हमारी बहू सुनंदा

 अनिल जी ने बड़ी मेहनत से अपना व्यापार जमाया था, मगर पता नहीं किसके बहकावे में आकर भरी जवानी में सन्यासी हो गए थे और बच्चों को बड़ा करने का ज़िम्मा नीला के कंधों पर आ गया था.नीला ने उसे बख़ूबी निभाया भी. बेटियों को पढ़ा-लिखाकर उन्हें अच्छे घर में ब्याह दिया, बेटे राकेश को भी अच्छी शिक्षा दिलाई. अच्छे कॉलेज से एमबीए करके अब वह अनिलजी के व्यापार को बेहतरी से संभाल रहा था.

बड़ी नियामतों से पाला लड़का यदि किसी को सामने ले ही आया तो क्या ‘ना’ कह पाएंगी वो? और क्या उनकी बात का मान रखेगा बेटा? यही सोचकर बेटे के लिए अपनी बिरादारी में उनके दूर के रिश्ते की भाभी की भतीजी उन्हें पसंद आ गई. नाम था सुनंदा. लड़की पढ़ी-लिखी थी, दिखने में अच्छी थी, पहनने-ओढ़ने में सलीकेदार थी और सबसे अच्छी बात जो नीला को पसंद आई वह ये कि लड़की ने गीता, महाभारत, रामायण यहां तक कि बाइबल और क़ुरान सब कुछ पढ़ रखा था, घर के रीति-रिवाज़ पूरे मन से निभाती थी.आजकल की लड़कियां, ज़रा पढ़-लिख क्या जाती हैं, सबसे पहले अपने रिवाज़ों और परंपराओं से मुंह मोड़ती है।

सुनंदा ने राकेश को पसंद कर लिया और रिश्ता तय हो गया. सोने पर सुहागा यह कि शादी तय होते से ही राकेश को कई नए ऑर्डर मिले...बहू का पैर गुणकारी है, ऐसी शादी हुई जो सारे मुहल्ले और रिश्तेदारी में याद रखी गई. सुनंदा ने भी आते ही घर को, उसके सदस्यों को अपना बना लिया. दोनों ननदों से सखियोंवाला रिश्ता बनाया तो नीला को मां जैसा दर्जा दिया. ननदें, भाभी से स्नेहिल उपहार पाकर उसकी तारीफ़ करते विदा हुईं. जल्दी ही सुनंदा ने घर की ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली और“मां, आपने बहुत कष्ट सहे, अब मैं आ गई हूं...आप बस आराम करो और जो चाहिए, मुझे बताओ,” कहकर नीला का दिल जीत लिया.  मन में आया कि घर में कथा रखवाई जाए. परिवार में जो महाराज पूजा करवाते थे, उन्हें निमंत्रण दिया गया. महाराज जी ने पूजा के सामान की सूची भिजवा दी,  सुनंदा ने मन लगाकर पूजा कि ऐसी तैयारी लगाई कि महाराज जी भी कह उठे, वाह, कितनी सलीकेदार बहू लाई हो । पूजा संपन्न हुई, अब कथा की बारी थी. महाराज जी ने अंतिम अध्याय ख़त्म किया ही था कि सुनंदा बोली,“महाराज जी, आपसे एक प्रश्न करना चाहती हूं. यह प्रश्न मेरे मन में हमेशा उठता है, जब-जब मैं कोई भी कथा सुनती हूं”

‘‘हां, हां...बिल्कुल पूछो बेटी! ईश्वर की भक्ति में शंका-कुशंका का कोई स्थान नहीं है,’’ महाराज जी बोले.

‘‘महाराज जी, आप ने ही कहा कि हम सब ईश्वर की संतान हैं...और ईश्वर हमारे पिता हैं.’’

‘‘हां बेटी, यह सत्य है.’’

