सर्दियों की एक सर्द सुबह थी। घर के पिछले हिस्से में बैठकर बर्तन मांजती हुई सावित्री के हाथ तो मशीन की तरह चल रहे थे, लेकिन उसका मन कहीं बहुत दूर अपनी उधेड़बुन में उलझा हुआ था। सामने नल से गिरते पानी की आवाज़ में उसे शहनाई की धुनें और ढोलक की थाप सुनाई दे रही थी। अगले ही हफ्ते उसकी इकलौती बेटी, अंजलि का विवाह था। एक गरीब और विधवा माँ होने के नाते, सावित्री ने दिन-रात एक करके, दूसरों के घरों में झाड़ू-पोछा करके पाई-पाई जोड़ी थी। लेकिन किसी ने सच ही कहा है कि गरीब के घर की शादी एक ऐसा कुआं होती है, जिसकी गहराई का कोई अंदाज़ा नहीं लगा सकता। शादी की तारीख जैसे-जैसे नज़दीक आ रही थी, सावित्री की रातों की नींद उड़ चुकी थी।
"सावित्री! ज़रा अंदर आना," ड्राइंग रूम से सेठानी वसुंधरा जी की आवाज़ आई। सावित्री ने जल्दी से अपने गीले हाथ साड़ी के पल्लू से पोंछे और सहमी हुई सी अंदर गई। वसुंधरा जी शहर के एक बहुत बड़े व्यापारी की पत्नी थीं, लेकिन उनका स्वभाव उनके रुतबे से बिल्कुल अलग, बहुत ही नरम और दयालु था। पिछले बारह सालों से सावित्री उनके घर का काम कर रही थी।
सावित्री जब अंदर पहुँची, तो उसने देखा कि मेज़ पर एक बहुत ही सुंदर, लाल रंग का मखमली डिब्बा रखा हुआ था। वसुंधरा जी ने मुस्कुराते हुए वह डिब्बा सावित्री की ओर बढ़ा दिया। "ये लो सावित्री, मेरी तरफ से अंजलि बिटिया के लिए एक छोटा सा शगुन। इसे मेरी ओर से आशीर्वाद समझ कर रख लेना।"
सावित्री ने झिझकते हुए डिब्बा खोला। उसके अंदर 90 के दशक के किसी क्लासिक बॉलीवुड फिल्म के दृश्य की तरह, एक बेहद खूबसूरत सुर्ख लाल रंग की बनारसी साड़ी, माथे की चमकती हुई बिंदिया, खनकती हुई कांच की चूड़ियां, सोने का पानी चढ़ा हुआ एक कंगन, और चांदी की भारी पायल के साथ पूरा सुहाग का जोड़ा रखा था। इतनी कीमती और सुंदर चीज़ें देखकर सावित्री की आँखें भर आईं। उसने कांपते हाथों से वह डिब्बा माथे से लगा लिया।
"मालकिन, यह सब तो बहुत महँगा है। आपने इतना कुछ क्यों किया? आपका आशीर्वाद ही मेरी बच्ची के लिए बहुत था," सावित्री रुंधे हुए गले से बोली।
वसुंधरा जी ने आगे बढ़कर सावित्री के कंधे पर हाथ रखा, "पागल मत बनो। बारह साल से तुमने मेरे घर को अपना समझ कर सँभाला है। अंजलि सिर्फ तुम्हारी नहीं, मेरी भी तो बेटी जैसी ही है। और बेटियों की विदाई खाली हाथ नहीं की जाती।"
सावित्री की आँखों से आँसुओं की धारा बह निकली। वह कुछ देर चुप रही, अपने साड़ी के पल्लू की गाँठ को उँगलियों में लपेटती रही। उसके चेहरे पर एक अजीब सा संकोच और बेबसी छाई हुई थी।
"क्या बात है सावित्री? कुछ परेशान लग रही हो? कोई और बात है तो बेझिझक कहो," वसुंधरा जी ने उसकी मनःस्थिति को भाँपते हुए पूछा।
सावित्री ने अपनी नज़रें झुका लीं और हिम्मत जुटाते हुए बोली, "मालकिन... अगर आप बुरा न मानें तो मुझे आपसे एक मदद चाहिए थी।"
"बोलो, क्या चाहिए?"
