नीलू 40की उम्र मे पहली शादी मे अनिल जैसा साथी पाकर खुश थी लाल जोड़े में सजी नीलू रोमांचित हो उठी. अनिल, जो आज के पहले मेरी नहीं थी. पता है नीलू पहली बार मैं ने जब तुम्हें देखा था तभी मुझे लगा कि तुम्हीं मेरे जीवन की पतवार हो और अगर तुम मुझे नहीं मिलतीं तो शायद मेरा जीवन अधूरा ही रहता,
उस रात नीलू के जीवन के पतझड़ का अंत हो गया था. शायद 40 साल के कठिन संघर्ष का अंत हुआ था.
नीलू और अनिल दोनों खुश थे, बहुत खुश. एकदूसरे को पा कर उन्हें दुनिया की तमाम खुशियां नसीब हो गई थीं.
प्यार और खुशी में दिन कितनी जल्दी बीत जाते हैं पता ही नहीं चलता. देखते ही देखते 1 साल बीत गया और आज नीलू की शादी की पहली सालगिरह थी. दोनों के दोस्तों के साथ उन के घर वाले भी शादी की सालगिरह पर आए थे.
घर में अच्छीखासी रौनक थी. घरआंगन बिजली की रोशनी से ऐसा सजा था जैसे घर में शादी हो.
नीलू के घर वालों ने जब यह साजोसिंगार देखा तो उन का मुंह खुला का खुला रह गया और छोटी बहन जया अपनी मां से बोली, ‘‘मां, दीदी को इतना सबकुछ करने की क्या जरूरत थी. अरे, शादी की सालगिरह है, कोई दीदी की शादी तो नहीं.’’
नीलू की मां बोलीं, ‘‘हमें क्या, पैसा उन दोनों का है, जैसे चाहें खर्च करें.’’
‘‘मां बेटी. तेरा जीवन तो सुखमय हो गया, पर प्रिया और सचिन के बारे में सोच कर रोना आता है. उन दोनों बिन बाप के बच्चों का क्या होगा?’’
‘‘मां, तुम ऐसा क्यों सोचती हो. मैं हूं न, उन दोनों को देखने वाली. तुम्हारे दामादजी भी बहुत अच्छे हैं. मैं जैसा कहती हूं वह वैसा ही करते हैं. जब मैं ने एक बहन की शादी कर दी तो दूसरी की भी कर दूंगी. और हां, सचिन की भी तो अब इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी हो गई है.’’
‘‘हां, पूरी हो तो गई है, लेकिन कहीं नौकरी लगे तब न.’’
‘‘मां, तुम घबराओ नहीं, हम कोशिश करेंगे कि उस की नौकरी जल्दी लग जाए. शादी को 1 साल बीत गया लेकिन दोनो का प्यार थोड़ा भी कम नहीं हुआ, बल्कि पहले से और बढ़ गया है मां
‘‘प्रिया का एम.ए. में दाखिला करवाना है. अगर 5 हजार रुपए दे देतीं तो बेटी, उस का दाखिला हो जाता.’’
‘‘ठीक है मां, मैं किसी से पैसे भिजवा दूंगी.’’
‘‘नीलू, ज्यादा फुजूलखर्ची मत किया कर.’’
‘‘मां, तुम्हें तो पता है कि मैं ने बचपन से ले कर 40साल पहले तक कितना संघर्ष किया है. जब पिताजी का साया हमारे सिर से उठ गया था तब से ही मैं ने घर चलाने, खुद पढ़ने और भाईबहनों को पढ़ाने के लिए क्याक्या नहीं किया. अब क्या मैं अपनी खुशी के लिए इतना भी नहीं कर सकती?’’
‘‘मैं ऐसा तो नहीं कह रही हूं. फिर भी पैसे बचा कर चल.
आज सुबह ही जया का फोन आया कि दीदी, आज मंटू का जन्मदिन है. तुम और जीजाजी जरूर आना.
‘‘ हां, आऊंगी.’’
