साथी

 अपनी पत्नी सुधा की मांग भरते वक्त रामजीलाल की आँखें आँसू नही रोक पा रही थी शायद पत्नी को आखिरी बार जीभर के निहार लेना चाहते थे पर उनसे औपचारिकता कराकर रिश्तेदारो ने उन्हें तुरंत बाहर भेज दिया ...

छियासी वर्ष के करीब उम्र थी बुजुर्ग रामजीलाल की बुजुर्ग पत्नी सुधा की.. इसीलिये ढोल बाजे के साथ शवयात्रा शुरू हुई ...मूकदर्शक बने रामजीलाल ने कानों में मफलर कसकर बांध लिया, मानो ढोल की आवाज़ से उन्हें और कष्ट हो रहा हो...उन्हें वो दिन रह रहकर याद आ रहा था जब पहली बार शादी के दिन वो सुधा को डोली मे लेकर आये थे तब यही बैंड बाजे उन्हें सुहावने लग रहे थे ...

पहले बेटी के फिर बेटे के जन्म पर ...और फिर उनकी शादी पर ....ऐसी धूमधाम मे बैंड बाजा बजाना ...खुद रामजीलाल की पसंद होती वो जिद करके बजवाते थे मगर आज ...उन्हें ये सिर्फ परेशान कर रहा था कारण उनकी जीवनसंगनी सुधा उन्हें छोडकर इस दुनिया से जा चुकी थी जो हर सुख दुख मे उनके कदमों से कदम मिलाकर साथ खडी थी ....

और फिर जब आखिरी विदाई को सुधा की देह को आग दिलाई गई तो रामजीलाल का हाथ कांप उठा...जलती चिता को वो एकटक देखते रहे ...धीरे धीरे सब चले गये, पर वो बैठे रहे...

चलो बाबा.. शाम गहरा रही है..." पोते ने उठाने के लिए अपना हाथ बढ़ाया। चलता हूं बेटा अड़सठ सालों तक का साथ था, अब अकेला छोड़कर कैसे चला जाऊं... अंतिम लौ तक तो साथ निभा लूं.. वरना वह नाराज़ हो जायेगी मुझसे..." कहते हुए रामजीलाल ने पोते का हाथ जकड़ लिया...

कुछ वक्त बाद जब बेटे बहु और पोते ने दुबारा रामजीलाल को वापस चलने को हिलाया तो ....

रामजीलाल का शरीर एकदम ठंडा हो चुका था वो भी जीवन भर साथ निभाने वाली अपनी पत्नी अपनी अर्धागिनी सुधा का साथ देने इस दुनिया को छोडकर जा चुके थे...


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