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**ख्वाहिशों का आईना: एक अनकही मुलाकात**

 शाम की हल्की गुलाबी ठंडक शहर के उस मशहूर पार्क में उतर आई थी। अपनी उंगलियों में पांच साल के आरव की नन्ही और कोमल उंगलियां फंसाए श्रुति बड़े इत्मीनान से आगे बढ़ रही थी। आरव अपने नन्हे कदमों से उछल-कूद करता हुआ कभी किसी तितली के पीछे भागने की जिद करता, तो कभी रंग-बिरंगे गुब्बारों को देखकर मचल जाता। श्रुति के चेहरे पर एक सुकून भरी थकान थी—वो थकान जो एक माँ को दिन भर की भागदौड़ के बाद अपने बच्चे की हंसी देखकर मिलती है। वह आरव को आइसक्रीम दिलाने के लिए स्टॉल की तरफ मुड़ी ही थी कि अचानक एक जाने-पहचाने चेहरे पर नज़र पड़ते ही उसके कदम ठिठक गए।


सामने से लगभग उसी की उम्र की एक बेहद आकर्षक और सलीके से तैयार युवती आ रही थी। उसने आंखों पर महंगे सनग्लासेस लगाए थे और उसकी चाल में एक गजब का आत्मविश्वास था। श्रुति को अपनी याददाश्त पर अधिक ज़ोर नहीं देना पड़ा और उसने तुरंत पहचान लिया कि यह तो राधिका थी। और पहचानती भी कैसे नहीं, राधिका के चेहरे और रूप-रंग में ज़रा भी फ़र्क़ नहीं पड़ा था। वह ठीक वैसी ही दिख रही थी जैसी कॉलेज के दिनों में दिखती थी— बेदाग त्वचा, छरहरा बदन और वही पुरानी चमक।


"अरे राधिका! तुम कैसी हो? कितने सालों के बाद मिल रही हो," जैसे ही राधिका थोड़ा पास आई, श्रुति ने अपना संकोच एक तरफ रखते हुए उत्साह से उसकी ओर हाथ हिलाकर आवाज दी। 


राधिका ने अपनी चाल धीमी की, सनग्लासेस माथे पर खिसकाए और श्रुति को ध्यान से देखा। कुछ पलों की उलझन के बाद उसकी आंखों में पहचान की चमक आ गई। "हे भगवान! श्रुति? तुम हो? सच में मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा है!" राधिका ने आगे बढ़कर श्रुति को गले से लगा लिया।



दोनों सहेलियां लगभग आठ साल बाद मिल रही थीं। कॉलेज के दिनों में दोनों की जोड़ी मशहूर थी। श्रुति पढ़ाई में अव्वल थी और राधिका फैशन और डिबेट्स में। लेकिन कॉलेज खत्म होने के बाद जिंदगी ने दोनों को अलग-अलग रास्तों पर धकेल दिया था। श्रुति ने आरव के जन्म के बाद अपना कॉर्पोरेट करियर छोड़ दिया था क्योंकि आरव एक प्री-मैच्योर बच्चा था और उसे विशेष देखभाल की जरूरत थी। वहीं राधिका ने अपने करियर की उड़ान भरी थी और शहर की एक बड़ी कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट बन गई थी।


गले मिलने के बाद जब राधिका पीछे हटी, तो उसकी नजर श्रुति के साधारण सूती कपड़ों, बिखरे हुए बालों और आंखों के नीचे पड़े हल्के डार्क सर्कल्स पर गई। राधिका के चेहरे पर एक पल के लिए हैरानी के भाव उभरे, जिसे श्रुति ने तुरंत पढ़ लिया। 


"तुम तो बिल्कुल नहीं बदली राधिका। आज भी वैसे ही कॉलेज वाली डीवा लग रही हो," श्रुति ने मुस्कुराते हुए कहा, लेकिन उसके दिल के किसी कोने में एक हल्की सी टीस उठी। उसे अचानक अपने बढ़े हुए वजन और थके हुए चेहरे का अहसास होने लगा। 


राधिका ने हल्की सी हंसी हंसते हुए कहा, "थैंक्स यार! बस खुद को मेंटेन रखा है। अभी पिछले हफ्ते ही पेरिस से लौटी हूँ। कंपनी का बहुत बड़ा प्रोजेक्ट था। जिंदगी बस एयरपोर्ट्स और मीटिंग्स के बीच भाग रही है। लेकिन सच कहूं श्रुति, तुम... तुम काफी बदल गई हो। मैंने तो तुम्हें बस तुम्हारी आवाज से पहचाना।"


राधिका के वो शब्द श्रुति को अंदर तक चुभ गए। यह सच था कि उसने खुद को पूरी तरह से आरव और परिवार को समर्पित कर दिया था। उसने बरसों से कोई महंगा पार्लर ट्रीटमेंट नहीं लिया था, न ही कोई फैशनेबल कपड़े पहने थे। उसे लगा जैसे उसकी सारी डिग्रियां और पुरानी पहचान इस सूती कुर्ते और थकी हुई आंखों के पीछे कहीं छुप गई हैं। उसे अपने आप पर एक पल के लिए शर्मिंदगी सी महसूस हुई। 


