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आसमान पर उड़ना

 निशि बेटा देखो तुम्हारा पार्सल आया है।

हां मम्मी अभी आती हूं।


बेटा क्या तुम्हें ऐसा नहीं लगता कि तुमने शॉपिंग की अति कर रखी है। नौकरी क्या लगी.. तुम तो आसमान पर ही उड़ने लगी।याद रखना अति हर चीज की बुरी होती है आज यह तुम्हारा पांचवां पार्सल है।


मां पता नहीं क्यों आपको तो मेरी हर चीज से ही दिक्कत होती है आपसे मेरी खुशी नहीं देखी जाती।


क्या कह रही हो तुम??? मुझसे तुम्हारी खुशी नहीं देखी जाती??? बोलने से पहले कम से कम एक बार सोच तो लेती कि तुम क्या बोल रही हो और किससे बोल रही हो। मैं तुम्हारी मां हूं और इस दुनियां में सबसे बड़ी शुभचिंतक भी। मैं तुम्हें हमेशा खुश देखना चाहती हूं।


लेकिन इस समय जिस तरह से तुम पैसा उड़ा रही हो न भविष्य में जब कभी तुम्हें पैसे की बहुत जरूरत होगी और तुम्हारा हाथ और बैंक दोनों खाली होंगे तो बहुत पछताओगी तुम।


लेकिन निशि को इस समय ये बातें बिल्कुल अच्छी नहीं लग रही थीं उसे तो लोगों की तारीफें और चाशनी में डूबे हुए शब्द ही सुकून देते थे। जब भी वह ऑफिस जाती तो नया सूट, मैचिंग चप्पलें, मैचिंग ज्वैलरी ही पहन कर जाती। उसको देखकर उसके सहकर्मी रश्क करते और इससे उसको बड़ी खुशी मिलती।


धीरे - धीरे दिन गुजरते जा रहे थे और उसके साथ ही निशि के घर के सारे कबर्ड भी भरते जा रहे थे।


एक दिन अचानक ही घोषणा हो गई कि देश में कोरोना फैलने के कारण लॉक डाउन घोषित किया जाता है अब न तो स्कूल खुलेंगे,न ही ऑफिस और न ही बाजार। सभी शॉक्ड थे पर जान के डर से खामोश थे क्योंकि छूने से भी बीमारी लगने का डर था और एक के साथ सारे परिवार के जीवन का सवाल था।


एक दिन निशि की मां को सर्दी जुकाम के साथ बुखार आया तो सभी शंकित हो गए। जांच कराई तो डर सच साबित हुआ कोरोना ने उन्हें अपनी चपेट में ले लिया था। हालत दिन पर दिन बिगड़ती ही जा रही थी इधर निशि को भी उसकी कंपनी ने अस्थाई तौर पर काम से छुट्टी दे दी थी।


मां को हॉस्पिटल में एडमिट करा दिया गया था पैसा पानी की तरह बह रहा था।उसके पिता निशि की ओर आशा भरी नजरों से देखते कि शायद वह कुछ मदद कर सके पर उसने तो सारा पैसा शॉपिंग में पहले ही फूंक दिया था। तब निशि को लगता कि वह कहीं डूब मरे।


 अलमारियों में भरे कपड़े और दिखावटी सामान उसे मुंह चिढ़ा रहे थे। अपनी बेबसी पर अब वह सिर्फ आंसू ही बहा सकती थी काश उसने मां की बात मानी होती तो आज उसकी मां जीवित होती पर अब तो समय रेत की तरह फिसल गया था आंसू उस नुकसान की भरपाई करने में नाकामयाब थे।


कमलेश राणा 

ग्वालियर


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