**समर्पण के रंग: एक अनकहा रिश्ता**

 "पापा का क्या है बुआ? उन्हें तो एक नई पत्नी और एक बनी-बनाई बेटी मिल गई है न। अब उन्हें मेरी क्या ज़रूरत है?" सिद्धार्थ ने अपने कमरे का सामान समेटते हुए झल्लाहट में कहा।


"चुप रह, सिद्धार्थ!" दरवाज़े पर खड़ी सुमित्रा बुआ ने डपटते हुए कहा, "ज़्यादा बकबक की तो एक खींच कर दूंगी तेरे मुंह पर। क्या तू भूल गया कि तूने ही अपने पापा को इस शादी के लिए मजबूर किया था? हम सब तो तेरे लिए लड़की ढूंढ रहे थे, ताकि घर में एक बहू आ सके। तब तूने ही तो हम सबको समझाया था न कि तेरी शादी कर देने से इस घर की समस्या हल नहीं होगी। एक बाइस-तेईस साल की कम उम्र की लड़की इतने बड़े और बीमार घर की ज़िम्मेदारी कैसे उठा पाएगी? हर पल बिस्तर पर पड़ी लकवाग्रस्त दादी की तीमारदारी, उनका खाना-पीना और घर का सारा बोझ..."


"हां बुआ, मुझे सब याद है," सिद्धार्थ ने एक गहरी सांस छोड़ते हुए बीच में ही बात काटी। "मैं यह नहीं कह रहा कि जो हुआ वो मेरी मर्ज़ी के बिना हुआ। मैंने ही पापा को मनाया था कि वो मेरी जगह खुद अपनी शादी कर लें। लेकिन..."


सिद्धार्थ की आवाज़ गले में ही अटक गई। उसकी आँखों में एक अजीब सी नमी और शिकायत तैर रही थी। सच तो यही था कि छह महीने पहले तक यह घर एक अस्पताल जैसा लगता था। सिद्धार्थ की माँ का देहांत कई सालों पहले हो चुका था। उसके पिता, दिनकर जी, बैंक की नौकरी और अपनी बीमार माँ की देखभाल के बीच बुरी तरह पिस रहे थे। सिद्धार्थ भी अपनी नई नौकरी में संघर्ष कर रहा था। रिश्तेदारों ने सलाह दी थी कि सिद्धार्थ की शादी कर दी जाए, ताकि घर में एक औरत आ सके। लेकिन सिद्धार्थ का ज़मीर नहीं माना। उसने सोचा कि किसी दूसरे की बेटी को ब्याह कर सिर्फ एक 'नर्स' या 'नौकरानी' के रूप में लाना उस लड़की के साथ अन्याय होगा। बहुत सोचने के बाद, उसने अपने पिता को दूसरी शादी के लिए राजी किया। दिनकर जी की शादी नंदिनी से हुई, जो एक विधवा थीं और उनकी एक आठ साल की बेटी थी, मिष्टी। 


शुरुआत में सब कुछ बहुत अच्छा लगा। नंदिनी ने आते ही घर को अपने प्यार और ममता से सहेज लिया। दादी की हालत में भी सुधार आने लगा था और घर में फिर से धूप और हंसी की महक लौटने लगी थी। लेकिन जैसे-जैसे दिन बीत रहे थे, सिद्धार्थ को अपने ही घर में एक अनजाना सा खालीपन महसूस होने लगा। दिनकर जी, जो पहले काम से लौटकर सिर्फ सिद्धार्थ से बातें करते थे, अब उनका सारा समय मिष्टी को पढ़ाने या नंदिनी के साथ घर के काम साझा करने में बीतने लगा। मिष्टी की चहचहाहट ने उस घर के सन्नाटे को तोड़ा ज़रूर था, लेकिन सिद्धार्थ को लगने लगा था कि उसकी अपनी माँ की यादें और उसका वजूद उस शोर में कहीं खो गया है। उसे लगने लगा था कि उसने अपना परिवार वापस पाने के चक्कर में अपने पिता को ही खो दिया है।


बुआ के जाने के बाद सिद्धार्थ चुपचाप अपने बिस्तर पर लेट गया। रात गहरी हो चुकी थी। तभी उसे बाहर दालान से कुछ फुसफुसाहट सुनाई दी। सिद्धार्थ ने दरवाज़े की दरार से बाहर झांका। 


