मॉडर्न होना फैशन नहीं, संवेदना है

 रात का समय था। राकेश अपने ऑफिस की थकान लिए घर लौटा। जैसे ही ड्राइंग रूम में प्रवेश किया, देखा कि डाइनिंग टेबल पर नेहा पहले से बैठी थी। खाने की थाली सजी हुई थी, लेकिन माहौल में अजीब-सी खामोशी थी। टीवी बंद था, बच्चे अपने कमरे में थे, और नेहा के चेहरे पर गंभीरता झलक रही थी।

राकेश ने कुर्सी खींची और बैठते हुए कहा, “आज इतना सन्नाटा क्यों है? सब ठीक तो है?”

नेहा ने हल्की सी ठंडी साँस लेकर कहा, “ठीक क्या होना है? जब हर दिन वही पुरानी बातें दोहराई जाती हैं, तो ज़िंदगी कब तक ठीक रह सकती है?”

राकेश ने चम्मच रखते हुए कहा, “मतलब क्या है तुम्हारा? मैंने क्या कह दिया?”

नेहा ने उसकी ओर देखते हुए कहा, “आज ऑफिस से तुम्हारे कुछ दोस्त आए थे। उनके सामने तुम जिस तरह से मुझसे बात कर रहे थे, वो क्या ठीक था? तुमने मुझे यूँ सबके सामने डांटा जैसे मैं कोई घरेलू नौकरानी हूँ।”

राकेश ने भौंहें चढ़ाई, “नेहा, तुमने मेरी बात को गलत तरीके से लिया। मैंने तो बस यह कहा कि आगे से ऐसे किसी मीटिंग के बीच में मत आना।”

“गलत तरीके से लिया?” नेहा का स्वर तेज़ हो गया। “तो क्या तुम्हें ये ठीक लगा कि तुम अपने साथियों के सामने मुझे रोक दो? मैं कोई अनपढ़ या गँवार औरत नहीं हूँ जो हर किसी के सामने अपमान सह लूँ। मैं भी पढ़ी-लिखी, आत्मनिर्भर और समझदार हूँ। अगर तुम खुद को मॉडर्न समझते हो तो अपनी पत्नी के आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाना कैसा मॉडर्न व्यवहार है?”

राकेश भी अब अपनी कुर्सी पीछे खिसकाते हुए बोला, “अगर तुम मॉडर्न हो तो पहले खुद को समझो। बात को तूल देने से कोई सभ्यता नहीं दिखती। अपने पति के सामने ऊँची आवाज़ में बोलना क्या यही आधुनिकता है? मैं भी सबके सामने तुम्हें कुछ कह सकता था, लेकिन संयम रखा।”

“संयम?” नेहा ने तिलमिलाते हुए कहा, “संयम तो तब होता है जब आदमी अपने शब्दों का ध्यान रखे, न कि पत्नी को बार-बार दूसरों के सामने नीचा दिखाए।”

माहौल में तनाव फैल चुका था। डाइनिंग टेबल पर रखी दाल ठंडी हो चुकी थी, लेकिन गुस्से की गर्मी बढ़ती जा रही थी। तभी पास के कमरे से एक खाँसी की आवाज़ आई — राकेश की माँ, सुषमा देवी, वहाँ खड़ी थीं।

“बस करो दोनों,” उन्होंने धीमे स्वर में कहा, “कब तक यह बच्चों जैसी बातें करते रहोगे?”

दोनों चुप हो गए। सुषमा देवी ने कुर्सी खींची और बैठ गईं। उनके चेहरे पर उदासी थी, लेकिन आवाज़ में दृढ़ता।

“नेहा,” उन्होंने कहा, “तुम गलत नहीं हो, आत्मसम्मान हर इंसान का होता है, चाहे वह महिला हो या पुरुष। लेकिन आत्मसम्मान और अहं में बहुत पतली रेखा होती है, और कई बार हम गुस्से में उस रेखा को पार कर जाते हैं। तुमने भी वही किया।”

फिर वे राकेश की ओर मुड़ीं, “और राकेश, तुम यह मत भूलो कि पत्नी घर की इज़्ज़त होती है, कोई वस्तु नहीं जिसे दूसरों के सामने टोका-टोकी की जाए। तुम ऑफिस के बॉस नहीं हो, पति हो। घर में बराबरी से चलना होता है, आदेश से नहीं।”

