दिसंबर का महीना अपने चरम पर था और शहर में ठंडी बर्फीली हवाएं किसी नुकीले तीर की तरह जिस्म के आर-पार हो रही थीं। शाम गहराने लगी थी और सड़क पर कोहरे की सफेद चादर बिछने लगी थी। मिल की शिफ्ट खत्म होने के बाद दीनानाथ अपने घर की ओर तेज कदमों से बढ़ रहे थे। उनके बदन पर एक पुराना, कई जगहों से घिसा और उधड़ा हुआ स्वेटर था, जिसकी चेन भी महीनों पहले टूट चुकी थी। हवा के झोंके सीधे उनकी छाती से टकरा रहे थे और उनकी हड्डियां ठिठुर रही थीं। लेकिन आज दीनानाथ के चेहरे पर एक अजीब सी संतुष्टि और खुशी थी। उन्होंने अपनी पतलून की जेब के ऊपर हाथ रखा, जहां उन्होंने बड़ी हिफाजत से चार सौ रुपये दबा रखे थे।
पिछले तीन महीनों से वह रोज अपनी चाय और बीड़ी के पैसे बचाकर दस-बीस रुपये जमा कर रहे थे। आज आखिरकार वह रकम इतनी हो गई थी कि वह अपने लिए एक अच्छा, मोटा और गर्म जैकेट खरीद सकें। इस बार की ठंड उनके पुराने स्वेटर के बस की बात नहीं रह गई थी। कल ही मिल के मुंशी जी ने उन्हें टोकते हुए कहा था, "दीनानाथ, एक ढंग का स्वेटर ले लो, वरना इस ठंड में निमोनिया हो गया तो दवाइयों में जैकेट से चार गुना ज्यादा पैसा लग जाएगा।" दीनानाथ भी मन ही मन तय कर चुके थे कि आज तो वह चौराहे वाली बड़ी दुकान से वह जैकेट लेकर ही घर जाएंगे।
दीनानाथ के कदम सीधे सेठ जमुनादास की दुकान पर जाकर रुके। यह एक बड़ी दुकान थी जहां एक तरफ रेडीमेड कपड़े मिलते थे और दूसरी तरफ स्टेशनरी और बच्चों के सामान का कोना था।
"सेठ जी, जरा वो सामने टंगा हुआ मोटा ऊनी जैकेट दिखाना, वो काले रंग वाला," दीनानाथ ने ठंड से कांपते हुए कहा।
सेठ जी ने जैकेट उतार कर काउंटर पर रख दिया, "अरे दीनानाथ, तुम्हारे लिए ही है। बहुत गर्म माल है, अंदर पूरा रोयां लगा है। वैसे तो साढ़े चार सौ का है, पर तुम मिल वाले हो, तुम्हारे लिए चार सौ लगा दूंगा।"
दीनानाथ की आँखों में चमक आ गई। उन्होंने अपने कांपते हाथों से उस जैकेट को छुआ। उसका कपड़ा इतना मुलायम और गर्म था कि छूते ही राहत महसूस हुई। दीनानाथ ने अपना पुराना उधड़ा हुआ स्वेटर उतारा और उस काले जैकेट को पहन लिया। जैसे ही उन्होंने जैकेट की चेन ऊपर तक खींची, बाहर की वो कातिलाना ठंड अचानक गायब हो गई। शरीर में एक सुखद सी गर्माहट फैलने लगी। दीनानाथ ने एक गहरी सांस ली। उनका अंदाज बिल्कुल सही निकला था। यह जैकेट उनके लिए ही बनी थी। उन्होंने जेब में हाथ डाला और चार सौ रुपये निकालने लगे।
तभी उनकी नजर सेठ जी की दुकान के दूसरे हिस्से पर पड़ी, जहां स्टेशनरी का सामान रखा हुआ था। कांच के शोकेस के अंदर एक बड़ा सा, बेहद सुंदर लकड़ी का डिब्बा रखा था।
दीनानाथ के हाथ जेब में ही रुक गए। उनकी आँखों के सामने उनके आठ साल के बेटे अंशुल का उदास चेहरा घूम गया। अंशुल को चित्रकारी का बहुत शौक था। वह अक्सर चूल्हे के बुझे हुए कोयले से घर की कच्ची दीवारों पर ऐसी तस्वीरें बनाता था कि देखने वाले दंग रह जाते। दो दिन पहले ही स्कूल से आकर उसने बहुत मायूसी से कहा था, "बापू, अगले हफ्ते जिले स्तर की पेंटिंग प्रतियोगिता है। जीतने वाले को शहर के बड़े स्कूल में वजीफा मिलेगा। लेकिन मास्टर जी ने कहा है कि उसमें 'वाटर कलर' (पानी वाले रंग) से ही पेंटिंग बनानी होगी। मेरे पास तो सिर्फ वो टूटे हुए मोमी रंग (क्रेयॉन्स) हैं। कोई बात नहीं बापू, मैं अगले साल हिस्सा ले लूंगा।"
