बदलता रुख़

 माही शहर की पॉश कॉलोनी में रहती थी । दो वर्ष पूर्व माही के पति का सड़क दुर्घटना में देहांत हो गया था ।

सार्थक ,माही का इकलौता बेटा था । पति के जाने के बाद माही ने अपने और बेटे के जीवन यापन करने के लिए टिफिन सर्विस शुरू कर दी थी ।

माही के जीवन का अब एकमात्र उद्देश्य था ,कि अपने बेटे को पढ़ा लिखाकर उच्चाधिकारी बनाना ।माही दिनरात घर में मेहनत करती ,और बेटा पढ़ाई में लगा रहता था।

टिफिन सेंटर होने के कारण माही के घर में लोगों का आना जाना लगा रहता था ।

सार्थक जब प्रशासनिक परीक्षा की तैयारी कर रहा था ,तो माही को लगा कि उसे पढ़ने के लिए , कॉलोनी में ही अलग कमरा दिलवा देना चाहिए ।

माही ने कमरे के लिए जब कॉलोनी वालों से ,बात की तो सभी ने कुछ न कुछ बहाना लगा कर मना कर दिया ।

माही समझ गई थी कि लोग समझ रहे हैं कि मैं ज़्यादा किराया नहीं दे पाऊँगी ।

माही ने फिर ख़ुद लोगों को टिफ़िन देने जाना शुरू कर दिया और लोगों का आवागमन कम कर दिया ।

माही और सार्थक की अथक मेहनत से दूसरे प्रयास में ही सार्थक का इनकम टैक्स ऑफिसर में चयन हो गया । माही की खुशी का ठिकाना न रहा । पॉश कॉलोनी के लोगों का बधाई देनें के लिए घर में ताँता लग गया ।

तथाकथित सभी संपन्न लोग बुके लेकर आ रहे थे ,साथ ही कमरा न देनें की सफ़ाई भी पेश करते जा रहे थे ।

माही पद के साथ, मिली लोगों की लल्लो चप्पो को देखकर हैरान हुई जा रही थी सोच रही थी कि क्या सचमुच संबंधों का आकलन पद और पैसे से ही होता है । माही मूक द्रष्टा बनी अपने बेटे की सफलता का लुत्फ ले रहो थीl

मौलिक, अप्रकाशित 

रश्मि वैभव गर्ग


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