दोनों सिर झुकाए बैठे रहे। सुषमा देवी ने गहरी साँस ली और बोलीं, “तुम दोनों ही शिक्षित हो, समझदार हो, लेकिन ज़िंदगी सिर्फ किताबों से नहीं चलती। रिश्तों की बुनियाद सम्मान और धैर्य से बनती है। आधुनिकता कपड़ों, भाषा या स्टाइल में नहीं, बल्कि सोच में होती है। मॉडर्न वही है जो दूसरे को समझे, न कि सिर्फ खुद को सही माने।”

नेहा की आँखों से आँसू टपक पड़े। वह बोली, “माँ, मैं तो बस इतना चाहती हूँ कि मुझे भी बराबरी से सुना जाए। जब पति पत्नी को सबके सामने नीचा दिखाता है, तो मन टूट जाता है।”

सुषमा देवी ने उसका हाथ थामा, “बेटी, कोई भी रिश्ता तभी चलता है जब दोनों में संवाद बना रहे। चुप्पी रिश्तों की सबसे बड़ी दुश्मन होती है। अगर राकेश से शिकायत थी, तो अकेले में बात करती, सबके सामने नहीं।”

राकेश बोला, “माँ, मैं भी यही कहना चाहता था कि वो मेरी बात को समझे, पर शायद मैं तरीका गलत चुन गया।”

“यही तो सीखने की बात है बेटा,” सुषमा ने कहा, “रिश्ता मजबूत तभी होता है जब ‘मैं’ और ‘तुम’ की जगह ‘हम’ आ जाए। आजकल लोग मॉडर्न बनने की होड़ में रिश्तों को नाजुक बना रहे हैं। असली मॉडर्न वही है जो अपने अहं को पीछे छोड़कर रिश्ते को आगे रखे।”

नेहा ने धीमे स्वर में कहा, “शायद मैं ज़रूरत से ज़्यादा प्रतिक्रिया दे गई।”

“और मैं भी,” राकेश ने स्वीकारा, “मुझे तुम्हारी भावनाओं का ध्यान रखना चाहिए था।”

सुषमा ने मुस्कुराते हुए कहा, “देखा, बात करना ही सबसे बड़ी दवा है। मतभेद हर रिश्ते में होते हैं, लेकिन संवाद ही उन्हें मिटाता है। ताली दोनों हाथों से बजती है, और अगर एक हाथ पीछे खींच लिया तो आवाज़ कभी नहीं आएगी।”

डाइनिंग टेबल पर अब वही सन्नाटा था, पर यह सन्नाटा भारी नहीं, सुकूनभरा था। नेहा उठी, और राकेश की प्लेट में दाल डालते हुए बोली, “खाना ठंडा हो गया है, लेकिन आज से कोशिश रहेगी कि रिश्ता कभी ठंडा न पड़े।”

राकेश मुस्कुराया, “मैं भी वादा करता हूँ कि अब शब्दों से नहीं, समझ से बात करूँगा।”

सुषमा ने दोनों की ओर देखा, आँखों में संतोष झलक रहा था। “याद रखो बच्चों,” उन्होंने कहा, “आधुनिकता का मतलब यह नहीं कि तुम परंपराओं को छोड़ दो, बल्कि यह कि तुम उनमें सुधार लाओ — अपने व्यवहार से।”

नेहा और राकेश दोनों एक साथ उठे, और माँ के चरणों में झुक गए।

“धन्यवाद माँ,” नेहा ने कहा, “आपने आज सिखाया कि मॉडर्न होना फैशन नहीं, संवेदना है।”

सुषमा ने उनके सिर पर हाथ रख दिया, “बस यही समझ लो, और जीवन की गाड़ी सही राह पर चलती रहेगी।”

उस रात तीनों ने साथ खाना खाया। बाहर ठंडी हवा चल रही थी, पर घर के भीतर एक नई गर्माहट थी — समझ, सम्मान और प्रेम की गर्माहट।

 मूल लेखिका : उमा महाजन 


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