"निधि में आखिर बुराई क्या है अंश? वह सुशील है, संस्कारी है और हमारे परिवार के लिए एकदम सही है। मैंने उसे अपने हाथों से परखा है बेटा, वह तुम्हें बहुत खुश रखेगी..." कावेरी ने अपनी रुंधती हुई आवाज़ में अपने बेटे को रोकने का आखिरी प्रयास किया था।
लेकिन अंश ने दरवाजे की चौखट पर रुककर, बिना पीछे मुड़े एक ही झटके में सारी उम्मीदें तोड़ दीं। "आई एम सॉरी माँ, मैं उस लड़की से शादी नहीं कर सकता जिससे मैं प्यार नहीं करता। मेरे लिए शादी का मतलब सिर्फ आपका दिया हुआ कोई आदेश या परिवार की पसंद नहीं है। यह मेरी पूरी ज़िंदगी का सवाल है," अंश इतना कहकर अपने कमरे में चला गया और दरवाज़ा ज़ोर से बंद कर लिया। उस बंद होते दरवाज़े की आवाज़ कावेरी के कानों में किसी धमाके की तरह गूंजी।
कावेरी वहीं सोफे पर बेजान सी होकर बैठ गई। उसकी आँखों से आँसुओं की धारा बह निकली। उसने तो सपने सजा लिए थे कि निधि लाल जोड़े में उसके घर की बहू बनकर आएगी और इस घर के आँगन को खुशियों से भर देगी। लेकिन तभी सामने बैठे उसके पति, रमेश बाबू ने एक ऐसा कड़वा सच कहा, जो कावेरी को तीरों की तरह चुभ गया।
"ग़लती तुम्हारी है कावेरी। तुम्हें इस तरह से टूटकर रोने या अंश को दोष देने का कोई हक नहीं है," रमेश बाबू ने अपना चश्मा उतारते हुए बहुत ही गंभीर और सख्त स्वर में कहा। "तुम्हें निधि या उसके माता-पिता को कोई भी पक्का वचन देने से पहले एक बार अंश से पूछ लेना चाहिए था। तुमने अपनी ममता, अपने अहंकार और उत्साह में यह सोच लिया कि तुम्हारा फैसला ही अंश का अंतिम फैसला होगा। तुमने यह समझने की कोशिश ही नहीं की कि अब बच्चे बड़े हो गए हैं, उनकी अपनी एक सोच और अपनी जिंदगी है।"
रमेश बाबू के ये शब्द कावेरी के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतर रहे थे। वह पुरानी यादों में गोते लगाने लगी।
कुछ दिन पहले ही कावेरी अपनी एक दूर की रिश्तेदार की शादी में गई थी, जहाँ उसने पहली बार निधि को देखा था। सादगी से भरी, बड़ों का सम्मान करने वाली और हमेशा चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान रखने वाली निधि ने कावेरी का दिल पहली नजर में ही जीत लिया था। कावेरी को लगा जैसे उसे अपने बेटे के लिए एक मुकम्मल जीवनसाथी मिल गई है। बिना वक्त गंवाए, वह अपनी ननद को लेकर निधि के घर पहुंच गई थी।
निधि के माता-पिता बहुत ही साधारण और सज्जन लोग थे। जब निधि ने अपने हाथों से चाय बनाकर कावेरी को दी, तो कावेरी भावनाओं में इस कदर बह गई कि उसने अपने हाथ से सोने का कंगन उतारकर निधि की कलाई में पहना दिया था और उसके माता-पिता से कह दिया था, "आज से यह मेरी बहू है। मैं बहुत जल्द अपने बेटे अंश को लेकर आऊंगी।"
निधि के घर वालों की आँखों में खुशी के आंसू थे। उन्होंने कावेरी के इस वादे को पत्थर की लकीर मान लिया था। और आज... आज अंश ने उस लकीर को एक ही पल में मिटा दिया था। अंश का तर्क बिल्कुल साफ था। वह आज की पीढ़ी का लड़का था, जिसके लिए जीवनसाथी के साथ एक मानसिक जुड़ाव और प्यार होना सबसे ज्यादा जरूरी था। वह किसी ऐसे इंसान के साथ अपनी जिंदगी कैसे बांध सकता था, जिसे उसने जाना ही नहीं, जिसे वह चाहता ही नहीं?
