यादों का सौदा

रात का सन्नाटा गहराने लगा था। घर के बाकी कमरों की बत्तियां बुझ चुकी थीं, लेकिन रमाकांत जी के कमरे में अभी भी एक छोटा सा नाइट लैंप जल रहा था। उनकी पत्नी, जानकी देवी बार-बार करवटें बदल रही थीं। उनकी आँखों से नींद जैसे कोसों दूर जा चुकी थी। 


"सुनिए जी..." जानकी देवी ने आखिरकार अपनी चुप्पी तोड़ी। "पिछले कई दिनों से मैं देख रही हूँ कि हमारे तीनों बेटे और बहुएं दालान में बैठकर फुसफुसाते रहते हैं। जैसे ही मैं या आप उनके पास जाते हैं, वे एकदम से चुप हो जाते हैं। मुझे कुछ ठीक नहीं लग रहा है। कुछ पता है आपको कि ये क्या खिचड़ी पक रही है?"


रमाकांत जी ने अपनी रामायण की किताब बंद की, चश्मा उतार कर सिरहाने रखा और बहुत ही शांत स्वर में बोले, "जानकी, जब पक्षियों के पंख मजबूत हो जाते हैं, तो वे नया आसमान ढूंढने लगते हैं। तुम ज्यादा मत सोचो, सो जाओ। जब तक मैं तुम्हारे साथ हूँ, तुम्हें घबराने की कोई जरूरत नहीं है।" रमाकांत जी ने करवट ले ली, लेकिन जानकी देवी का दिल अब भी किसी अनहोनी की आशंका से धड़क रहा था।


दो दिन बाद, रविवार की दोपहर थी। पूरा परिवार डाइनिंग टेबल पर खाना खा चुका था। अचानक घर के सबसे बड़े बेटे, विकास ने गला साफ किया। उसके साथ मंझला बेटा समीर और सबसे छोटा बेटा रोहन भी खड़े हो गए। तीनों बहुओं ने भी एक-दूसरे की तरफ इशारे से देखा और फिर सिर झुका लिया। 


"बाबूजी..." विकास ने थोड़ी झिझक के साथ शुरुआत की, "हम तीनों भाइयों ने पिछले कई दिनों से बहुत सोच-विचार करने के बाद एक फैसला लिया है। हम चाहते हैं कि अब इस पुश्तैनी मकान को बेच दिया जाए।"


जानकी देवी के हाथ से पानी का गिलास छूटते-छूटते बचा। रमाकांत जी एकदम चुप रहे, बस उनके माथे की लकीरें थोड़ी गहरी हो गईं।


विकास ने आगे कहा, "बाबूजी, अब यह मकान हमारे लिए छोटा पड़ता है। बच्चे बड़े हो रहे हैं, उन्हें अपने अलग कमरे चाहिए। घर पुराना भी हो गया है और दीवारों में सीलन आने लगी है। हर साल इसकी मरम्मत में हजारों रुपये लग जाते हैं। हम तीनों ने तय किया है कि इस मकान को बेचकर जो रकम मिलेगी, उसे हम आपस में बांट लेंगे। कुछ पैसा बैंक से लोन लेकर और कुछ अपनी सेविंग्स मिलाकर, हम तीनों शहर के एक नए हाई-टेक अपार्टमेंट में अपने-अपने फ्लैट ले लेंगे। वहां बच्चों के लिए स्विमिंग पूल और पार्क भी है।"


जानकी देवी अवाक रह गईं। उनके गले में जैसे कुछ अटक सा गया था। उन्होंने अपने बेटों और बहुओं की तरफ देखा। ओह! तो यह विचार-विमर्श चल रहा था पिछले कई दिनों से। जिस घर की एक-एक ईंट रमाकांत जी ने अपनी पाई-पाई जोड़कर रखी थी, जिस घर के आंगन में ये तीनों बेटे घुटनों के बल चलना सीखे थे, आज वे उसी घर को कबाड़ समझकर बेचना चाहते थे।


"और हमारा क्या होगा?" जानकी देवी के मुंह से बेसाख्ता निकल पड़ा। "हम इस बुढ़ापे में कहाँ जाएंगे?"


समीर तुरंत बोल पड़ा, "अरे माँ, आप दोनों हमारे ही साथ रहेंगे ना। चार महीने आप विकास भैया के फ्लैट में रह लेना, चार महीने मेरे पास और चार महीने रोहन के पास। इससे आपको भी बदलाव मिलेगा और हम तीनों को आपकी सेवा करने का बराबर मौका भी।"


रमाकांत जी ने एक गहरी, ठंडी सांस ली। उनके चेहरे पर न तो गुस्सा था और न ही कोई हैरानी। उन्होंने बहुत ही संयत आवाज में कहा, "ठीक है। अगर तुम तीनों का यही फैसला है, तो मुझे मंजूर है। एक पिता अपने बच्चों की तरक्की के रास्ते में कभी दीवार नहीं बनता। तुम लोग ग्राहक ढूंढना शुरू कर सकते हो।"