‘‘तो फिर हर कथा में यह क्यों लिखा जाता है कि यदि व्रत तोड़ा तो यह सज़ा मिलेगी, यदि यह न चढ़ाया तो ऐसा होगा, प्रसाद न खाया तो कोढ़ होगा, यह न किया तो संतान को कष्ट होगा...हमारे पिता क्या इतने क्रूर हो सकते हैं कि अपने बच्चों की ग़लतियों की इतनी बड़ी सज़ा दें?’’

प्रश्न सुनते ही महाराज जी सकपकाए और बोले,‘‘बेटी, शास्त्रों में यही लिखा है और शास्त्रों की वाणी ईश्वर की वाणी है...’’

सुनंदा बोली,‘‘महाराज जी, मुझे तो लगता है भगवान तो बस यही चाहते हैं कि उनके बच्चे सही रास्ते पर चलें. न ख़ुद दुखी हों, न दूसरों को दुःख दें. बाक़ी ये सारे शास्त्र तो मनुष्यों ने ही बनाए हैं...’’

महाराज जी ने जल्दी-जल्दी अपना सामान समेटकर विदा ली थी.

‘‘मां, मैं तो बस जानना चाहती थी कि सच क्या है? ईश्वर से तो प्रेम करना चाहिए न मां, पर ये लोग तो हमें डरा-धमकाकर ईश्वर की पूजा करने को कह रहे हैं...’’। राकेश से कहा ,‘‘तो चलो, महाराज जी से सवाल-जवाब करने का साहस कर ही लिया किसी ने.’’  घर गौरी पूजा का बड़ा महत्व था और इस बार तो बहू की पहली गौरी पूजा थी. सुनंदा भी बड़े उत्साह से तैयारी में लगी थी. ग्यारह सुहागनों को नेग देने थे, फिर खाना-पीना...

नीला ने सुनंदा से कहा,‘‘बेटा, अपनी सहेलियों को ही बुला लेना. अब हमारी उमर की बहुओं के ज़माने गए.. पर हां, ब्राह्मण ही हों ये ध्यान रहे...’’

नियत दिन सुनंदा ने सबेरे उठकर मन लगाकर गौरी पूजा की, भोग लगाया. मिश्राइन का मन प्रसन्न हो गया सुनंदा की  शाम हुई, सुनंदा की सहेलियां आने लगीं. मिश्राइन बैठक में आई तो वहां केवल सात ही महिलाएं थीं. उन्होंने सुनंदा से पूछा,‘‘बेटा, ग्यारह नेग देने हैं. बाक़ी कहां हैं?’’

‘‘बस, आती ही होंगी मां  सुनंदा ने सहेलियों का परिचय देना शुरू किया,‘‘यह है वैशाली त्रिपाठी, यह सरोज मीना, यह सीमा प्रजापति, यह स्वस्ति डैनियल, यह सोना ख़ान...’’

नाम सुनते-सुनते मिश्राइन चकराने लगी थीं. सुनंदा को कोने में बुलाकर पूछा,‘‘बेटा, ये ब्राह्मण ही हैं ना?’’

सुनंदा हंसी,‘‘मां, ये सब स्त्रियां हैं और मेरी सहेलियां हैं.’’

‘‘और बाक़ी चार?’’ उनका दिल कांप गया था.

‘‘हां, है ना. अपनी महरी, मिसरानी, इस्त्रीवाली दादी और सब्ज़ीवाली दीदी...बस, आती ही होंगी.’’

सबके जाते ही फट पड़ीं,‘‘ये क्या तमाशा लगा रखा है बहू? आज तक इस घर में ऐसा नहीं हुआ जो तुमने आज कर डाला है. गौरी पूजा के नेग क्या महरी, मिसरानी, सब्ज़ीवाली को देने के लिए होते हैं? क्या तुम्हें पता नहीं कि यह पवित्र पूजा होती है जिसका नेग हर कोई नहीं

ले सकता.”

