ममता का दान: जब एक अनचाहा गर्भ बन गया किसी का संसार

 श्वेता अपने बेडरूम की खिड़की के पास खड़ी बाहर की तेज़ बारिश को देख रही थी, लेकिन उसके मन के भीतर इससे भी बड़ा तूफान चल रहा था। उसके हाथ में प्रेगनेंसी टेस्ट की वह रिपोर्ट थी, जिसने उसकी रातों की नींद उड़ा दी थी। श्वेता और उसका पति सुमित दोनों एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करते थे। उनके पहले से ही दो बच्चे थे—आठ साल का आरव और पाँच साल की रूही। इस व्यस्त और भागदौड़ भरी ज़िंदगी में वे दोनों अपनी पारिवारिक और पेशेवर ज़िंदगी के बीच किसी तरह संतुलन बना पा रहे थे। ऐसे में इस तीसरे बच्चे की खबर उनके लिए किसी झटके से कम नहीं थी। श्वेता ने मन ही मन तय कर लिया था कि वह कल जाकर इस अनचाहे गर्भ को गिरवा देगी। 


उसी शाम श्वेता का बड़ा भाई अनुपम और उसकी भाभी अंजलि शहर आए हुए थे। वे दोनों श्वेता से मिलने उसके घर पहुँचे। अंजलि और अनुपम की शादी को पंद्रह साल बीत चुके थे, लेकिन ईश्वर ने उन्हें संतान सुख से वंचित रखा था। उन्होंने न जाने कितने डॉक्टरों के चक्कर काटे, कितने मंदिरों की सीढ़ियाँ चढ़ीं, लेकिन अंजलि की गोद सूनी की सूनी ही रही। इस सूनेपन ने उन दोनों को अंदर से बहुत खामोश और उदास कर दिया था। 


रात के खाने के बाद जब सुमित बच्चों को सुलाने चला गया, तो श्वेता, अंजलि और अनुपम ड्राइंग रूम में बैठे बातें कर रहे थे। बातों ही बातों में श्वेता के चेहरे की परेशानी छुप नहीं सकी। अंजलि की प्यार भरी ज़िद पर श्वेता ने अपनी रिपोर्ट उनके सामने रख दी और अपनी परेशानी बता दी। 


"नहीं भाभी, मुझे यह तीसरा बच्चा बिल्कुल नहीं चाहिए," श्वेता ने बहुत ही स्पष्ट और थोड़े रूखे स्वर में कहा। "आप तो जानती हैं कि सुमित और मेरे ऑफिस में सबके एक या दो ही बच्चे हैं। आज के ज़माने में तीन बच्चों का मतलब है करियर और आज़ादी सब खत्म। हम दोनों वर्किंग हैं, दो बच्चों की परवरिश ही मुश्किल से हो रही है। मैं कल ही डॉक्टर के पास जाकर इस झंझट को खत्म करने वाली हूँ।"


श्वेता की बात सुनकर अंजलि का चेहरा पीला पड़ गया। जिस मातृत्व के लिए वह पंद्रह सालों से दर-दर भटक रही थी, रो रही थी, वही मातृत्व आज श्वेता को एक 'झंझट' लग रहा था। अंजलि की आँखों में आँसू छलक आए, लेकिन उसने अपने होंठ सी लिए। 


तभी अनुपम, जो अब तक खामोश बैठा था, अपनी जगह से उठा और श्वेता के पास आकर बैठ गया। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक और दर्द का मिला-जुला भाव था। उसने बहुत ही भारी और रुंधे हुए गले से कहा, "श्वेता, तुम्हारी बात अपनी जगह बिल्कुल ठीक है। मैं समझ सकता हूँ कि तुम्हारी और सुमित की अपनी एक अलग ज़िंदगी है और तुम्हारी परेशानियां भी जायज़ हैं। परंतु... परंतु कुछ मेरी भी सुन लो मेरी बच्ची।" 


अनुपम ने श्वेता के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए। "मैं कहता हूँ कि यह जो गर्भस्थ शिशु है, वह आज से ही मेरा बच्चा है। बेटा हो या बेटी, जो भी हो, वह आज से हमारा है। श्वेता, यह बच्चा तुम्हारे भाई और भाभी की बेरंग ज़िंदगी को पूरी तरह से बदल सकता है। हमारे इतने बड़े घर का जो डरावना सूनापन है और तुम्हारी भाभी के मन का जो खालीपन है, उसे सिर्फ और सिर्फ यह बच्चा ही दूर कर सकता है।"