कावेरी अपनी ही रची हुई इस भूलभुलैया में बुरी तरह फंस चुकी थी। उसे अब अंश पर नहीं, बल्कि अपनी जल्दबाजी पर क्रोध आ रहा था। उसने एक माँ होने के नाते सिर्फ अपना अधिकार देखा था, अपने बेटे की रजामंदी नहीं।
"अब मैं क्या करूं? निधि के माता-पिता को मैं क्या मुँह दिखाऊंगी?" कावेरी ने दोनों हाथों से अपना चेहरा छुपाते हुए सिसकियां लीं। "समाज क्या कहेगा? उन लोगों ने तो अपने रिश्तेदारों में भी यह बात फैला दी होगी।"
"यही तो तुम्हारी सबसे बड़ी कमजोरी है कावेरी," रमेश बाबू ने एक गहरी सांस लेते हुए कहा। "तुम्हें अंश की खुशी से ज्यादा इस बात की फिक्र थी कि समाज में तुम्हारी वाहवाही होगी। तुमने एक अच्छी लड़की देखी और बिना सोचे-समझे उसे अपने घर की संपत्ति मान लिया। अब जो रायता तुमने फैलाया है, उसे समेटना भी तुम्हें ही पड़ेगा। कल सुबह उठकर निधि के पिता को फोन करना और उनसे माफी मांगना। उन्हें सच बताना कि अंश इस शादी के लिए तैयार नहीं है।"
वह रात कावेरी के लिए किसी सजा से कम नहीं थी। वह बार-बार करवटें बदलती रही। उसे निधि का वह मासूम चेहरा याद आ रहा था, और साथ ही अंश की वह कठोर लेकिन सच्ची बात कि "बिना प्यार के शादी नहीं हो सकती।"
अगली सुबह कावेरी ने भारी मन से फोन उठाया और निधि के घर कॉल किया। जब उसने निधि की माँ को सारी सच्चाई बताई और माफी मांगी, तो फोन के उस पार एक लंबा सन्नाटा छा गया। वह सन्नाटा कावेरी को गालियों से भी ज्यादा चुभ रहा था। निधि की माँ ने बिना कोई शिकायत किए बस इतना कहा, "कोई बात नहीं बहन जी, शायद हमारी बेटी के भाग्य में आपका घर नहीं था। लेकिन एक बात कहूँगी... किसी भी गरीब की बेटी को यूं घर आकर उम्मीदों का कंगन पहनाने से पहले, अपने घर के चिराग की मर्जी जरूर पूछ लेनी चाहिए थी। एक झूठी उम्मीद, किसी की पूरी जिंदगी पर भारी पड़ सकती है।" और फोन कट गया।
कावेरी के हाथ से फोन छूटकर गिर गया। उसे आज अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा और सबसे कड़वा सबक मिल चुका था। उसने जान लिया था कि रिश्ते सिर्फ बड़ों के आशीर्वाद और जबरदस्ती से नहीं बनते, बल्कि उन दो दिलों की रजामंदी से बनते हैं जिन्हें एक साथ पूरी जिंदगी गुजारनी होती है। उस दिन के बाद से कावेरी ने कभी अपने फैसलों को अंश पर थोपने की कोशिश नहीं की। उसने समझ लिया था कि बच्चे हमारी परछाई जरूर होते हैं, लेकिन उनका अपना एक अलग वजूद और अपनी एक स्वतंत्र उड़ान होती है, जिसे काटना ममता नहीं, बल्कि स्वार्थ कहलाता है।
दोस्तों, आपको क्या लगता है? क्या आज भी हमारे समाज में माता-पिता अपनी पसंद को बच्चों पर थोपने की कोशिश करते हैं? क्या कावेरी को अंश की बात मान लेनी चाहिए थी, या उसे अंश को शादी के लिए मनाना चाहिए था? अपनी बेबाक राय कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।
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विवाह जैसे बड़े फैसलों में बच्चों की सहमति और उनके विचारों का सम्मान करना सबसे ज्यादा जरूरी है।
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