सुनंदा ने हौले से कहा था,“मां, ये सारे रीति-रिवाज़ क्यों बनाए गए होंगे, ज़रा सोचिए न...? सुहाग का नेग किसे देने से वह उपयोगी होगा? आपको क्या लगता है, हमारी पहचान की या रिश्तेदारी की महिलाओं को इनकी ज़रूरत होती है? नहीं मां...तो इसलिए मैंने उन लोगों को यह नेग देना उचित समझा, जिन्हें इस नेग की ज़रूरत है. इनके लिए यह नेग क़ीमती है...वे इन चीज़ों को प्रेम से पहनेंगी, हमारी दी गई मिठाई किसी के चेहरे पर

ख़ुशी आएगी.’’

नीला पांव पटकती हुई अपने कमरे में चली गई थीं. बहू की बातें उन्हें ठीक तो लग रही थी पर अब तक जो कुछ ख़ानदान में होता आया था, जो समझाइश उन्हें अपनी सासू मां से मिली थी, उसे कैसे भुला देतीं? कैसे ग़लत साबित होने देतीं?

करवा चौथ आई. सुनंदा की पहली करवा चौथ थी, नीला बड़ी ख़ुश थीं. बहू के लिए नया जोड़ा ख़रीदा, सुहाग का सामान ख़रीदा. आस-पड़ोस की नई बहुओं को निमंत्रण दिया.

सुनंदा ने हैरानी से पूछा,‘‘इतनी तैयारी किसलिए मां?’’

‘‘अरे, भूल गई क्या? करवा चौथ है परसों,’’ नीला उत्साह से बोलीं.

‘‘हां, है तो. पर मां मैं यह व्रत नहीं रखना चाहती,’’ सुनंदा ने हिचकते हुए कहा.

‘‘क्या अंड-बंड बक रही हो...’’नीला का पारा सातवें आसमान पर था,‘‘अब क्या अपने पति के लिए भी व्रत नहीं रखोगी?’’

‘‘मां, दिक़्क़त व्रत रखने में नहीं है. बस, मुझे यह समझ में नहीं आता कि मेरे व्रत रखने से मेरे पति को कैसे लाभ होगा? और व्रत रखना है तो इतना दिखावा क्यों? और यह भी कि पति अपनी पत्नी की लंबी उम्र के लिए व्रत क्यों नहीं रखते?’’

‘‘बस-बस, बहुत ज़ुबान चलती है तुम्हारी. अरे, सालों से हमारे पुरखे यह सब ऐसे ही नहीं करते आए होंगे...कुछ तो सोचा होगा उन्होंने?’’

‘‘दिक़्क़त यही तो है मां, न उन्होंने कुछ सोचा, न हमने...’’ सुनंदा बुदबुदाई थी.

राकेश की समझाइश पर करवा चौथ के दिन सुनंदा ने निर्जला व्रत रखा, मगर शाम होते-होते सुनंदा की तबियत बिगड़ने लगी और हारकर नीला को उसे पूजा से पहले ही पानी और खाने के लिए फल देने पड़े.नीला को पूरा शक़ था कि सुनंदा ने जान-बूझकर तबियत बिगड़ने का बहाना किया है, ताकि व्रत पूरा न हो सके और वह अपने मन की कर सके. मन में डर भी बैठ गया था कि पता नहीं पूजा अधूरी रहने का क्या फल भुगतना पड़ेगा उनके घर को.

और नीला की आशंका सच हो ही गई. दिवाली के बाद ख़बर आई कि अनिल ने बीमारी के चलते प्राण त्याग दिए हैं. नीला पर तो मानों पहाड़ टूट पड़ा था. भले ही पति का सहारा न था, मगर माथे पर उसके नाम का टीका, मांग में सिन्दूर तो था. समाज के कार्यक्रमों में सुहागन के नाम से हिस्सेदारी का अधिकार तो था. वे रो रो कर दुहरी हुई जाती और बहू को दोष दिए जातीं,“अरे सब कुछ इसी की वजह से हुआ है. जब से घर में आई है, भगवान के नियम-क़ायदे से खिलवाड़ कर रही है. इसी का दंड मिला है मुझे...हे भगवान, ऐसी बहू किसी को न दे...”