"मालकिन, मुझे दस हज़ार रुपये उधार चाहिए थे। बिटिया की शादी है, टेंट वाले को एडवांस देना है और मेहमानों के खाने का भी इंतज़ाम करना है। पैसे हाथ में रहेंगे तो मुझे हिम्मत बँधी रहेगी। मैं वादा करती हूँ कि शादी के तुरंत बाद, मैं आपकी तनख्वाह से कटवा कर एक-एक पैसा चुका दूँगी।" सावित्री के शब्द उसके होठों पर कांप रहे थे। उसे डर था कि कहीं मालकिन इतनी बड़ी रकम देने से मना न कर दें।
वसुंधरा जी मुस्कुराईं। उन्होंने अपनी अलमारी खोली और दस हज़ार की जगह सावित्री के हाथ में बीस हज़ार रुपये रख दिए। सावित्री चौंक गई। "मालकिन, यह तो बहुत ज़्यादा हैं।"
"सावित्री, यह उधार नहीं है। यह मेरे परिवार की तरफ से तुम्हारी बेटी के कन्यादान का हिस्सा है। एक माँ को अपनी बेटी की शादी में पैसों के लिए किसी के आगे हाथ फैलाने की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए। और अगर फिर भी किसी चीज़ की कमी पड़े, तो आधी रात को बेधड़क मेरे पास आ जाना।" मालकिन के इन शब्दों ने सावित्री के दिल का सारा बोझ उतार दिया।
शादी का दिन आ गया। सावित्री की छोटी सी बस्ती में गेंदे के फूलों और रंग-बिरंगी लाइटों से सजावट की गई थी। 90 के दशक के मशहूर विदाई गीत लाउडस्पीकर पर बज रहे थे। सब कुछ बहुत अच्छे से चल रहा था कि अचानक रात को बारातियों के खाना खाते समय एक अजीब सी मुसीबत खड़ी हो गई। दूल्हे के ताऊ जी बात-बात पर रूठने वाले इंसान थे। उन्होंने अचानक एक सोने की चैन की मांग कर दी और कहा कि अगर चैन नहीं मिली तो वे फेरों में नहीं बैठेंगे। सावित्री के तो जैसे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसकी सारी जमा-पूंजी खत्म हो चुकी थी। वह पंडाल के एक कोने में खड़ी फूट-फूट कर रो रही थी। उसे अपनी बेटी का घर बसने से पहले ही उजड़ता हुआ दिखाई दे रहा था।
तभी बस्ती की तंग गली में एक बड़ी सी कार आकर रुकी। कार से वसुंधरा जी और उनके पति बाहर उतरे। सावित्री उन्हें देखकर दौड़ती हुई उनके पास गई और अपने आँसुओं को रोक नहीं पाई। वसुंधरा जी ने पूरी बात समझी और सीधे दूल्हे के ताऊ जी के पास गईं। उनके रुतबे और प्रभावशाली व्यक्तित्व को देखकर ताऊ जी भी थोड़े सहम गए।
वसुंधरा जी ने अपने पर्स से एक भारी सोने की चैन निकाली और दूल्हे के गले में डालते हुए बहुत ही शांत लेकिन सख्त लहज़े में कहा, "यह अंजलि के मायके वालों की तरफ से है। लेकिन याद रखिएगा, असली सोना यह चैन नहीं, बल्कि वह संस्कारी बेटी है जिसे हम आपके घर भेज रहे हैं। अब बिना किसी देरी के फेरे शुरू करवाइए।"
ताऊ जी का सिर शर्म से झुक गया और बारात में फिर से खुशी की लहर दौड़ गई।
जब सुबह विदाई का समय आया, तो अंजलि रोते हुए अपनी माँ के गले लग रही थी। शहनाई की दर्द भरी धुन ने पूरे माहौल को रुला दिया था। अंजलि सावित्री से मिलने के बाद सीधे वसुंधरा जी के पैरों में गिर पड़ी। वसुंधरा जी ने उसे उठाकर अपने सीने से लगा लिया। उस पल सावित्री को लगा कि जैसे उसने दुनिया की सारी दौलत पा ली हो। इंसानियत का वह खूबसूरत रिश्ता जो एक मालकिन और एक नौकरानी के बीच बना था, उसने समाज के सारे बंधनों को पीछे छोड़ दिया था।
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