रूह का सुकून है सच

 बात उन दिनों की है जब सुषमा ने हिन्दी अध्यापिका की नौकरी के लिए साक्षात्कार देने जाना था। वह एक बहुत ही सम्मानित प्राइवेट स्कूल में साक्षात्कार देने गई थी। उसकी लिखित परीक्षा बहुत अच्छी हुई थी और उसने कक्षा में भी बच्चों को बहुत अच्छे से पढ़ाया था। फिर उसे बहुत डर लग रहा था क्योंकि साक्षात्कार के समय कुछ पी.एच.डी. एवं कुछ बहुत ही अनुभवी लोग आए थे और उसका अनुभव सिर्फ़ दो वर्ष था और उसे अंग्रेजी भी बोलनी नहीं आती थी। जब सुषमा को साक्षात्कार के लिए बुलाया गया तो उसने हिन्दी से सम्बन्धित जितने भी प्रश्न पूछे गए, सबके उत्तर बहुत ही अच्छे से दिए और विषय से हटकर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर भी दिए पर एक प्रश्न का उत्तर देने से पहले उसके मन में एक विचार आया कि "साँच को आँच नहीं।" मुझे उनके द्वारा पूछे प्रश्न का उत्तर सच बोलना है अब चाहे नौकरी मिले या नहीं। वह प्रश्न था कि "आप हमारे द्वारा पूछे गए सभी प्रश्नों के उत्तर हिन्दी में क्यों दे रहे हो?" तब सुषमा का उत्तर था," मैं यहाँ हिन्दी अध्यापिका के साक्षात्कार के लिए आई हूँ। मुझे अपनी हिन्दी भाषा से प्यार है और मैं अच्छी तरह अंग्रेज़ी नहीं बोल सकती। गलत बोलने की बजाए मैं हिन्दी में सही ढंग से बोलना उचित समझती हूँ।" उसके बाद ईश्वर की मेहर से सुषमा को वह नौकरी मिल गई। उसने इतनी मेहनत की कि आज 20 वर्षों से वह उसी स्कूल में पढ़ा रही है।  


नाम: रचना गुलाटी


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