राकेश ने, उनकी बेटियों ने ख़ूब समझाया था कि पिताजी की मृत्यु एक संयोग है और वे बीमारी के चलते गुज़रे हैं न कि सुनंदा के कारण, मगर नीला ने मन में सुनंदा को दोषी मान ही लिया था. बेटियां समझाकर थक गईं, मगर इसके बाद न सिर्फ़ उन्होंने सुनंदा से बातचीत बंद कर दी वरन् घर से भी अपना ध्यान हटा लिया. उनका सारा समय पास के मंदिर और महिला भजन मंडली में ही गुज़रता.

इसी बीच घर में नन्हे मेहमान के आगमन की ख़बर आई. पता नहीं वे कैसे इतनी निष्ठुर हो गई थीं कि सुनंदा को न मन भर आशीष दे पाईं, न उसके सिर पर प्रेम से हाथ फिराया. सुनंदा के सामने आते ही उन्हें पति याद आ जाते और वे बिफर उठतीं. डॉक्टर ने पहले पांच महीने तक सुनंदा को आराम करने के लिए कहा. राकेश ने जैसे ही यह उन्हें बताया, वे तपाक से बोलीं,“उससे कहो, अपने मायके चली जाए. इतनी सेवा-टहल मेरे बस की  बात नहीं.”

मां का अड़ियल रुख देखकर मन मारकर राकेश सुनंदा को उसके मायके छोड़ आया. मायकेवालों को राकेश ने जब मां के बर्ताव के बारे में बताया तो उन्होंने सुनंदा को प्रसव तक मायके में ही रोकने का प्रस्ताव रखा.

नौ माह बीते. सुनंदा ने स्वस्थ और गोल-मटोल बिटिया को जन्म दिया. सारे घर में ख़ुशी की लहर दौड़ गई थी. पोती के जन्म की बात सुनते ही राकेश की बुआ घर आ धमकीं. बुआ के बच्चे विदेश में थे, पति अपने कारोबार में व्यस्त. उन्हें बच्चों से बेहद लगाव था, साथ ही जच्चा-बच्चा की देखरेख का भी भारी चाव. प्रसव के चालीस दिन बाद सुनंदा ससुराल लौट आई और बुआ ने जच्चा-बच्चा की सारी जिम्मेवारी अपने सिर ले ली. नीला अब भी उतनी ही बेख़बर होने का दिखावा भले ही कर रही थीं, मगर पोती को खिलाने का चाव उन्हें भी व्याकुल किए दे रहा था. कैसे पहल करें, समझ में नहीं आ रहा था.

कुछ दिनों बाद बच्ची का नामकरण समारोह आयोजित किया गया. घर में सालों बाद पलना हिला था, इससे सभी रिश्तेदारों को निमंत्रण दिया गया. कार्यक्रम वाले दिन बुआजी, सुनंदा और राकेश की बहनों के साथ रसोई में थी कि नीला वहां पहुंचीं. उन्हें देखते ही बुआजी बोल पड़ीं,“भाभी, आज के दिन आप बाहर ही रहो. पूजा हो जाए, सुहागनों का खाना हो जाए, फिर काम को हाथ लगाना. बच्ची का मामला है, सब कुछ सुहागन के हाथ से हो तो अच्छा है.”

