स्वाभिमान और स्वतंत्रता का कोई मोल नहीं होता।

 रमाशंकर और गायत्री देवी अपने ही कमरे में कैद होकर रह गए थे। वह कमरा जो 'गेस्ट रूम' था, अब उनका पूरा संसार बन गया था। बाहर ड्राइंग रूम में बैठना उन्हें डर लगने लगा था—कहीं कुशन खराब न हो जाए, कहीं रिमोट गलत दब न जाए, कहीं उनके खांसने से किसी की ज़ूम मीटिंग में बाधा न आ जाए। आलोक अपनी नौकरी और पत्नी के बीच ऐसा उलझा था कि उसे माता-पिता की यह घुटन दिखाई ही नहीं देती थी। वह सोचता था कि उसने उन्हें एसी कमरा, अच्छा खाना और बड़ी गाड़ी की सुविधा दे दी है, तो वे खुश ही होंगे। पर वह यह भूल गया था कि बुजुर्गों को सुविधा से ज्यादा सम्मान और अपनापन चाहिए होता है।

बनारस के दशाश्वमेध घाट के पास उस पुरानी हवेलीनुमा मकान में आज अजीब सी खामोशी और हलचल एक साथ थी। रमाशंकर बाबू अपनी आराम कुर्सी पर बैठे थे, लेकिन आज उनके हाथ में अखबार नहीं था। उनकी नज़रें उस आंगन पर टिकी थीं जहाँ पिछले चालीस सालों से उन्होंने हर सुबह तुलसी को जल चढ़ते देखा था। आज वह आंगन सूना होने वाला था। रमाशंकर और उनकी पत्नी गायत्री देवी ने आखिरकार अपने इकलौते बेटे आलोक के पास मुंबई शिफ्ट होने का फैसला कर लिया था।

आलोक पिछले दस सालों से मुंबई में सेटल था। बड़ी कॉर्पोरेट नौकरी, आलीशान फ्लैट और मॉडर्न लाइफस्टाइल। पिछले महीने जब वह घर आया था, तो उसने ज़िद पकड़ ली थी। "बाबा, अब आप दोनों से यह पुराना घर नहीं संभलता। माँ के घुटनों में दर्द रहता है और आप भी अब रिटायर हो चुके हैं। वहाँ मेरे पास चलिए, सब सुख-सुविधाएँ हैं। कब तक इस धूल-धक्कड़ और पुराने जमाने के तौर-तरीकों में रहेंगे?" गायत्री देवी का मन तो नहीं था, लेकिन बेटे के मोह और बुढ़ापे की लाचारी ने उन्हें हां करने पर मजबूर कर दिया। पड़ोस की मिश्राजी की पत्नी जब विदा करने आईं, तो उनकी आँखों में भी पानी था। "भाभी, अब तो आप बड़े शहर की हो जाएंगी, हमें भूल मत जाना," उन्होंने रुंधे गले से कहा। गायत्री देवी ने मुस्कुराने की कोशिश की, "अरे ऐसा हो सकता है भला? जा रहे हैं क्योंकि बेटा ज़िद कर रहा है, पर मन तो यहीं अटका रहेगा।"

मुंबई का वह सफर रमाशंकर बाबू के लिए किसी दूसरे ग्रह की यात्रा जैसा था। आलोक उन्हें लेने स्टेशन आया था। गाड़ी जब सोसाइटी के गेट के अंदर घुसी, तो रमाशंकर की आँखें फटी रह गईं। पचास मंजिल की इमारत, शीशे के दरवाजे, और हर तरफ वर्दीधारी गार्ड। लिफ्ट से चौबीसवीं मंजिल पर पहुँचते ही ऐसा लगा जैसे वे आसमान में लटक गए हों। फ्लैट का दरवाजा खुला तो सामने आलोक की पत्नी, रिया खड़ी थी। उसने औपचारिकता के साथ पैर छुए और कहा, "वेलकम पापा, वेलकम मम्मी। सफर कैसा रहा?" घर अंदर से किसी फाइव स्टार होटल जैसा था। सफ़ेद संगमरमर का फर्श, दीवारों पर अमूर्त पेंटिंग्स, और मखमली सोफे। रमाशंकर ने अपना पुराना ट्रंक जैसे ही ड्राइंग रूम में रखा, रिया की भवें थोड़ी तन गईं, पर उसने कुछ कहा नहीं। आलोक ने उन्हें उनका कमरा दिखाया। "देखो बाबा, यह गेस्ट रूम अब आपका है। इसमें अटैच बाथरूम है और यहाँ से समुद्र भी दिखता है।"