बाहर दिनकर जी और नंदिनी बैठे थे। नंदिनी की आवाज़ में एक भारीपन था, "सुनिए, मुझे लगता है सिद्धार्थ मुझसे और मिष्टी से बहुत खफा है। वह आजकल ठीक से खाना भी नहीं खाता और बात भी नहीं करता। कहीं ऐसा तो नहीं कि मेरे इस घर में आने से वह खुद को पराया महसूस करने लगा है? उसने अपनी खुशियां टालकर हम दोनों बेसहारा लोगों को छत दी, एक परिवार दिया। लेकिन अगर मेरी वजह से एक बाप-बेटे का रिश्ता कमज़ोर हो रहा है, तो मैं यह कभी बर्दाश्त नहीं कर पाऊंगी। मैं कल ही मिष्टी को लेकर अपनी बहन के यहाँ चली जाऊंगी।" नंदिनी रो रही थीं।


दिनकर जी ने नंदिनी का हाथ थामते हुए कहा, "तुम पागल हो गई हो नंदिनी? सिद्धार्थ मेरा गुरूर है। उसने जो किया, वो कोई आम बेटा नहीं कर सकता। लेकिन वो अभी नादान है। उसे लगता है कि उसने अपना पिता किसी और के साथ बाँट लिया है। वो ये नहीं समझ पा रहा कि मैंने ये शादी अपनी किसी खुशी के लिए नहीं, बल्कि उस बेटे के सिर पर फिर से एक माँ का साया लाने के लिए की थी। उसे थोड़ा वक्त दो, वो समझ जाएगा।"


दरवाज़े के पीछे खड़े सिद्धार्थ के पैरों तले जैसे ज़मीन खिसक गई। उसका घमंड, उसकी शिकायतें और उसकी सारी जलन आंसुओं में तब्दील होकर उसकी आँखों से बहने लगीं। उसने उस औरत (नंदिनी) को हमेशा एक सौतेली माँ या घर पर कब्ज़ा करने वाली बाहरी इंसान समझा, लेकिन वो औरत तो उसी की खुशी के लिए अपना घर छोड़ने को तैयार थी। उसे अपने पिता के उस गहरे प्यार का एहसास हुआ जो उन्होंने हमेशा अपने सीने में दबा कर रखा था।


अगली सुबह जब सिद्धार्थ सोकर उठा, तो उसे हल्का बुखार महसूस हुआ। वह कमरे से बाहर नहीं निकला। कुछ देर बाद दरवाज़े पर हल्की सी दस्तक हुई। आठ साल की मिष्टी अपने छोटे-छोटे हाथों में चाय का कप और कुछ दवाइयां लिए खड़ी थी। 


"भैया, माँ ने कहा कि आपकी तबीयत ठीक नहीं है। उन्होंने आपके लिए अदरक वाली चाय और दवा भेजी है। आप जल्दी से ठीक हो जाओ ना, फिर मेरे स्कूल में पेरेंट्स-टीचर मीटिंग है, मुझे आपको अपने दोस्तों से मिलवाना है," मिष्टी ने बड़ी ही मासूमियत से कहा।


सिद्धार्थ ने मिष्टी के हाथ से कप लिया और उस नन्ही सी जान को कसकर अपने सीने से लगा लिया। उसके सारे गिले-शिकवे आंसुओं के रूप में बह निकले। तभी नंदिनी और दिनकर जी भी कमरे में आ गए। सिद्धार्थ ने आगे बढ़कर नंदिनी के पैर छू लिए। 


"मुझे माफ़ कर दीजिए माँ। मैं कितना स्वार्थी हो गया था। मैंने एक परिवार जोड़ा ज़रूर, लेकिन उसे अपनाना भूल गया था," सिद्धार्थ फफक कर रो पड़ा।


नंदिनी ने उसे उठाकर अपने गले से लगा लिया और उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, "पागल लड़के, परिवार जन्म से नहीं, जज़्बातों से बनते हैं। आज से यह घर मेरा या तेरा नहीं, हमारा है।"


उस दिन सिद्धार्थ को समझ में आ गया कि रिश्ते कभी किसी का हक़ नहीं छीनते, बल्कि वे तो खुशियों का दायरा और भी बड़ा कर देते हैं। उस घर की खिड़कियों से आज एक नई सुबह की धूप अंदर आ रही थी, जिसमें कोई पराया नहीं था।


क्या आपने भी कभी अपने परिवार के लिए ऐसा कोई त्याग किया है जिसे शुरुआत में किसी ने नहीं समझा? या क्या आपके जीवन में भी कोई ऐसा इंसान आया है जिसने खून का रिश्ता न होते हुए भी घर को एक धागे में पिरो दिया हो? अपने विचार नीचे कमेंट करके ज़रूर साझा करें।


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