बहुओं के चेहरों पर एक छिपी हुई मुस्कान तैर गई। उन्हें लगा कि शायद बाबूजी बहुत हंगामा करेंगे, लेकिन बात इतनी आसानी से मान ली जाएगी, यह किसी ने नहीं सोचा था। 


अगले ही हफ्ते एक प्रॉपर्टी डीलर एक रईस खरीदार को लेकर घर देखने आया। जानकी देवी अपने कमरे में बैठकर आँसू बहा रही थीं और रमाकांत जी चुपचाप आंगन की कुर्सी पर बैठे थे। खरीदार घर का मुआयना करने लगा। 


वह दालान में आया और डीलर से बोला, "यह बीच का आंगन बहुत पुरानी सोच का है। हम इसे तुड़वाकर यहाँ एक बड़ा सा पार्किंग स्पेस बनाएंगे। और हाँ, वो जो कोने में पुराना नीम का पेड़ है, उसे तो सबसे पहले कटवाना पड़ेगा, बहुत जगह घेर रहा है।"


यह सुनते ही सबसे छोटे बेटे रोहन के दिल में एक अजीब सी टीस उठी। यह वही नीम का पेड़ था जिसकी डाल पर झूला झूलकर उसका बचपन बीता था। 


खरीदार अंदर वाले कमरे में गया। "इस दीवार को गिराकर हम हॉल को बड़ा कर देंगे," उसने एक दीवार की तरफ इशारा करते हुए कहा। मंझला बेटा समीर उस दीवार को देखने लगा। उस दीवार पर आज भी पेंसिल के कुछ पुराने निशान बने हुए थे, जहाँ रमाकांत जी हर साल अपने तीनों बेटों को खड़ा करके उनकी लंबाई नापा करते थे और दीवार पर तारीख लिख दिया करते थे। समीर की आँखें थोड़ी नम हो गईं।


अंत में खरीदार जानकी देवी के पूजा घर के पास पहुंचा। "यहाँ बहुत अंधेरा है। इस हिस्से को हम स्टोर रूम या नौकरों का कमरा बना देंगे।" बड़े बेटे विकास का गला सूखने लगा। इसी पूजा घर में बैठकर उसकी माँ ने उसकी नौकरी के लिए न जाने कितने व्रत रखे थे और कितनी रातें जागकर प्रार्थनाएं की थीं।


खरीदार ने रमाकांत जी के पास आकर कहा, "मकान तो बहुत पुराना है, सिर्फ जमीन की कीमत मिलेगी। मैं कल ही बयाना भिजवा देता हूँ।"


खरीदार के जाने के बाद घर में एक अजीब सा सन्नाटा पसर गया। कोई भी अपनी जगह से नहीं हिला। रमाकांत जी अपनी कुर्सी से उठे और अपने कमरे से एक पुराना सा सूटकेस बाहर ले आए। 


"बाबूजी, ये सूटकेस क्यों निकाल लिया आपने?" विकास ने घबराते हुए पूछा।


रमाकांत जी ने मुस्कुराते हुए कहा, "बेटा, तुमने ईंटों का बंटवारा तो कर लिया, लेकिन तुमने ये नहीं सोचा कि इस घर में हमारी आत्मा बसती है। तुमने कहा कि हम चार-चार महीने तुम सबके फ्लैट में रह लेंगे। बेटा, मेहमान कुछ दिनों के लिए आते हैं, माँ-बाप का तो अपना घर होता है। जब हमारा घर ही नहीं रहा, तो हम तुम्हारे फ्लैटों में जाकर एक बोझ बनकर नहीं जीना चाहते। मैंने शहर के बाहर एक वृद्धाश्रम में बात कर ली है। तुम लोग अपने फ्लैट लो और खुश रहो।"


यह सुनना था कि तीनों बेटों के पैरों तले जमीन खिसक गई। फ्लैट की चमक और आधुनिक जिंदगी का नशा एक झटके में उतर गया। उन्हें एहसास हुआ कि वे एक निर्जीव फ्लैट पाने के लिए अपना जीता-जागता 'घर' और अपने माता-पिता का साया खो रहे हैं। 


विकास दौड़कर रमाकांत जी के पैरों में गिर पड़ा और फूट-फूट कर रोने लगा। "हमें माफ कर दीजिए बाबूजी। हम आधुनिकता की अंधी दौड़ में अंधे हो गए थे। हम यह भूल गए थे कि फ्लैट ईंट और सीमेंट से बनते हैं, लेकिन घर तो आपके और माँ के प्यार से बनता है। हमें कोई फ्लैट नहीं चाहिए। हम इस घर को नहीं बेचेंगे।"


समीर और रोहन भी जानकी देवी के गले लगकर रोने लगे। "माँ, हमारा वह नीम का पेड़ और वह लंबाई नापने वाली दीवार दुनिया के किसी भी हाई-टेक फ्लैट से ज्यादा कीमती है। हमें कहीं नहीं जाना।"


जानकी देवी ने अपने तीनों बेटों को सीने से लगा लिया। रमाकांत जी ने सूटकेस वापस अंदर रख दिया। आज उस पुराने घर की दरकती हुई दीवारों ने टूटते हुए रिश्तों को हमेशा के लिए एक मजबूत डोर में बांध दिया था।


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