‘‘और हां, दीदी, एक बात तुम से कहनी थी. तुम ने अपनी फ्रैंड की शादी में जो साड़ी पहनी थी वह बहुत सुंदर लग रही थी. दीदी, मेरे लिए भी एक वैसी ही साड़ी लेती आना, प्लीज.’’
‘‘ठीक है, बाजार जाऊंगी तो देखूंगी.’’
‘‘दीदी, बुरा न मानो तो एक बात कहूं?’’
‘‘हां, बोलो.’’
‘‘तुम अपनी वाली साड़ी ही मुझे दे दो.’’
‘‘जया, वह तुम्हारे जीजाजी की पसंद की साड़ी है.’’
‘‘तो क्या हुआ. अब तुम्हारी उम्र तो वैसी चमकदमक वाली साड़ी पहनने की नहीं है.’’
‘‘जया, मेरी उम्र को क्या हुआ है. मैं तुम से 5 साल ही तो बड़ी हूं.’’
यह सुनते ही जया ने गुस्से में फोन रख दिया और नीलू फोन का रिसीवर हाथ में लिए सोचने लगी थी.
दुनिया कितनी स्वार्थी है. सब अपने बारे में ही सोचते हैं. चाहे वह मेरी अपनी मां, भाईबहन ही क्यों न हों. मैं ने सभी के लिए कितना कुछ किया है और आज भी जिसे जो जरूरत होती है पूरी कर रही हूं. फिर भी किसी को मेरी खुशी सुहाती नहीं. जब मैं ने शादी का फैसला किया था तब भी घर वालों ने कितना विरोध किया था. कोई नहीं चाहता था कि मैं अपना घर बसाऊं. वह तो बस, अनिल थे जिन्होंने मुझे अपने प्यार में इतना बांध लिया कि मैं उन के बगैर रहने की सोच भी नहीं सकती थी.
नीलू की आंखों में आंसू झिल- मिलाने लगे थे.अनिल पीछे से आ कर बोले, ‘‘जानेमन, इतनी देर से आखिर किस से बातें हो रही थीं.’’
‘‘जया का फोन था. आज उस के बेटे का जन्मदिन है.’’
‘‘तो ठीक है, शाम को चलेंगे दावत खाने…और हां, तुम वह नीली वाली साड़ी शाम को पार्टी में पहनना. उस दिन जब तुम ने वह साड़ी पहनी थी तो बहुत सुंदर लग रही थीं. बिलकुल फिल्म की हीरोइन की तरह.’’
‘‘अनिल, लेकिन वह साड़ी तो जया मांग रही है.’’
‘‘क्या?’’
‘‘हां, वैसे मैं ने उस से कहा है कि वह आप की पसंद की साड़ी है.’’
‘‘तुम पार्टी में जाने के लिए कोई दूसरी साड़ी पहन लेना और वह साड़ी उसे दे देना, आखिर वह तुम्हारी बहन है.’’
‘‘अनिल, तुम कितने अच्छे हो.’’
‘‘हां, वह तो मैं हूं, लेकिन इतना भी अच्छा नहीं कि नाश्ते के बगैर कालिज जाने की सोचूं.’’
नीलू और अनिल एकदूसरे को पा कर बेहद खुश थे. दोनों के विचार एक थे. भावनाएं एक थीं.
एक दिन नीलू का भाई सचिन आया और बोला, ‘‘दीदी, मुझे कुछ रुपए चाहिए.’’
‘‘किसलिए?’’
‘‘शहर से बाहर एकदो जगह नौकरी के लिए साक्षात्कार देने जाना है.’’
‘‘कितने रुपए लगेंगे?’’
‘‘10 हजार रुपए दे दो.’’
‘‘इतने रुपए का क्या करोगे सचिन?’’
‘‘दीदी, इंटरव्यू देने के लिए अच्छे कपड़े, जूते भी तो चाहिए. मेरे पास अच्छे कपड़े नहीं हैं.’’
‘‘सचिन, अभी मैं इतने रुपए तुम्हें नहीं दे सकती. तुम्हारे जीजाजी की बहुत इच्छा है कि हम शिमला जाएं. शादी के बाद हम कहीं गए नहीं थे न.’’