नीला का चेहरा क्षोभ के मारे काला पड़ गया था. उन्हें अब तक अपने द्वारा अन्य विधवा स्त्रियों के साथ किया गया व्यवहार याद आने लगा था. सुनंदा कुछ कहती, उससे पहले ही वे बाहर निकल गईं. सारा दिन कमरे में बंद मुंह ढांपे पड़ी रहीं. आंखों के आंसू तकिए को भिगोते रहे और वे अपनी क़िस्मत को दोष देती रहीं,  बिटिया को पालने में डालने और बहू की गोद भरने का कार्यक्रम था. वे दरवाज़े से लगी बाहर की आहट लेने का प्रयास कर रही थी तभी ज़ोर से दरवाजा भड़भड़ाया. उन्होंने दरवाज़ा खोला तो सुनंदा सामने थी. उसने अधिकारपूर्वक उनका हाथ पकड़ा और उन्हें लेकर मेहमानों के बीच पहुंची. उनके हाथ में आरती का थाल दिया और बोली,“बुआजी, बिटिया का पहला तिलक मां करेंगी और मेरी गोद में पहला नेग भी मां ही डालेंगी.”

बुआजी और अन्य महिलाओं की आंखें फटी रह गई थीं. बुआजी बोलीं,‘‘ये क्या ग़ज़ब कर रही हो बहू, विधवा के हाथ से पहला टीका? इतना बड़ा अपशगुन?’’

‘‘बुआजी, आप ही सोचिए, इसमें विधवा और सुहागन होने से क्या फ़र्क़ पड़ता है? मेरी बेटी यानी मां की पोती. भला दादी अपनी पोती को टीका करे और उसे अपशगुन कहा जाए? मैं इसे नहीं मानती...’’

‘‘अरे बहू, नासमझ मत बनो. एक विधवा, सुहागन का टीका नहीं करती, तुम समझती क्यों नहीं?’’

‘‘बुआजी, एक मां अपनी बेटी का टीका कर रही है और उसे आशीर्वाद दे रही है...बस, इतनी सी बात है. बाक़ी बातें मेरे लिए बेकार हैं,’’ सुनंदा दृढ़ता से बोली.

‘‘बहू, बात को समझो...कल को कुछ हो गया तो?’’

‘‘अव्वल तो कुछ होगा नहीं, और कुछ हुआ भी तो उसकी जिम्मेवारी मेरी रहेगी बुआजी,’’ सुनंदा ने कहा.

‘‘बहन जी,आप ही समझाइए इसे,’’ बुआजी ने सुनंदा की मां से कहा.

‘‘सुनंदा के मन में कोई बात आ जाए तो वह किसी की नहीं सुनती और मुझे लगता है वह ठीक ही कह रही है,’’ सुनंदा की मां हौले से बोलीं.

‘‘अब जिसके जी में जो आए, वो करो. ये नए ज़माने की लड़कियां, किसी की क्यों कर सुनेंगी,’’ बुआजी भुनभुनाईं.

सुनंदा ने उनकी बात अनसुनी कर दी. नीला से कहा,‘‘मां, मेरी और बिटिया की आरती उतारिए. देखिए, वो कैसे टुकुर-टुकुर आपकी ओर देख रही है.’’

नीला की आंखों से झर-झर आंसू बह निकले. कांपते हाथों से उन्होंने सुनंदा का टीका किया, उसकी गोद में साड़ी, फल और मिठाई डाली. फिर पोती के माथे पर तिलक लगाया, उसकी आरती उतारी. सुनंदा ने बच्ची को उनकी गोदी में डाल दिया. बच्ची ने दादी के चेहरे पर हाथ फेरा मानो उनके आंसू पोंछ रही हो.

नीला ने सुनंदा को गले से लगा लिया. मन का सारा ग़ुबार बह गया था.

इस घटना को दो साल बीत गए हैं. सुनंदा और उसकी बेटी एकदम स्वस्थ है, नीला के टीका करने से घर में कोई

अनिष्ट नहीं हुआ. हां, एक अच्छी बात यह हुई कि नीला भी मान्यताओं के अंधानुकरण के बदले उनको जांचने लगी हैं, उनके पीछे की भावना को पहचानने की कोशिश करने लगी हैं.....

हृदय परिवर्तन कहानी   अनिल जैन


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