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ससुराल का ‘कर्ज़

 जिस बहू के मायके जाने पर उसकी सास और ननद उसके बैग की तलाशी लेती थीं और उसे 'गरीब घर की' कहकर ताना मारती थीं, उसी बहू के बैग से एक दिन कुछ ऐसा निकला कि पूरे ससुराल की बोलती हमेशा के लिए बंद हो गई।


गरिमा जब भी अपने मायके जाने के लिए तैयार होती, तो उसके पेट में एक अजीब सी मरोड़ उठने लगती थी। यह डर मायके जाने का नहीं था, बल्कि वहां से लौटने पर होने वाली ‘अग्निपरीक्षा’ का था।


“बहु, बैग इधर लाओ,” सासू माँ, सुमित्रा देवी, सोफे पर पैर पसारकर हुकुम चलातीं।

गरिमा चुपचाप अपना बैग मेज पर रख देती।

सुमित्रा देवी की गिद्ध जैसी नज़रें बैग के एक-एक कोने को टटोलतीं। कभी वो साड़ियों की तह खोलकर देखतीं, तो कभी क्रीम-पाउडर के डिब्बे हिलाकर।


“अरे माँ, आप भी किस उम्मीद में चेक कर रही हैं? इसके कंजूस बाप ने क्या दिया होगा? वही दो किलो अचार और पापड़?” पास बैठी ननद, वंदना, मुंह बनाकर हंसती।

सुमित्रा देवी बैग से अचार का डिब्बा बाहर निकालते हुए उसे ऐसे देखतीं जैसे उसमें कोई मरा हुआ चूहा हो। “सही कह रही है वंदना। बड़े घर की बहुएं जब मायके से आती हैं तो जेवर और कपड़े लाती हैं, और ये महारानी… अचार लाती हैं। अरे, इतना तेल तो हमारे घर में एक दिन में सब्जी में पड़ जाता है।”


गरिमा का सिर शर्म से झुक जाता। उसके पिता एक प्राइमरी स्कूल के रिटायर्ड टीचर थे। पेंशन के सहारे घर चलता था। वे अपनी हैसियत से बढ़कर गरिमा के लिए करते थे, लेकिन ससुराल वालों की भूख कुएं जैसी गहरी थी, जो कभी भरती ही नहीं थी।


कहानी में मोड़ तब आया जब वंदना, जो अपनी ससुराल में रहती थी, एक महीने के लिए मायके (यानी गरिमा की ससुराल) रहने आ गई। वंदना के आते ही घर का माहौल बदल गया। गरिमा, जो अब तक घर की बहू थी, अब पूरी तरह से नौकरानी बना दी गई।


सुबह की चाय से लेकर रात के दूध तक, वंदना की हर फरमाइश गरिमा को पूरी करनी पड़ती। वंदना दिन भर सोफे पर लेटी रहती, अपनी माँ से बातें करती और गरिमा पर हुकुम चलाती।


एक दिन गरिमा ने देखा कि वंदना अपने कमरे में फोन पर धीरे-धीरे किसी से बात कर रही थी।

“हाँ… माँ को नहीं बताया है। अगर उन्हें पता चला कि मैंने अपने ससुर के इलाज के लिए जेवर गिरवी रख दिए हैं, तो वो जान ले लेंगी। मुझे पैसों की सख्त ज़रूरत है। तुम कुछ करो ना…”


गरिमा वहां से चुपचाप निकल गई। उसे वंदना की परेशानी समझ आ रही थी, लेकिन इस घर में हमदर्दी की कोई जगह नहीं थी।


दो दिन बाद, गरिमा को खबर मिली कि उसके पिताजी की तबीयत थोड़ी खराब है। उसने डरते-डरते सुमित्रा देवी से पूछा, “माँ जी, क्या मैं दो दिन के लिए मायके हो आऊं?”


सुमित्रा देवी ने वंदना की तरफ देखा। वंदना ने आंख मारी और बोली, “हाँ-हाँ भाभी, जरूर जाओ। वैसे भी यहाँ काम करके थक गई होंगी। थोड़ा आराम कर लो।”

गरिमा हैरान थी। इतनी आसानी से इजाज़त? खैर, वह खुश होकर तैयार होने लगी।


जब वह जाने लगी, तो सुमित्रा देवी ने उसे रोका नहीं, न ही बैग चेक किया। गरिमा को अजीब लगा, पर वह चली गई।


दो दिन बाद जब गरिमा लौटी, तो घर का नज़ारा बदला हुआ था। जैसे ही उसने दहलीज पर कदम रखा, सुमित्रा देवी ने चिल्लाकर कहा, “रुक जाओ वहीं!”

