आंगन की छाँव और एक बेटी का फर्ज

 बारिश के बाद की वो धुली-धुली सी सुबह थी। आंगण में लगे नीम के पेड़ से पानी की बूंदें टपक रही थीं। मीनल कई महीनों बाद अपने मायके आई थी। घर की दीवारें अब पहले से ज्यादा जर्जर लग रही थीं, उन पर लगा रंग जगह-जगह से पपड़ी बनकर झड़ रहा था। यह वही घर था जहाँ कभी खूब चहल-पहल हुआ करती थी। लेकिन पिछले दो सालों ने इस घर की सूरत और सीरत दोनों बदल कर रख दी थी। मीनल का बड़ा भाई, माधव, दालान में बैठा एक पुरानी फाइल पलट रहा था। माधव की उम्र अभी पैंतीस साल ही थी, लेकिन उसके बालों में आई सफेदी और चेहरे की गहरी लकीरों ने उसे वक्त से बहुत पहले बूढ़ा कर दिया था। मीनल खामोशी से दरवाजे की ओट में खड़ी अपने भाई को देख रही थी और उसकी आँखों से आंसुओं की धार बह रही थी।


माधव एक ऐसा इंसान था जिसने कभी अपने लिए जीना सीखा ही नहीं। वह हमेशा दूसरों की खुशियों के लिए खुद को खपा देने वाला व्यक्ति था। दो साल पहले उनके पिता जी को एक गंभीर बीमारी ने घेर लिया था। इलाज का खर्च इतना था कि किसी भी मध्यमवर्गीय परिवार की कमर टूट जाए। मीनल उस वक्त गर्भवती थी और अपने ससुराल में थी। माधव ने उसे पिता जी की बीमारी की गंभीरता का कभी पूरा अंदाजा नहीं लगने दिया। जब भी मीनल फोन करती, माधव हंसकर कहता, "अरे तू फिक्र मत कर, बाऊजी बिल्कुल ठीक हैं। दवाइयां चल रही हैं।" 


मीनल को असलियत का पता तब चला जब पिता जी का देहांत हो गया। लेकिन पिता जी के जाने के बाद जो सच्चाई सामने आई, उसने मीनल को अंदर तक झकझोर कर रख दिया। अपनी भाभी (माधव की पत्नी) से मीनल को पता चला कि पिता जी के इलाज के लिए माधव ने अपना शहर वाला पुश्तैनी मकान और अपनी छोटी सी किराने की दुकान, दोनों गिरवी रख दिए थे। जब उससे भी काम नहीं चला, तो उसने गाँव की वो जमीन भी बेच दी जो पिता जी ने माधव के भविष्य के लिए सहेज कर रखी थी। आज माधव के पास न अपना कोई काम था और न ही जमा-पूंजी। वह दिन-रात एक करके एक फैक्ट्री में मुनीम का काम कर रहा था ताकि कर्ज का ब्याज चुका सके। घर का खर्च बड़ी मुश्किल से चल रहा था, लेकिन माधव के माथे पर कभी कोई शिकन नहीं आई। उसने किसी रिश्तेदार से एक पैसा नहीं मांगा, यहाँ तक कि अपनी इकलौती बहन को भी इस आर्थिक तबाही की भनक नहीं लगने दी।


मीनल ने अपने आंसू पोंछे और एक लिफाफा अपने हाथों में कसकर पकड़ लिया। यह लिफाफा लेकर वह सीधा माधव के पास गई और उसके बगल में बिछी चारपाई पर बैठ गई। माधव ने फाइल बंद की और अपनी बहन को देखकर मुस्कुराते हुए बोला, "क्या हुआ मीनो? सुबह-सुबह उदास क्यों है? ससुराल की याद आ रही है क्या?"


मीनल ने कुछ नहीं कहा। उसने बस वो लिफाफा माधव के हाथों में रख दिया। माधव ने लिफाफा खोला तो उसमें एक बहुत बड़ी रकम का बैंक ड्राफ्ट था। माधव चौंक गया। उसने ड्राफ्ट वापस लिफाफे में रखा और मीनल की तरफ बढ़ाते हुए थोड़ा सख्ती से बोला, "यह क्या है मीनल? तू पागल हो गई है? मुझे तेरे पैसे नहीं चाहिए। तू मेरी छोटी बहन है, मैं तुझसे पैसे कैसे ले सकता हूँ? ससुराल वालों ने देखा तो क्या कहेंगे कि मायके वाले बेटी का पैसा खा रहे हैं।"


