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स्वाभिमान की पगडंडी: एक नई भोर

 रोहन जब इस दुनिया में आया था, तो उसके माता-पिता की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। चांद से रोशन चेहरे और बड़ी-बड़ी कजरारी आंखों वाले उस बच्चे को देखकर पूरे मोहल्ले ने बधाइयां दी थीं। घर में मिठाइयां बंटी थीं और मां ने बड़े लाड़ से उसका नाम 'रोहन' रखा था। लेकिन यह खुशियां बस कुछ ही महीनों की मेहमान थीं। जैसे-जैसे रोहन थोड़ा बड़ा हुआ, एक ऐसी कड़वी सच्चाई सामने आई जिसने उस परिवार के सारे सपने तोड़ दिए। रोहन एक किन्नर शिशु था। समाज के तानों, झूठी लोक-लाज और परिवार के दबाव के आगे माता-पिता का प्यार हार गया। जिस बच्चे को मां ने अपनी छाती से लगाकर रखा था, उसे एक अंधेरी रात में भारी मन और आंसुओं के साथ शहर की किन्नर बस्ती की गुरु 'चंपा माई' को सौंप दिया गया। रोहन का अपना परिवार तो उसी दिन खत्म हो गया था, और अब उसका नया परिवार वह किन्नर बस्ती थी। 


किन्नर बस्ती में रोहन का नाम 'रेशमा' रख दिया गया। वहां उसे प्यार तो बहुत मिला, लेकिन वह प्यार उन घुंघरुओं और भड़कीले कपड़ों के बोझ तले दबा हुआ था। रेशमा जैसे-जैसे बड़ी होने लगी, उसने देखा कि उसकी दुनिया के लोग हर सुबह सज-धज कर, रंग-बिरंगी साड़ियां पहनकर और तेज मेकअप करके निकलते हैं। उनका काम शादियों में नाचना, बच्चों के जन्म पर तालियां पीटना और लोगों से नेग मांगना था। लेकिन रेशमा का मन इन सबमें बिल्कुल नहीं लगता था। वह एक बेहद कुशाग्र और मेधावी बच्ची थी। चंपा माई ने उसे बस्ती के पास ही एक सरकारी मिडिल स्कूल में पढ़ने भेज दिया था। रेशमा ने आठवीं कक्षा तक की पढ़ाई में ही इतना ज्ञान और समझ अर्जित कर ली थी, जितनी उस उम्र के सामान्य बच्चों में भी नहीं होती। किताबों में उसका मन रमता था। 


जैसे-जैसे उम्र बढ़ रही थी, रेशमा के अंदर एक गहरी घुटन जन्म लेने लगी थी। जब वह अपने साथियों को सड़कों पर तालियां पीटते, अश्लील इशारे करते या लोगों की झिड़कियां सहते हुए नेग मांगते देखती, तो उसका स्वाभिमान अंदर ही अंदर रोने लगता। उसे वह भड़कीला मेकअप, वह रेशमी साड़ियां और वह शोर-शराबा किसी पिंजरे जैसा लगने लगा था। वह सोचती कि क्या उसके अस्तित्व की बस यही पहचान है? क्या वह अपने हाथों से मेहनत करके दो वक्त की इज्जत की रोटी नहीं कमा सकती? रेशमा को उस वातावरण से अब उबकाई आने लगी थी। उसके भीतर का वह पढ़ा-लिखा इंसान बार-बार उसे धिक्कारता था कि यह जीवन उसके लिए नहीं बना है।


एक रात, जब पूरी बस्ती गहरी नींद में सो रही थी, रेशमा ने एक बहुत बड़ा फैसला लिया। उसने अपने वो सारे भड़कीले कपड़े, चूड़ियां और घुंघरू एक संदूक में बंद कर दिए। उसने एक साधारण सा सूती सलवार-कमीज पहना, अपने कुछ कपड़े और अपनी पुरानी किताबें एक झोले में डालीं और चंपा माई के पैरों को खामोशी से छूकर हमेशा के लिए उस बस्ती से निकल गई। उसे नहीं पता था कि वह कहां जा रही है, बस इतना पता था कि उसे अपने आत्मसम्मान की तलाश है। 


चलते-चलते और कई बसें बदलते हुए रेशमा शहर की चकाचौंध से बहुत दूर एक छोटे और पिछड़े हुए कस्बे 'धरमपुर' में पहुंच गई। यहां उसे कोई नहीं जानता था। उसने यहां अपना नाम बदलकर 'रवि' रख लिया और एक पुरुष की तरह साधारण कपड़ों में रहने लगी। धरमपुर में जिंदगी आसान नहीं थी। रवि ने अपना पेट पालने के लिए एक ईंट भट्ठे पर मजदूरी करना शुरू कर दिया। जो हाथ कभी नाचने के लिए उठते थे, अब वे ईंटें ढोते-ढोते छिल गए थे। तपती धूप में पसीना बहाना पड़ता था, लेकिन शाम को जब रवि अपनी मेहनत के पैसों से सूखी रोटी खरीदकर खाता, तो उसे उसमें जो मिठास और जो सुकून मिलता, वह किन्नर बस्ती के उन पकवानों में कभी नहीं था। 


धीरे-धीरे रवि ने अपनी मजदूरी के पैसों से कुछ बचत की और एक पुरानी सिलाई मशीन खरीद ली। रात के वक्त वह लोगों के कपड़े सिलता। उसकी ईमानदारी, मेहनत और साफ मन देखकर कस्बे के लोग उसका सम्मान करने लगे थे। लेकिन रवि के जीवन का असली लक्ष्य सिर्फ पैसा कमाना नहीं था। उसने देखा कि ईंट भट्ठे पर काम करने वाले मजदूरों के बच्चे दिन भर मिट्टी में खेलते रहते हैं, उनके पास न शिक्षा है न कोई भविष्य। रवि ने उन बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया। दिन में मजदूरी, शाम को सिलाई और फिर उन अनाथ और गरीब बच्चों को अक्षर ज्ञान देना—यही रवि की नई दुनिया बन गई। 


रवि ने समाज सेवा को अपने जीवन का एक अटूट हिस्सा बना लिया। उसने अपनी झोपड़ी को ही एक छोटा सा स्कूल बना दिया। जिन बच्चों को समाज ने दरकिनार कर दिया था, रवि ने उन्हें अपने गले से लगाया। जो माता-पिता उसे बचपन में त्याग चुके थे, उनका खालीपन रवि ने इन बच्चों का माता-पिता बनकर भर दिया। आज धरमपुर में रवि को एक किन्नर के रूप में नहीं, बल्कि 'मास्टर जी' के रूप में जाना जाता है। उसने साबित कर दिया था कि एक इंसान की पहचान उसके जन्म या उसके लिंग से नहीं, बल्कि उसकी मेहनत, उसके स्वाभिमान और उसके निस्वार्थ कर्मों से होती है। उसने अपने लिए एक ऐसा परिवार चुन लिया था जो खून के रिश्तों से नहीं, बल्कि इंसानियत के धागों से बंधा था।


**क्या आपको भी लगता है कि हर इंसान को, चाहे वह किसी भी वर्ग या पहचान का हो, सम्मान से जीने और अपनी राह खुद चुनने का अधिकार है? अपने विचार हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।**


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