शुरुआत के कुछ दिन तो नएपन के जादू में बीत गए। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतने लगा, उस चमक-दमक के पीछे की परतें खुलने लगीं। बनारस में रमाशंकर बाबू की सुबह चार बजे उठकर पूजा-पाठ करने की आदत थी। यहाँ पहले दिन ही जब उन्होंने सुबह चार बजे उठकर घंटी बजाई और जोर-जोर से मंत्र पढ़ने शुरू किए, तो थोड़ी देर बाद ही रिया कमरे के बाहर खड़ी थी। "पापा," उसने नींद भरी आवाज़ में कहा, "प्लीज थोड़ा धीरे। हमारी नींद डिस्टर्ब होती है और आलोक को सुबह ऑफिस के लिए फ्रेश माइंड चाहिए होता है। आप मन में भी तो पूजा कर सकते हैं न?" रमाशंकर सकपका गए। उन्होंने घंटी रख दी और बुदबुदाते हुए पूजा समाप्त की। उस दिन के बाद से भगवान को जगाने वाली वह घंटी फिर कभी नहीं बजी।

गायत्री देवी के साथ समस्या रसोड़े में शुरू हुई। उन्हें अपने हाथ का खाना बनाने का शौक था। एक दिन दोपहर में उन्होंने सोचा कि बेटे को उसके पसंद की कढ़ी और हींग वाले आलू बनाकर खिलाती हूँ। उन्होंने उत्साह में चौका संभाला। जैसे ही उन्होंने हींग और मिर्च का तड़का लगाया, पूरे घर में उसकी महक फैल गई। किचन आधुनिक था, चिमनी लगी थी, लेकिन वह देसी तड़के की गंध को पूरी तरह नहीं सोख पाई। रिया अपने लैपटॉप पर कुछ काम कर रही थी, वह दौड़ती हुई किचन में आई और एग्जॉस्ट फैन की स्पीड बढ़ाते हुए बोली, "मम्मी, आप यह क्या कर रही हैं? पूरा घर महक रहा है। हमारे सोफों और पर्दों में यह मसालों की बदबू बस जाएगी। और इतना तेल? हम लोग ऑलिव ऑयल खाते हैं, यह सरसों का तेल हमारे हेल्थ के लिए अच्छा नहीं है। प्लीज, कुक आती है, उसे ही बनाने दिया कीजिए।" गायत्री देवी के हाथ से कड़छी छूटते-छूटते बची। जिस खाने की तारीफ करते आलोक का मुंह नहीं थकता था, आज वह खाना 'बदबू' बन गया था। उन्होंने चुपचाप गैस बंद कर दी।

धीरे-धीरे घर के नियम सख्त होते गए। यह कोई नहीं कहता था कि "यह मत करो", लेकिन हाव-भाव सब बता देते थे। रमाशंकर बाबू को आदत थी कि वे चाय पीते समय कप प्लेट में डालकर सुड़क-सुड़क कर पीते थे। एक शाम आलोक के कुछ दोस्त आए हुए थे। रमाशंकर भी वहीं हॉल में बैठे चाय पी रहे थे। जैसे ही उन्होंने अपनी आदत के अनुसार आवाज के साथ चाय पी, आलोक ने टोक दिया, "बाबा, प्लीज। कम से कम जब गेस्ट हों तो थोड़ा मैनर्स का ध्यान रखा करें। यह आवाज़ बहुत अजीब लगती है।" रमाशंकर का हाथ कांप गया। चाय की एक बूंद उनकी धोती पर गिर गई और एक बूंद उस बेशकीमती इतालवी कालीन पर। रिया ने तुरंत नैपकिन उठाया और कालीन साफ़ करने लगी, उसके चेहरे पर ऐसी घृणा थी जैसे किसी ने वहां गंदगी फैला दी हो। रमाशंकर बिना चाय पूरी किए उठकर अपने कमरे में चले गए। उस रात उन्होंने खाना नहीं खाया।

