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एक नजरिया यह भी

  सुनो,मनोज बेटा देखो कुछ मजदूर नेता मजदूरों को भड़का रहे हैं,तुम मजदूरों से बात करके,उन्हें हड़ताल करने से रोकने का प्रयास करो।तुम्हे मेरी ओर से फ्री हैंड है।बस हड़ताल नही होनी चाहिये।

      मैं पूरी कोशिश करता हूँ बाबूजी।

         मनोज के पिता स्वयं मजदूर थे,इस कारण उसे मजदूरों के मनोविज्ञान की जानकारी थी,साथ ही उसके मजदूर वर्ग में सम्बन्ध भी थे।उसी  आधार पर मनोज ने सेठ जी और मजदूरों की सीधी वार्ता कराकर समझौता करा दिया।

        सेठ बनारसी दास जी यह एक बड़ी सीमेंट की फैक्टरी थी।जिसमे मनोज पार्ट टाइम कार्य करता था,जिससे वह अपनी पढ़ाई का खर्च निकाल सके। असल मे मनोज और सेठ बनारसी दास के बेटे सुनील दोनो ग्रेजुएशन में सहपाठी थे।मनोज बिज़नेस मैनेजमेंट में आगे पढ़ना तो चाहता था पर उसकी आर्थिक स्थिति ऐसी नही थी जो वह आगे पढ़ सके।सुनील मनोज की स्थिति को समझता था, उसने अपने मित्र की सहायता के लिये अपने पिता से बात की।सेठ बनारसी दास जी ने अपने बेटे की बात सुनकर पहले तो चुप रहे फिर बोले बेटा मनोज को मेरे पास भेजना।सुनील को लग रहा था कि उसके पिता के लिये मनोज की आगे की पढ़ाई का खर्चा उठाना कोई बड़ी बात नही है, लेकिन पिता ने तो कोई स्पष्ट उत्तर दिया ही नही।मायूस से सुनील ने मनोज को अपने पिता के पास भेज दिया।

      सेठ बनारसी दास जी ने मनोज से कहा देखो बेटा ये अच्छी बात है तुम आगे उच्च शिक्षा लेना चाहते हो,मैंने तुम्हारी फीस भरने को अकॉउंटेंट को बोल दिया है,पर यह मेरा तुम पर कोई उपकार नही है,यह राशि तुम पर उधार रहेगी,तुम्हे दो घंटे पार्ट टाइम मेरी इस फैक्टरी में प्रतिदिन कार्य करना पड़ेगा,उसमें से तुम्हे जेब खर्च तो मिलेगा,बाकी तुम्हारे उधारी में एडजस्ट होते रहेंगे,मंजूर हो तो बोलो।मनोज ने यह शर्त स्वीकार कर ली।मनोज का उसी शहर में दाखिला हो गया।अब मनोज बिज़नेस मैनेजमेंट की पढ़ाई करने लगा और साथ ही सेठ बनारसीदास जी की फैक्टरी में पार्ट टाइम जॉब भी करने लगा।मनोज को लगता कि अपनी पढ़ाई के साथ वह प्रैक्टिकल ट्रेनिंग भी फैक्टरी में ले रहा है।दूसरे उसे लगता कि अपनी उच्च शिक्षा के लिये उसको या उसके पिता को किसी के आगे हाथ नही पसारने पड़े।

        मनोज द्वारा जिस ढंग से मजदूरो को टैकिल करके उनकी हड़ताल टलवा दी,उससे वह काफी प्रभावित हुए।मनोज द्वारा जैसे ही अपनी शिक्षा पूर्ण की सेठ बनारसीदास जी ने उसे अपनी फैक्टरी का मैनेजर नियुक्त कर लिया।सपने पूरे हो गये थे।

         एक दिन सुनील ने अपने पिता से कहा बाबूजी मुझे एक बात समझ नही आयी, मैं जानता हूँ आपने ही मनोज की पढ़ाई का पूरा खर्च उठाया है,फिर उसे आपने उसे पार्ट टाइम नौकरी पर क्यों बुलाया, जबकि वह मेरा मित्र था।बनारसीदास जी बोले बेटा, तुम समझ भी नही सकते थे ,बेटा यदि मैं ऐसे ही उसकी मदद तुम्हारे कारण कर देता तो वह सदैव तुम्हारे अहसान से लदा रहता, उसमें हीन भावना घर कर जाती,दूसरे उसमें आत्मस्वाभिमान की कमी आती।मैंने उसे नौकरी देकर उसके एवज में उसका खर्च उठाया है।आज वह पूरी तरह आत्मसम्मानी और सफल मैनेजर है।मजदूरों की हड़ताल उसने जिस तरह नही होने दी,उससे मैं उसकी काबिलियत को भी पहचान गया।जीवन भर उसे लगेगा कि वह सेल्फ मेड है,जो है अपनी मेहनत से है और अपने बलबूते है। बेटा अंधे की लकड़ी खुद बनने से बेहतर है उसे अपनी लकड़ी से चलना सिखा दो,जिससे वह किसी का मोहताज ही न रहे,मैंने यही किया है।

     अवाक सुनील के सामने अपने पिता का दूसरा ही रूप था,उसने आगे बढ़कर अपने पिता के चरण स्पर्श कर लिये।

बालेश्वर गुप्ता,नोयडा

मौलिक एवम अप्रकाशित।


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