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हिम्मत

 सुबह-सुबह सूरज़ की किरणों से अंधियारा ज़रुर छँट जाता है…..  लेकिन आत्मा पर छाया अंधियारा शायद इस रोशनी में ऑर गहरा होता जाता है । जहाँ ठंड के मौसम में पक्षी अपनी मधुर ध्वनि में चहचहा रहे थे । वहीं भीनी-भीनी धूप झरोखों से झाँक मेरे पैरों को गरमाहट दे ना उठने का बहाना बनी हुई थी । उसी क्षण बाहर से किसी चीज के गिरने की आवाज़ आती है…..  और मैं धूप को झुठला बाहर जा कर देखती हूँ कि …. नकुल खाना ज़मीन पर फैंक मीरा पर चिल्ला रहा होता है । मैं उसे रोकने के लिए आगे बढ़ती हूँ पर उसकी तेज आवाज़ के कारण बीच में ही थम जाती हूँ । नक़ुल मीरा पर चिल्ला रहा था कि तुमनें मुझे ठण्डा खाना कैसे परोस दिया । ये सुन मीरा बोली मैंने आपको गर्म खाना ही दिया था । लेकिन आपका फ़ोन आ गया और बातों के चक्कर में खाना ठंडा हो गया । अगर आपको ये नहीं खाना तो मैं गर्म बना देती हूँ पर मुझ पर चिल्लाइए मत ! बस मीरा का इतना कहना ही नकुल के सम्मान में विरोध था । जिसे सुन वो मीरा पर कटाश करने लगा ये सब देख मेरे वो सब घाव हरे हो गए जो दिल के किसी कोने में क़ैद थे । वो सब घाव आज उन धुंधली यादों से बाहर निकल सजीव हो गए हो । ये सब देख ऐसा लग रहा था कि ये मेरा कल ही है जो वर्तमान में मीरा के रूप में खड़ा है । मैं इसी कश्मकश में खड़ी रही । लेकिन नकुल और मीरा का झगड़ा बढ़ता चला गया । नकुल जो धैर्य से कमजोर लेकिन गुस्से का तेज था । उसने जैसे ही मीरा पर हाथ उठाया ना जाने मुझमें कहाँ से ताक़त आ गई जो मैंने तुरंत उसके हाथ को बीच में ही रोक दिया । ये देख नकुल स्तब्ध हो गया और मीरा की आँखे जो उम्मीद छलक रही थी वो माया के हौसले से मुकम्मल हो गई । आज नकुल कुछ भी कहने करने से पहले सोचता है ।

कहने को ये बस एक वाक्या या यूँ कहे बस एक छोटी सी बात थी । पर हम ये क्यों भूल जाते है बात चाहे छोटी हो या बड़ी बढ़ने का मौका मिलेगा तो बढ़ेगी ही इसलिए हर बात , हर जुल्म को बढ़ने से रोको ।

 स्नेह ज्योति 


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