अब स्थिति यह हो गई थी कि रमाशंकर और गायत्री देवी अपने ही कमरे में कैद होकर रह गए थे। वह कमरा जो 'गेस्ट रूम' था, अब उनका पूरा संसार बन गया था। बाहर ड्राइंग रूम में बैठना उन्हें डर लगने लगा था—कहीं कुशन खराब न हो जाए, कहीं रिमोट गलत दब न जाए, कहीं उनके खांसने से किसी की ज़ूम मीटिंग में बाधा न आ जाए। आलोक अपनी नौकरी और पत्नी के बीच ऐसा उलझा था कि उसे माता-पिता की यह घुटन दिखाई ही नहीं देती थी। वह सोचता था कि उसने उन्हें एसी कमरा, अच्छा खाना और बड़ी गाड़ी की सुविधा दे दी है, तो वे खुश ही होंगे। पर वह यह भूल गया था कि बुजुर्गों को सुविधा से ज्यादा सम्मान और अपनापन चाहिए होता है।

एक दिन रविवार की बात है। घर में बड़ी पार्टी थी। रिया ने बताया कि आलोक के बॉस और कुछ बड़े क्लाइंट्स आने वाले हैं। सुबह से ही घर की सजावट चल रही थी। दोपहर में रिया, गायत्री देवी के पास आई और एक साड़ी उनके हाथ में थमाते हुए बोली, "मम्मी, शाम को यह पहन लीजिएगा। आपकी वह सूती साड़ियाँ थोड़ी... मतलब, हमारे क्राउड के हिसाब से ठीक नहीं लगतीं। और हाँ, पापा से कहियेगा कि शाम को जब मेहमान आएं, तो ज्यादा बात न करें। उन्हें इंग्लिश समझ नहीं आती और फिर वह गाँव-देहात के किस्से सुनाने लगते हैं, लोग बोर हो जाते हैं।" यह बात तीर की तरह गायत्री देवी के दिल में चुभ गई। वह साड़ी हाथ में लिए सुन्न खड़ी रह गईं। मतलब अब उन्हें अपने ही बेटे के घर में, अपनी पहचान छुपानी पड़ेगी? उन्हें 'सजाकर' कोने में बिठाया जाएगा ताकि वे बेटे के स्टेटस सिंबल में बाधा न बनें?

शाम को पार्टी शुरू हुई। रमाशंकर और गायत्री देवी एक कोने में सोफे पर बैठे थे, जैसे कोई शोपीस हों। वेटर उनके पास ड्रिंक्स और स्टार्टर्स ला रहे थे। सब कुछ विदेशी, सब कुछ अनजान। आलोक अपने दोस्तों के साथ हंसी-ठिठोली कर रहा था। तभी आलोक के बॉस ने रमाशंकर बाबू की तरफ इशारा करते हुए पूछा, "सो आलोक, ये तुम्हारे पेरेंट्स हैं? वे यहाँ परमानेंट शिफ्ट हो गए?" आलोक ने जवाब दिया, "हाँ सर, अब वहां अकेले कैसे रहते। यहाँ हम हैं न देखभाल के लिए। वैसे भी ओल्ड एज में पेरेंट्स को बच्चों की तरह ट्रीट करना पड़ता है, उन्हें क्या पता मॉडर्न वर्ल्ड के बारे में।" सब हंस पड़े। रमाशंकर बाबू ने भी मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन अंदर कुछ टूट गया था। वह 'पिता' जो कभी उस बेटे की उंगली पकड़कर चलना सिखाता था, आज उसी बेटे के लिए एक 'जिम्मेदारी' और 'नासमझ बच्चा' बन गया था।

अगली सुबह, नाश्ते की मेज पर सन्नाटा था। रमाशंकर बाबू ने अपनी चाय का कप नीचे रखा और गला साफ किया। "आलोक, बेटा," उन्होंने शांत स्वर में कहा। आलोक मोबाइल में व्यस्त था, "हूँ, बोलिए बाबा।"

"हम सोच रहे हैं कि अब हमें वापस बनारस चले जाना चाहिए," रमाशंकर ने कहा।

आलोक और रिया दोनों चौंक गए। "अचानक? क्या हुआ बाबा? कोई तकलीफ है यहाँ?" आलोक ने मोबाइल रख दिया।

"तकलीफ? नहीं बेटा, यहाँ तो स्वर्ग जैसी सुख-सुविधा है," रमाशंकर ने एक फीकी मुस्कान के साथ कहा, "लेकिन समस्या यह है कि स्वर्ग में रहने के लिए इंसान को मरना पड़ता है। और हम अभी ज़िंदा हैं।"

रिया ने बात संभालने की कोशिश की, "पापा, आप कैसी बातें कर रहे हैं? लोग क्या कहेंगे कि बेटा-बहू ने निकाल दिया?"

