राजेश जी ने अपने तबादले के बाद नए शहर के नए बैंक में वरिष्ठ प्रबंधक के रुप में कार्य-भार सँभाला।दफ्तर में पहले दिन सभी कर्मचारियों से औपचारिक परिचय के बाद दफ्तर का मुआयना किया और अपने केबिन में चले गए ।कुछ देर बाद उन्होंने घंटी बजाकर चपरासी को बुलाया।चपरासी दिनेश ने आने में पाँच मिनट की देरी लगा दी।राजेश जी उसका इंतजार करते रहें।आने पर दिनेश ने न तो माफी मांगी,न ही अभिवादन किया।राजेश जी ने उसके व्यवहार को अनदेखा कर फाइलों का नाम बताते हुए कहा -" दिनेश!ये सभी फाइलें मेरी मेज पर लाकर रखो। मुझे अभी देखनी है।"
" जी सर!"कहकर दिनेश चला गया।दिनेश को गए हुए काफी समय हो चुका था।उसी समय एक वरिष्ठ कर्मचारी उमेश जी किसी काम से उनके केबिन में आते हैं।राजेश जी उनसे पूछते हैं -"उमेश जी! मुझे चपरासी दिनेश के बारे में कुछ बता सकते हैं?"
उमेश जी -" सर! उसके बारे में पूछिए मत।वह एक नंबर का कामचोर है।छोटे-छोटे काम में भी बेवजह समय लगाता है।उसके पिता इसी बैंक में वरिष्ठ पदाधिकारी थे।इसका पढ़ने -लिखने में मन नहीं लगता था,तो इसके पिता ने जबरदस्ती बैंक में चपरासी की नौकरी लगवा दी।यह खुद को भी बैंक का वरिष्ठ पदाधिकारी ही समझता है।कुछ कहने पर सदैव लड़ने के लिए बाँहें चढ़ाए रखता है।" कहकर बाहर चला जाता है।
उसी समय दिनेश फाइलें मेज पर रखकर चला जाता है।
दफ्तर में राजेश जी दिनेश के व्यवहार पर कड़ी नजर रखते हैं ।दिनेश का व्यवहार सहकर्मी तथा बैंक ग्राहकों के साथ भी अच्छा नहीं रहता है।राजेश जी सबकुछ जानते हुए भी अनदेखा कर देते हैं,शायद उन्हें दिनेश के सुधरने की उम्मीद थी।परन्तु उनकी उम्मीदों को धता बताकर एक दिन तो दिनेश ने हद ही कर दी।बैंक में ग्राहक के साथ किसी बात पर हाथा-पाई करने लगा।बीच-बचाव करने आए अपने सहकर्मी पर भी उसने हाथ उठा दिया।
अपने पारदर्शी केबिन से राजेश जी सबकुछ देख रहे थे,जब उन्होंने देखा कि पानी सर से ऊपर जा रहा है,तब वे उठकर आएँ और अपनी शक्ति का इस्तेमाल करते हुए कहा -"दिनेश!मैं शुरु से तुम्हारा बर्ताव देख रहा हूँ।तुम सभी के प्रति बिल्कुल रुक्ष,शुष्क और असंवेदनशील हो।तुम सदैव लड़ने के लिए बाँहें चढ़ाएँ रहते हो।आज तो तुमने बैंक की इज्जत की अर्थी निकालने में कोई कसर नहीं रखी है! तुमने ग्राहक के साथ-साथ अपने सहकर्मी पर भी हाथ उठाया है।मैं तुम्हें तत्काल निलंबित करता हूँ।"
राजेश धमकी देते हुए -" मेरे पिताजी बैंक में वरिष्ठ अधिकारी रह चुके हैं।मैं सभी को देख लूँगा।"
राजेश जी -"गीदड़ भभकी मत दो।अभी दफ्तर से निकलो।"
दिनेश मुँह बनाकर दफ्तर से बाहर निकल गया।आज उसे समझ में आ चुका था कि सेर को भी सवा सेर मिल जाता है!
समाप्त।
लेखिका-डाॅक्टर संजु झा(स्वरचित)
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