‘‘दीदी, तुम्हारी शादी हो गई वही बहुत है. अब इस उम्र में घूमना, टहलना ये सब बेकार के चोचले हैं. मुझे पैसे की जरूरत है, वह तो तुम दे नहीं सकतीं और यह फालतू का खर्च करने को तैयार हो.’’
‘‘सचिन, क्या हम अपनी खुशी के लिए कुछ नहीं कर सकते. अरे, इतने दिनों से तो मैं तुम लोगों के लिए ही करती आई हूं और जब अपनी खुशी के लिए अब करना चाहती हूं तो बातबात पर तुम लोग मुझे मेरी उम्र का एहसास दिलाते हो.
‘‘सचिन, प्यार की कोई उम्र नहीं होती. वह तो हर उम्र में हो सकता है. जब मैं खुश हूं, अनिल खुश हैं तो तुम लोग क्यों दुखी हो?’’
अनिल उस दिन अचानक जिद कर बैठे कि नीलू, आज मैं अपने ससुराल जाना चाहता हूं.
‘‘क्यों जी, क्या बात है?’’
‘‘अरे, आज छुट्टी है. तुम्हारे घर के सभी लोग घर पर ही होंगे. फिर जया भी तो आई होगी. और हां, नए मेहमान के आने की खुशखबरी अपने घर वालों को नहीं सुनाओगी?’’
‘‘ठीक है, अगर तुम्हारी इच्छा है तो चलते हैं, तुम्हारे ससुराल,’’ नीलू मुसकरा दी थी.
नीलू आज काफी सजधज कर मायके आई थी. लाल रंग की साड़ी से मेल खाता ब्लाउज और उसी रंग की बड़ी सी बिंदी अपने माथे पर लगा रखी थी. उस ने सोने के गहनों से अपने को सजा लिया था.
मां उसे देख कर मुसकरा दीं, ‘‘क्या बात है, आज तू बड़ी सज कर आई है.’’
अभी नीलू कुछ कहना चाह रही थी कि प्रिया बोली, ‘‘बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम.’’
प्रिया की बातें सुन कर नीलू का खून खौल उठा पर वह कुछ बोली नहीं.
मां ने आदर के साथ बेटी को बिठाया और दामादजी से हाल समाचार पूछे.
नीलू बोली, ‘‘मां, खुशखबरी है. तुम नानी बनने वाली हो.’’
मां यह सुन कर बोलीं, ‘‘चलो, ठीक है. एक बच्चा हो जाए. फिर अपना दुखड़ा रोने लगीं कि सचिन की नौकरी के लिए 50 हजार रुपए चाहिए. बेटी, अगर तुम दे देतीं तो…’’
नीलू बौखला उठी. मां की बात बीच में काट कर बोली, ‘‘मां, अब और नहीं, अब बहुत हो गया. मुझे जितना करना था कर दिया. अब सब बड़े हो गए हैं और वे अपनी जिम्मेदारी खुद उठा सकते हैं. मैं आखिर कब तक इस घर को देखती रहूंगी.
‘‘मैं जब 12 साल की थी तब से ही तुम लोगों की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ढो रही हूं. रातरात भर जाग कर मैं एकएक पैसे के लिए काम करती थी. फिर सभी को इस योग्य बना दिया कि वे अपनी जिम्मेदारियां खुद उठा सकें.
‘‘अब मेरा भी अपना परिवार है. पति हैं, और अब घर में एक और सदस्य भी आने वाला है. मैं अब तुम सब के लिए करतेकरते थक गई हूं मां. अब मैं जीना चाहती हूं, अपने लिए, अपने परिवार के लिए और अपनी खुशी के लिए.
‘‘जिंदगी की खूबसूरत 40 बहारें मैं ने यों ही गंवा दीं, अब और नहीं. मेरे जीवन के पतझड़ का अंत हो गया है. अब मैं खुश हूं, बहुत खुश.’’
क्या अपनी इच्छा भी पुरी करनी चाहिये ?
अनिल जैन
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