ड्राइंग रूम में वंदना रोने का नाटक कर रही थी और सुमित्रा देवी गुस्से में लाल-पीली हो रही थीं। घर के दामाद (वंदना के पति) और गरिमा के पति, रोहन, भी वहीं खड़े थे।


“क्या हुआ माँ जी?” गरिमा ने घबराते हुए पूछा।

“क्या हुआ? चोरी करती है और पूछती है क्या हुआ?” सुमित्रा देवी ने गरिमा की तरफ उंगली उठाई। “मेरी बेटी का सोने का हार गायब है। जब से तू मायके गई है, तब से वो हार नहीं मिल रहा। मुझे पक्का यकीन है कि तूने ही चुराया है। अपने उस गरीब बाप का इलाज करवाने के लिए तूने मेरी बेटी का घर लूट लिया।”


गरिमा के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। “माँ जी! आप ये क्या कह रही हैं? मैंने ऐसा कुछ नहीं किया।”

वंदना ने मगरमच्छ के आँसू बहाते हुए कहा, “भाभी, अगर आपको पैसों की ज़रूरत थी तो मांग लेतीं। चोरी करने की क्या ज़रूरत थी? वो हार मेरे ससुराल की निशानी थी।”


रोहन, जो अब तक चुप था, बोला, “गरिमा, अगर तुमने लिया है तो बता दो। बात घर की घर में रह जाएगी।”

गरिमा ने अपने पति को अविश्वास से देखा। उसे अपनी पत्नी पर नहीं, अपनी माँ और बहन के झूठ पर भरोसा था।


“मैंने चोरी नहीं की है,” गरिमा की आवाज़ में कंपकंपी थी, पर आंखों में सच्चाई।

“ठीक है,” सुमित्रा देवी ने कड़ककर कहा। “तो फिर तलाशी होगी। तेरी और तेरे इस बैग की। अभी दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा।”


गरिमा ने अपना बैग आगे कर दिया। सुमित्रा देवी ने झपटकर बैग खोला। उन्होंने सारा सामान सोफे पर पलट दिया। वही पुराने कपड़े, कुछ किताबें और… अचार का डिब्बा।

हार नहीं मिला।


सुमित्रा देवी का चेहरा थोड़ा उतर गया, लेकिन वंदना ने तुरंत पैंतरा बदला। “माँ, बैग में नहीं होगा। इसने पक्का अपने शरीर पर कहीं छुपाया होगा या मायके में छोड़ आई होगी। भाभी, आप अपना पर्स दिखाओ।”

गरिमा ने अपना छोटा सा हैंडबैग उठाया। सुमित्रा देवी ने उसे भी छीन लिया। उसमें से एक पुरानी डायरी और एक पासबुक निकली।


सुमित्रा देवी ने डायरी खोली और कुछ पन्ने पलटे। अचानक उनकी आंखें फटी की फटी रह गईं।

“ये… ये क्या है?” सुमित्रा देवी हकलाने लगीं।

वंदना ने डायरी उनके हाथ से छीनी। “क्या है माँ? कोई लव लेटर है क्या?”


वंदना ने जैसे ही डायरी पढ़ी, उसके चेहरे का रंग भी उड़ गया। डायरी के बीच में एक बैंक की रसीद रखी थी और कुछ एग्रीमेंट पेपर्स थे।

“क्या हुआ? अब चुप क्यों हो गए सब?” गरिमा ने पहली बार ऊंची आवाज़ में पूछा। वह आगे बढ़ी और उसने टेबल पर रखे उन कागजों को उठाया।


“पढ़िए रोहन,” गरिमा ने वह कागज अपने पति के हाथ में थमा दिया। “सबको पढ़कर सुनाइए कि 'गरीब बाप की बेटी' अपने मायके से क्या लाई है।”


रोहन ने कागज पढ़ा। उसके हाथ कांपने लगे।

“ये तो… ये तो हमारे घर के लोन के पेपर्स हैं,” रोहन बुदबुदाया। “लोन… चुकता हो गया है? दस लाख रुपये?”

सुमित्रा देवी और वंदना सन्न रह गईं।


गरिमा ने सबकी आँखों में देखते हुए कहा, “माँ जी, आपको लगता था कि मैं मायके से सिर्फ अचार और पापड़ लाती हूँ? पिछले तीन साल से, जब से ससुर जी का देहांत हुआ और रोहन की नौकरी में दिक्कत आई, आप लोग जिस घर की ईएमआई भरने में परेशान थे, वो ईएमआई मेरे 'कंजूस' पिता भर रहे थे।”


कमरे में सन्नाटा छा गया। इतना गहरा सन्नाटा कि सुई गिरने की आवाज़ भी सुनाई दे।


गरिमा की आँखों से आँसू बह निकले, पर आज वो कमज़ोर नहीं लग रही थी। “पापा ने अपनी पूरी ज़िंदगी की जमा-पूंजी, अपनी ग्रेच्युटी के पैसे निकालकर मुझे दिए, ताकि इस घर की छत नीलाम न हो। मैं हर बार मायके जाती थी ताकि उनसे पैसे ला सकूँ और बैंक में जमा कर सकूँ। और आप लोग? आप लोग मेरा बैग चेक करते थे कि कहीं मैं आपके घर से एक चम्मच चीनी तो नहीं ले गई?”