तभी आरव, जो अब तक चुपचाप खड़ा था, उसने श्रुति के कुर्ते का कोना खींचा और अपनी तोतली आवाज में बोला, "मम्मा, मेरी आइसक्रीम पिघल रही है।



देखो, मैंने आपके लिए भी थोड़ी सी बचा कर रखी है, क्योंकि मुझे पता है आपको वैनिला फ्लेवर बहुत पसंद है।" आरव ने अपना छोटा सा हाथ बढ़ाकर आइसक्रीम का कप अपनी माँ की तरफ कर दिया। 


श्रुति की आंखों में अचानक एक चमक आ गई। उसने आरव का माथा चूमा और रुमाल से उसका मुंह पोंछने लगी। 


तभी श्रुति ने देखा कि राधिका के चेहरे की वो कॉर्पोरेट वाली चमक और आत्मविश्वास अचानक कहीं गायब हो गया है। राधिका आरव की उन मासूम हरकतों को बिना पलक झपकाए देख रही थी। उसके महंगे मस्कारे से सजी आंखों में अचानक पानी तैरने लगा था। श्रुति घबरा गई। 


"क्या हुआ राधिका? तुम ठीक तो हो?" श्रुति ने चिंतित होकर पूछा।


राधिका ने एक गहरी और कांपती हुई सांस ली। उसने अपना महंगा हैंडबैग एक तरफ रखा और पार्क की बेंच पर धम्म से बैठ गई। "तुम्हें लगता है कि मैं नहीं बदली हूँ श्रुति? तुम्हें लगता है कि मेरी जिंदगी बहुत परफेक्ट है?" राधिका की आवाज भर्रा गई थी। "सच तो यह है कि मैं अंदर से पूरी तरह खोखली हो चुकी हूँ। मैंने करियर और पैसे के पीछे भागते-भागते अपना घर, अपना परिवार सब कुछ पीछे छोड़ दिया। तीन साल पहले मेरा तलाक हो गया क्योंकि मेरे पास अपने पति के लिए समय नहीं था। और सबसे बड़ी बात... काम के बेतहाशा तनाव और अपनी सेहत को नजरअंदाज करने के कारण मैं अब कभी माँ नहीं बन सकती।" 


राधिका के आंसू अब उसकी गालों को भिगो रहे थे। "मैं जब भी किसी ट्रिप से अपने उस करोड़ों के पेंटहाउस में लौटती हूँ, तो वहां का सन्नाटा मुझे काटने दौड़ता है। मेरे पास बैंक बैलेंस है, लेकिन मुझे दरवाजे पर पुकारने वाली कोई तोतली आवाज नहीं है। मेरे पास दुनिया के सबसे महंगे शेफ का खाना है, लेकिन कोई ऐसे अपने छोटे हाथों से आइसक्रीम बचाकर मुझे खिलाने वाला नहीं है। तुम कहती हो कि तुम बदल गई हो श्रुति? हां, तुम बदल गई हो। तुम एक बहुत ही खूबसूरत और मुकम्मल औरत बन गई हो। तुम्हारे पास जो दौलत है, वह दुनिया की किसी भी सफलता से बहुत बड़ी है।"



श्रुति अवाक रह गई। कुछ ही मिनटों पहले जो हीन भावना उसे अंदर से तोड़ रही थी, वह राधिका के इन आंसुओं में कहीं बह गई। उसने राधिका के पास बैठकर उसे कसकर गले लगा लिया। आरव भी अपनी नन्ही बाहों से राधिका को चूमते हुए बोला, "आंटी, आप मत रोओ। मैं आपको अपना खिलौना दे दूंगा।" 


आरव की इस बात पर दोनों सहेलियां आंसुओं के बीच मुस्कुरा पड़ीं। श्रुति को आज समझ में आ गया था कि जिंदगी की असली खूबसूरती आईने में नहीं, बल्कि उन रिश्तों में होती है जिन्हें हम अपने त्याग और प्यार से सींचते हैं। उसके चेहरे की झुर्रियां और आंखों के नीचे के काले घेरे उसकी कमियां नहीं, बल्कि एक माँ के रूप में जीते गए उसके अनगिनत संघर्षों और बेइंतहा प्यार के मेडल थे। उस शाम जब वे दोनों सहेलियां विदा हुईं, तो राधिका के दिल में एक सुकून था कि उसे आरव के रूप में एक दोस्त मिल गया है, और श्रुति के दिल में अपनी जिंदगी और अपने परिवार के प्रति एक ऐसा गहरा सम्मान था, जिसे अब कोई भी बाहरी चमक फीका नहीं कर सकती थी।


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