श्वेता स्तब्ध रह गई। उसने कभी अपने मज़बूत और सख्त भाई को इस तरह टूटते और गिड़गिड़ाते हुए नहीं देखा था। 


अनुपम की आँखों से आँसू छलक पड़े और वे श्वेता के हाथों पर गिर गए। उसने आगे कहा, "क्या तुम नहीं चाहती कि तुम्हारे भैया-भाभी भी अपनी बची हुई ज़िंदगी हँसकर और खुश होकर जिएं? हमारे पास सब कुछ है श्वेता—पैसा, घर, गाड़ियाँ... लेकिन एक बच्चे की किलकारी के बिना यह सब मिट्टी के समान है। श्वेता, तुम्हें भगवान ने दाता बनाया है, तुम्हें मातृत्व का वरदान दिया है। और आज... आज तुम्हारा वही बड़ा भाई और भाभी तुम्हारे द्वार पर याचक बनकर, भिखारी बनकर खड़े हैं। इस बच्चे की धड़कन मत रोको श्वेता, इसे हमारे लिए दुनिया में ले आओ।"


अनुपम के ये वचन श्वेता के दिल में किसी तीर की तरह लगे। अपने बड़े भाई को इस तरह हाथ जोड़े और रोते हुए देखकर श्वेता का सारा अहंकार, समाज का डर और अपने करियर की चिंता एक पल में टूट कर बिखर गई। 


उसे अचानक अपना बचपन याद आ गया। कैसे जब वह छोटी थी और किसी खिलौने या फ्रॉक के लिए ज़िद करती थी, तो अनुपम भैया अपनी पॉकेट मनी बचाकर, अपनी ज़रूरतें मारकर उसकी हर ज़िद पूरी करते थे। कैसे एक बार जब श्वेता को तेज़ बुखार था, तो अनुपम रात-रात भर उसके सिरहाने बैठकर पट्टियां बदलता था। वह जब भी अधिकार पूर्वक कोई चीज़ मांगती थी, तो अनुपम हमेशा मुस्कुराकर अपनी लाडली बहन की झोली भर देते थे। उस बड़े भाई ने बचपन से लेकर उसकी शादी तक सिर्फ दिया ही दिया था, कभी कुछ माँगा नहीं था। और आज, जब वह जीवन में पहली बार अपनी बहन से कुछ माँग रहा था, तो क्या वह उसे खाली हाथ लौटा देती?


"नहीं... नहीं मेरे भैया! मेरी भाभी!" श्वेता फूट-फूट कर रो पड़ी और उसने अनुपम के हाथ अपने हाथों में कसकर पकड़ लिए। "आप दोनों मेरे सामने ऐसे हाथ मत जोड़िए, मैं यह पाप नहीं करूँगी। मैं यह कभी बर्दाश्त नहीं कर सकती कि मेरे होते हुए आपकी झोली खाली रहे।"


श्वेता ने अंजलि को गले से लगा लिया और रोते हुए बोली, "भाभी, मैं कल कोई अपॉइंटमेंट नहीं ले रही हूँ। मैं इस बच्चे को जन्म अवश्य दूँगी, लेकिन अपने लिए नहीं, बल्कि आपके लिए। यह बच्चा मेरा नहीं, आपका होगा। आपने आज मुझे एक बहुत बड़े और जघन्य पाप को करने से बचा लिया।" 


उस रात उस कमरे में सिर्फ आँसू थे, लेकिन ये आँसू दुख के नहीं, बल्कि एक नए जीवन की उम्मीद और अटूट पारिवारिक प्रेम के थे। एक बहन ने अपनी कोख का दान देकर ना सिर्फ एक अजन्मी जान को बचा लिया था, बल्कि अपने भाई-भाभी की मृतप्राय ज़िंदगी में फिर से खुशियों के फूल खिला दिए थे। सच ही है, खून के रिश्ते जब अपनी पर आते हैं, तो दुनिया की कोई भी स्वार्थ की दीवार उन्हें रोक नहीं सकती।


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