उसने वंदना की तरफ देखा। “और दीदी, रही बात आपके हार की… तो वो आपने तीन दिन पहले ही सोनार को बेच दिया था। मैंने आपको फोन पर बात करते हुए सुन लिया था। आपको पैसों की ज़रूरत थी, लेकिन अपनी माँ से मांगने की हिम्मत नहीं थी। इसलिए आपने हार बेचकर इल्जाम मुझ पर लगा दिया ताकि आपको सहानुभूति मिले और मुझे बेइज्जती।”


वंदना का चेहरा शर्म से लाल हो गया। उसके पति ने उसे गुस्से से देखा। सुमित्रा देवी तो जैसे काठ मार गई थीं। जिस बहू को वो चोर समझ रही थीं, वो उनके घर की रक्षक निकली। और जिस बेटी पर उन्हें नाज़ था, उसने अपनी ही भाभी को फंसाने की साजिश रची थी।


सुमित्रा देवी की नज़रें फर्श पर गड़ी थीं। रोहन गरिमा के पास आया और उसने उसका हाथ पकड़ने की कोशिश की, “गरिमा, मुझे…”

गरिमा ने अपना हाथ पीछे खींच लिया।

“नहीं रोहन। आज नहीं। आज तक मैं चुप थी क्योंकि मुझे लगता था कि रिश्ते प्यार और त्याग से बनते हैं। लेकिन आज मुझे समझ आ गया कि इस घर में त्याग की नहीं, सिर्फ नोटों की कद्र है। मेरे पिता ने पैसे इसलिए नहीं दिए थे कि वो अमीर हैं, बल्कि इसलिए दिए थे क्योंकि वो नहीं चाहते थे कि उनकी बेटी सड़क पर आ जाए।”


गरिमा ने अपना बैग उठाया और अचार का वो डिब्बा वापस अंदर रखा।

“मैं मायके जा रही हूँ। और इस बार पैसे लाने के लिए नहीं, बल्कि अपना खोया हुआ आत्म-सम्मान वापस पाने के लिए। वो घर छोटा जरूर है, वहां एसी नहीं है, लेकिन वहां कोई मेरी तलाशी नहीं लेता। वहां की रोटियों में ताने नहीं, प्यार होता है।”


गरिमा दरवाज़े की तरफ बढ़ी। सुमित्रा देवी ने दौड़कर उसका रास्ता रोका। वो उसके पैरों में गिर पड़ीं।

“बहु… मुझे माफ कर दे। मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। मैं अंधी हो गई थी। मत जा बेटी, ये घर टूट जाएगा।”


गरिमा ने अपनी सास को उठाया। उसकी आँखों में अब गुस्सा नहीं, बस एक थकान थी।

“माँ जी, घर तो उसी दिन टूट गया था जब आपने पहली बार मेरे चरित्र और मेरे मायके पर शक किया था। आज तो बस मलबा हटा रही हूँ। जो हार दीदी ने बेचा है, वो तो शायद वापस मिल जाए, लेकिन जो भरोसा आज आपने तोड़ा है, वो किसी दुकान पर नहीं मिलता।”


गरिमा ने एक बार मुड़कर उस आलीशान घर को देखा, जो अंदर से खोखला था, और बाहर निकल गई।

पीछे रह गई एक पछताती हुई सास, एक शर्मिंदा ननद और एक खामोश पति। उस दिन उन्हें समझ आया कि बहुएं दहेज में जो लाती हैं, उसकी कीमत होती है, लेकिन जो संस्कार और सहयोग वो अपने साथ लाती हैं, वो अनमोल होता है। और जिस दिन वो सब्र का बांध तोड़ देती हैं, उस दिन बड़े-बड़े मकान भी वीरान हो जाते हैं।


**समापन:**


दोस्तों, यह कहानी हर उस घर के लिए एक आईना है जहाँ बहू के मायके वालों को कमतर आंका जाता है। हम भूल जाते हैं कि एक लड़की जब अपना सब कुछ छोड़कर आती है, तो उसके मायके वाले भी अपना जिगर का टुकड़ा दे चुके होते हैं। उनका अपमान करना, उस लक्ष्मी का अपमान करना है जो आपके घर को संवार रही है। पैसों से ज्यादा कीमती विश्वास होता है, जिसे एक बार खो दिया जाए तो दोबारा कमाना नामुमकिन होता है।


**एक सवाल आपके लिए:** क्या गरिमा का घर छोड़कर जाना सही था? या उसे अपनी सास को माफ़ कर देना चाहिए था? अपनी राय कमेंट में जरूर लिखें।


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**अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो लाइक, कमेंट और शेयर करें। अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक और दिल को झकझोर देने वाली कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें, धन्यवाद।**


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