गायत्री देवी ने पहली बार बीच में बोला, "लोगों का क्या है बहू? लोग तो तब भी कहेंगे जब हम यहाँ घुट-घुट कर मरेंगे। देखो बेटा, तुम लोगों की दुनिया अलग है, हमारी अलग। तुम्हारी दुनिया में हम 'आउटडेटेड' फर्नीचर की तरह हैं जो जगह तो घेरता है पर सजावट से मेल नहीं खाता। हमें हमारा वह पुराना घर, वह मोहल्ला और वह आज़ादी प्यारी है जहाँ हम अपनी मर्ज़ी से हंस सकते हैं, खा सकते हैं और जी सकते हैं।"

आलोक ने उन्हें रोकने की बहुत कोशिश की, भावनात्मक दलीलें दीं कि वे बुढ़ापे में कैसे रहेंगे, कौन देखभाल करेगा। लेकिन इस बार रमाशंकर बाबू का फैसला अटल था। उन्होंने कहा, "बेटा, देखभाल सिर्फ शरीर की नहीं होती, मन की भी होती है। यहाँ हमारा शरीर तो स्वस्थ रहेगा, पर मन बीमार पड़ जाएगा। और जिस घर में बाप को बेटे के सामने बोलने से पहले सोचना पड़े, वह घर 'अपना' नहीं हो सकता।"

दो दिन बाद, रमाशंकर और गायत्री देवी वापस उसी ट्रेन में थे। लेकिन इस बार उनका चेहरा उदास नहीं था। एक अजीब सी चमक और सुकून था उनके चेहरों पर। जैसे ही ट्रेन बनारस स्टेशन पर रुकी, कुली की आवाज़, चाय वालों की पुकार और शहर का शोर उन्हें संगीत जैसा लगा। घर पहुँचकर जब ताला खोला, तो आंगन में सूखे पत्ते बिखरे थे और हर तरफ धूल थी। लेकिन रमाशंकर बाबू ने गहरा सांस लिया और गायत्री देवी से कहा, "सुन रही हो गायत्री? यह धूल की महक? यह हमारे अपनी मिट्टी की महक है।"

शाम को उन्होंने अपनी पुरानी आराम कुर्सी आंगन में डाली। गायत्री देवी ने अपनी पसंद की अदरक वाली चाय बनाई और जोर से रेडियो चला दिया। पड़ोस से मिश्राजी की पत्नी दौड़ी-दौड़ी आईं, "अरे भाभी! आप लोग वापस आ गए? मन नहीं लगा वहाँ?"

गायत्री देवी ने चाय की चुस्की लेते हुए हंसकर कहा, "मन तो बहुत लगा बहन, पर वहां 'हम' नहीं थे। वहां हम सिर्फ मेहमान थे। और मेहमाननवाजी चार दिन अच्छी लगती है, ज़िन्दगी भर नहीं। यह अपना घर है, यहाँ राजा भी हम हैं और प्रजा भी हम।"

उस रात रमाशंकर बाबू और गायत्री देवी चैन की नींद सोए। न एसी की ठंडक थी, न मखमली गद्दे, लेकिन जो सुकून अपनी छत के नीचे था, वह पचास मंजिल की ऊंचाई पर भी मयस्सर नहीं था। उन्होंने समझ लिया था कि स्वाभिमान और स्वतंत्रता का कोई मोल नहीं होता। बच्चों का जीवन उनका अपना है, और माता-पिता का जीवन उनका अपना। दो पीढ़ियों का प्यार दूर रहकर जितना गहरा होता है, कभी-कभी एक छत के नीचे आकर उतना ही दमघोंटू हो जाता है। उन्होंने तय कर लिया था कि जब तक हाथ-पांव चल रहे हैं, वे अपने इसी 'खंडहर' में ही रानियों और राजाओं की तरह जिएंगे, किसी के आलीशान पिंजरे में कैद होकर नहीं।

मंजू ओमर


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