"अरे बहू! कहाॅं हो? एक जरूरी बात बतानी है।" कमला ने हाॅंफते हुए बहू को आवाज लगाई। ।
बहू : मम्मी जी ! क्या हुआ ? आपकी तबियत तो ठीक है ?
मम्मी : बेटा मैं तो ठीक हूॅं। मैं पार्क में सैर करने गई थी।वहाॅं पर महिलाओं के ग्रुप में चर्चा हो रही थी-- सास ने रुक-रुक कर अपनी बात बताना शुरू किया।
बहू : कैसी चर्चा, मम्मी जी!
सास : चर्चा यह थी कि अपने दीपू का जो बच्चों का ग्रुप है, उसमें एक बच्चा है 'अमित' जो अभी पड़ोस में नए किराएदार आए हैं, उनका बेटा।
बहू : मम्मी ! आगे भी तो बताओ, क्या हुआ ?
सास : बताती हूॅं। वहाॅं पर चर्चा थी कि वह बच्चा 'छक्का' है। आपस में सबने तय किया है कि कोई भी अपने बच्चे को उसके साथ खेलने नहीं भेजेगा। दीपू को मना कर देना।
बहू : यह छक्का क्या होता है ?
सास : बहू! हिजड़े को छक्का भी कहते हैं। वही हिजड़े जो दीपू के होने पर बधाई माॅंगने आए थे।
बहू : मम्मी जी! आप तो बहुत समझदार हैं। ऐसी छोटी सोच की बातों में क्यों आ गईं ? ऐसी बातें करके हमें बच्चों को भेदभाव करना नहीं सिखाना है। उस बच्चे का नाम 'अमित' है। हमें उसे इसी नाम से बुलाना है। वह भी तो अपने परिवार का कुलदीपक है। यदि उसमें कोई कमी है, तो उसमें उसका क्या दोष है। आप उसके गुणों भी तो देखिए। देखने में कितना प्रियदर्शी है। खेलने में कितना साहसी और फुर्तीला है। अपनी कक्षा में भी प्रथम स्थान पाता है।
सास : पर बहू, रहेगा तो हिजड़ा ही ना। हमारे बच्चों का उसके साथ रहना सही नहीं है।
बहू : मम्मी जी! हमें किसी के बच्चों को हीनता बोधक शब्दों से बुलाने या चिढ़ाने का कोई अधिकार नहीं है। इस तरह से तो हम कहीं ना कहीं अपने समाज को ही कमजोर बना रहे हैं। बड़ा होकर अपनी रूचि के अनुसार वह क्या करना चाहेगा, यह उसकी मर्जी।
सास : नहीं बहू! तुम समझती नहीं हो। इनके हाव-भाव और हरकतों को देखकर कोई भी अपने घरों / प्रतिष्ठानों में इन्हें काम नहीं देता है। ये या तो भीख माॅंगते हैं या नाच-गाकर बधाई माॅंगते हैं।
बहू : मम्मी जी ! आप अपनी दकियानूसी दुनियाॅ से बाहर निकलें। अब यह वर्ग न्यायालय से एक लम्बी लड़ाई लड़कर स्त्री और पुरुष के समान ही बराबरी का दर्जा पा चुका है। इन्हें Voting Right भी मिल चुका है। ये सरकारी नौकरियों में भी आने लगे हैं।
धर्म के क्षेत्र में भी इनका प्रवेश हो चुका है। इन्होंने किन्नर अखाड़ा का गठन कर लिया है, जिसकी महामंडलेश्वर आचार्य लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी हैं और जूना अखाड़े से इन्हें मान्यता भी मिल चुकी है ।
सास : अच्छा! अब ये साधु संतों की श्रेणी में भी आ गये हैं।
बहू : हाॅं, मम्मी जी! अब आप अपने ग्रुप की अन्य महिलाओं को भी यह बात बताइए और उन्हें भी जागरूक करिए कि ऐसे बच्चों को हीन दृष्टि से न देखें। ऐसे बच्चे भी अन्य बच्चों के समान ही हमारे देश के कर्णधार हैं।
आवश्यकता है कि जल्दी ही सरकार ऐसा कानून बनाये कि यदि कोई भी इनके साथ अभद्र व्यवहार करे, तो कानून उस पर शिकंजा कसे।
सास : ठीक है बहू। अब मेरी समझ में तुम्हारी बात आ गई है। तुमने तो मेरी आंखें खोल दीं। ये भी हमारे समाज का अभिन्न अंग हैं। मैं अन्य सभी महिलाओं को भी यह बात समझाऊॅंगी। अब कोई भी बच्चा अमित के साथ खेलना या बातें करना बन्द नहीं करेगा
स्वरचित :
कुसुम अग्रवाल, गाजियाबाद
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