मीनल की आँखों का बांध अब टूट गया। उसने माधव के दोनों हाथ पकड़ लिए और रुंधे हुए गले से बोली, "भैया... आप बहुत निस्वार्थ हैं। आपने हमेशा सिर्फ हम सबके बारे में सोचा है। आपने माँ-बाबूजी के इलाज में लाखों रुपये पानी की तरह बहा दिए। अपना सब कुछ, अपनी दुकान, अपने खेत, अपना भविष्य... सब बाबूजी को बचाने में बेच दिया और मुझे भनक तक नहीं लगने दी। क्यों भैया? क्या बाबूजी सिर्फ आपके पिता थे? क्या मेरा उन पर कोई हक नहीं था? क्या मेरे उनके प्रति कोई फर्ज नहीं थे?"


माधव ने मीनल को शांत करने की कोशिश की, "पगली, तू तो उनकी जान थी। लेकिन बेटियां तो पराया धन होती हैं। शादी के बाद तेरा अपना एक घर है, अपनी जिम्मेदारियां हैं। माता-पिता की जिम्मेदारी उठाना बेटे का काम होता है। मैंने जो किया, वो मेरा फर्ज था।"


"यही तो सबसे बड़ी गलतफहमी है इस समाज की और आपकी भी," मीनल ने रोते हुए लेकिन एक दृढ़ आवाज में कहा। "जब प्यार और दुलार में बाबूजी ने हम दोनों में कभी कोई फर्क नहीं किया, जब बाबूजी की उंगली पकड़कर मैंने भी चलना सीखा था, तो फिर उनकी तकलीफ और उनके इलाज की जिम्मेदारी सिर्फ आपकी कैसे हो गई? मैं भी तो उनकी बेटी हूँ भैया! मुझे पता है कि आप अभी किस मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं। आपकी रातों की नींद उड़ी हुई है। आप कर्ज के बोझ तले दब गए हैं। क्या एक बहन यह सब चुपचाप देखती रहे सिर्फ इसलिए क्योंकि वो 'पराया धन' है?"


माधव निःशब्द था। उसकी आँखें भी अब भीग चुकी थीं। 


मीनल ने उस लिफाफे को माधव की हथेलियों पर दबाते हुए कहा, "भैया, मैंने और मेरे पति ने मिलकर यह फैसला लिया है। मेरे ससुराल वाले भी जानते हैं कि आपने बाबूजी के लिए क्या कुछ किया है। ये पैसे किसी दान या खैरात के नहीं हैं, बल्कि ये माँ-बाबूजी के खर्च का मेरा अपना हिस्सा है, जो मुझे बहुत पहले दे देना चाहिए था। इसे एक बहन की मदद मत समझिए, इसे एक बेटी का अपना फर्ज समझकर रख लीजिए। अगर आप इसे नहीं रखेंगे, तो मुझे लगेगा कि आपने मुझे इस घर का कभी माना ही नहीं।"


माधव अब अपने आँसुओं को रोक नहीं पाया। जिस भाई ने पिता की बीमारी से लेकर उनकी मौत और कर्ज के भारी बोझ तक अकेले सब कुछ चुपचाप सहा था, वो आज अपनी छोटी बहन के इन प्यार और अधिकार भरे शब्दों के आगे टूट गया। उसने मीनल को गले से लगा लिया। वह रोता जा रहा था और मीनल उसके पीठ पर हाथ फेर रही थी। आज माधव को लगा जैसे उसके सिर का आधा बोझ किसी ने उतार दिया हो। 


यह सिर्फ पैसों की बात नहीं थी, यह उस एहसास की बात थी कि वो इस लड़ाई में अकेला नहीं था। उसकी बहन उसके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी थी। उस दिन उस पुराने आंगन में समाज की एक पुरानी सोच टूटी थी और भाई-बहन के रिश्ते की एक नई, बेहद मजबूत और पवित्र नींव रखी गई थी।


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**आपकी क्या राय है?**

क्या माता-पिता की सेवा और उनके इलाज के खर्च में बेटियों का भी बराबर का हक और फर्ज नहीं होना चाहिए? क्या मीनल ने अपने भाई को पैसे देकर सही किया? समाज की उस पुरानी सोच पर आप क्या कहेंगे जो बेटियों को इन जिम्मेदारियों से दूर रखती है? अपने विचार हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।


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