अस्पताल के ओपीडी वार्ड में मरीजों की लंबी कतार लगी थी। मैं, डॉक्टर समीर, अपनी रूटीन जांच में व्यस्त था। तभी वार्ड बॉय ने आकर बताया कि एक बूढ़ी औरत पिछले दो दिन से सिर्फ मुझसे ही मिलना चाहती है। मैंने दूर से उस औरत को देखा, वह एक कोने में बैठी थी। मैले कुचैले कपड़े, चेहरे पर गहरी झुर्रियां और आँखों में एक अजीब सी आस। मैंने उसे टाल दिया। कह दिया कि मेरे पास समय नहीं है, उन्हें किसी और डॉक्टर को दिखा दो। सच कहूँ तो, मुझे उस औरत से नहीं, बल्कि उस उम्र की हर उस औरत से नफरत थी जिसके चेहरे पर एक माँ होने का भाव होता था। मुझे हर ऐसी औरत में अपनी माँ की छवि नजर आती थी, वह माँ, जिसने मुझे पाँच साल की उम्र में एक अनाथालय की सीढ़ियों पर रोता हुआ छोड़ दिया था और कभी पलट कर नहीं देखा। मेरी नजर में हर औरत ममता से शून्य थी, जो सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए अपनी संतान को अनाथ कर कहीं दूर चली जाती है। मैंने उस औरत को बिना मिले ही वहाँ से जाने पर मजबूर कर दिया।
वक्त अपनी रफ्तार से बीतता रहा। इस घटना को करीब एक हफ्ता हो चुका था। अस्पताल की इमर्जेंसी ड्यूटी के दौरान अचानक रात के दो बजे कुछ पुलिसकर्मी एक स्ट्रेचर लेकर अंदर दाखिल हुए। एक पुलिस वाले ने बताया कि यह औरत पिछले दो दिनों से रेलवे स्टेशन के पास बेहोशी की हालत में पड़ी थी। भुखमरी और तेज बुखार ने इसकी जान निकाल रखी है। मैंने स्ट्रेचर की तरफ कदम बढ़ाए और जैसे ही उस मरीज का चेहरा देखा, मैं बुरी तरह चौंक पड़ा। यह वही औरत थी जिसे मैंने कुछ दिन पहले मिलने से मना कर दिया था। मेरे अंदर का डॉक्टर जाग उठा, लेकिन इंसान अब भी अतीत की कड़वाहट से भरा था।
पूछताछ करने पर पता चला कि इस बड़े शहर में उसका कोई नहीं है। वह नितांत अकेली थी। दो दिनों से कोई उसे देखने तक नहीं आया था। मेरे मन में एक सवाल कौंधा, क्या यह औरत सच में इतनी अकेली है? या इसके बच्चों ने भी इसे उसी तरह छोड़ दिया है, जैसे मेरी माँ ने मुझे छोड़ा था? शायद कर्मों का हिसाब यहीं होता है।
तमाम कड़वाहटों के बावजूद, मेरी मेडिकल एथिक्स मुझे उसे मरने के लिए छोड़ देने की इजाजत नहीं दे रही थीं। वह रात मैंने उसी वार्ड में, उसकी देखभाल में बिताई। ड्रिप लगाई, इंजेक्शन दिए और उसके माथे पर ठंडे पानी की पट्टियां रखीं। बुखार में तपते हुए वह बार-बार कुछ बुदबुदा रही थी, लेकिन शब्द स्पष्ट नहीं थे।
सुबह की पहली किरण के साथ उस औरत ने अपनी भारी पलकें खोलीं। उसकी आँखें सीधे मुझ पर आकर टिक गईं। उन आँखों में कोई अजनबीपन नहीं था, बल्कि एक ऐसा ठहराव था जिसने मुझे अंदर तक बेचैन कर दिया। मैंने अपनी स्टेथोस्कोप गले में डालते हुए पूछा, ‘‘आप कैसी हैं?’’
