाश्रम में जाने की जरूरत नहीं है. यहां मैं भी अकेला रहता हूं. शादी के बाद बेटी के पूना चले जाने से मैं भी तो अकेला हो गया हूं. मेरी मदद करने के लिए काजल है, जो चौबीसों घंटे मेरे सुखदुख का खयाल रखती है. अच्छा है, तुम आ गए हो. अब हम दोनों का समय आराम से कट जाएगा. पुरानी बातें हमें जीवन जीने की प्रेरणा देंगी. मुझे उम्मीद है, तुम ना नहीं करोगे.’’
एक दोस्त की सुंदर रचना
अनिल जैन
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