अंशुल की वो 'कोई बात नहीं बापू' वाली बात दीनानाथ के दिल में किसी कांटे की तरह चुभ गई थी। एक पिता के लिए इससे बड़ी बेबसी क्या हो सकती है कि उसका होनहार बच्चा सिर्फ संसाधनों की कमी के कारण अपने सपनों से समझौता कर ले।
"सेठ जी... वो कांच के डिब्बे में जो रंगों का बक्सा है, वो कितने का है?" दीनानाथ की आवाज में एक अजीब सी कशमकश थी।
"अरे वो! वो बहुत बढ़िया कंपनी का वाटर कलर सेट है। असली कलाकारों वाला। उसमें रंग मिलाने वाली प्लेट और पांच तरह के ब्रश भी हैं। पूरे तीन सौ अस्सी रुपये का है," सेठ जमुनादास ने हिसाब लगाते हुए कहा।
दीनानाथ के मन में एक भयानक द्वंद्व युद्ध छिड़ गया। एक तरफ वो काला ऊनी जैकेट था, जिसकी गर्माहट उनके ठिठुरते शरीर को जीवनदान दे रही थी। और दूसरी तरफ रंगों का वो डिब्बा था, जो उनके बेटे अंशुल के बेरंग सपनो में जिंदगी के रंग भर सकता था। उनके पास पैसे सिर्फ एक ही चीज के थे।
दीनानाथ ने बाहर सड़क की ओर देखा। कोहरा और घना हो गया था और हवाओं की सनसनाहट तेज हो गई थी। उन्होंने जैकेट की गर्माहट को आखिरी बार महसूस किया और फिर धीरे से उसकी चेन नीचे खींच दी।
"क्या हुआ दीनानाथ? फिटिंग सही नहीं है क्या? कोई दूसरा दिखाऊं?" सेठ जी ने हैरानी से पूछा।
दीनानाथ ने जैकेट उतार कर वापस सेठ जी की ओर खिसका दी और जेब से चार सौ रुपये निकालकर काउंटर पर रख दिए। "नहीं सेठ जी, जैकेट तो बहुत बढ़िया है... पर मुझे वो रंगों वाला डिब्बा दे दीजिए।"
सेठ जी अवाक रह गए। उन्होंने दीनानाथ के पुराने, फटे हुए स्वेटर को देखा और बोले, "अरे दीनानाथ, दिमाग तो खराब नहीं हो गया है? बाहर कुल्फी जमाने वाली ठंड है और तुम्हारा यह स्वेटर जगह-जगह से फटा हुआ है। रंग तो बाद में भी ले लेना, पहले जान तो बचा ले!"
दीनानाथ ने सेठ जी की बात का कोई जवाब नहीं दिया। सेठ जी ने बड़बड़ाते हुए रंगों का डिब्बा निकाला और बीस रुपये खुल्ले दीनानाथ को वापस कर दिए।
दीनानाथ ने रंगों के उस डिब्बे को अपने सीने से लगा लिया। ऐसा लगा जैसे अंशुल की वो खुशी, जो यह डिब्बा देखकर उसके चेहरे पर आने वाली थी, दीनानाथ के दिल में धड़कने लगी हो।
"सेठ जी, मेरा यह पुराना स्वेटर अभी भी बहुत बढ़िया काम कर रहा है। बस एक जगह से उधड़ गया है, घर जाकर इसमें एक टांका और लगा लूंगा... इतनी भी बुरी हालत नहीं है इसकी," दीनानाथ ने मुस्कुराते हुए कहा।
उन्होंने अपनी पुरानी मफलर को कान पर लपेटा, रंगों के डिब्बे को अपनी शर्ट के अंदर छुपाया ताकि उस पर ओस न गिरे, और दुकान से बाहर निकल आए।
कोहरे से भरी उस सर्द रात में हवाएं अब भी उनके शरीर को चीर रही थीं, लेकिन दीनानाथ को अब ठंड नहीं लग रही थी। उनके सीने से लगे उस रंगों के डिब्बे से एक ऐसी जादुई गर्माहट निकल रही थी, जिसने उनके पूरे वजूद को वात्सल्य की आंच से सेंक दिया था। एक पिता अपने बच्चे की मुस्कान की गर्माहट ओढ़कर, अंधेरी सड़क पर बड़े ही गर्व से घर की ओर बढ़ा चला जा रहा था।
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