उसने कोई जवाब न दिया। बस मुझे एकटक देखती रही। उसकी आँखों के किनारों से आँसुओं की दो धाराएं बह निकलीं। उसके कांपते हुए हाथ हवा में उठे, जैसे वह मुझे छूना चाहती हो, लेकिन फिर कमजोरी से नीचे गिर गए। तभी एक नर्स उसके पास से मिला एक पुराना सा झोला लेकर आई, जिसे पुलिस वालों ने जमा कराया था। "डॉक्टर साहब, शायद इसमें कोई आईडी या घर वालों का नंबर मिल जाए," नर्स ने झोला मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा।
मैंने वह झोला खोला। उसमें कोई पैसे या कीमती सामान नहीं था। बस एक मैली सी डायरी और एक प्लास्टिक की थैली में लपेटी हुई एक पुरानी तस्वीर थी। मैंने वह तस्वीर निकाली। तस्वीर देखते ही मेरे पैरों तले से जमीन खिसक गई। वह तस्वीर एक पाँच साल के बच्चे की थी, जिसने नीले रंग का स्वेटर पहना हुआ था। वह स्वेटर, जो अनाथालय जाते वक्त मेरे शरीर पर था। वह तस्वीर मेरी थी!
मेरे हाथ बुरी तरह कांपने लगे। मैं उस डायरी के पन्ने पलटने लगा। टूटी-फूटी लिखावट में उसमें एक माँ के जीवन का पूरा दर्द दर्ज़ था। डायरी के पन्नों ने चीख-चीख कर वह सच उगल दिया, जिसे मैं पच्चीस सालों से नफरत का नाम दे रहा था। मेरी माँ ने मुझे अपनी खुशी के लिए नहीं छोड़ा था। मेरे शराबी और जुआरी पिता ने मुझे एक गिरोह को बेचने का सौदा कर लिया था। मुझे उस नरक से बचाने के लिए, मेरी माँ रातों-रात मुझे लेकर भागी थी। अनाथालय के बाहर मुझे छोड़कर वह इसलिए छुप गई थी ताकि मेरे पिता मुझे कभी ढूंढ न सकें। उस रात मेरे पिता ने उन्हें इतना पीटा था कि उनकी याददाश्त और मानसिक संतुलन बिगड़ गया था। जब सालों बाद उनकी सुध लौटी, तो वह मुझे दूर से ही देखती रहीं। वह मेरे पास इसलिए नहीं आईं क्योंकि वह मेरे डॉक्टर बनने के इस सफर में एक अनपढ़ और बेसहारा माँ का बोझ नहीं डालना चाहती थीं। वह स्टेशन पर बस इसलिए आई थीं ताकि दूर से अपने बेटे को इस सफेद कोट में देख सकें।
मैं डायरी वहीं फेंक कर उस बिस्तर के पास घुटनों के बल गिर पड़ा। जिस माँ को मैं ममता से शून्य समझता था, उसने मेरे लिए अपने पूरे जीवन की आहुति दे दी थी। मैंने उन कांपते हुए, झुर्रियों वाले हाथों को अपने हाथों में ले लिया और अपनी आँखों से लगा लिया।
"माँ..." मेरे गले से बस यही एक शब्द फूट पाया। मेरा सारा गुरूर, सारी नफरत आंसुओं में बह गई।
उसने फिर कुछ नहीं कहा, बस अपने कमजोर हाथों से मेरे बालों को सहला दिया। उसके होठों पर एक सुकून भरी मुस्कान तैर गई, जैसे पच्चीस सालों का लंबा सफर आज अपनी मंजिल पर आकर खत्म हो गया हो। उस दिन मुझे एहसास हुआ कि एक माँ की ममता कभी शून्य नहीं होती, कभी-कभी उसके पीछे छिपे बलिदान इतने गहरे होते हैं कि दुनिया की कोई नजर उन्हें देख ही नहीं पाती।
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