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संदेश

रिश्ते का नामकरण

    उजाड़ से रेलवे स्टेशन पर अकेली बैठी लड़की को मैंने पूछा तो उसने बताया कि वह अध्यापिका बन कर आई है । रात को स्टेशन पर ही रहेगी । प्रात;वहीं से ड्यूटी पर उपस्थित होगी । मैं गाँव में अध्यापक लगा हुआ था ।पहले घट चुकी एक –दो घटनाओं के बारे में मैंने उसे जानकारी दी ।       "आपका रात को यहाँ ठहरना उचित नहीं है । आप मेरे साथ चलें ,मैं किसी के घर में आपके ठहर  ने का प्रबंध कर देता हूँ ।"जब हम गाँव से गुजर रहे थे तो मैंने इशारा कर बताया –मैं इस  चौबारे में रहता हूँ ।       "अटैची जमीन पर रख वह बोली –थोड़ी देर आपके कमरे में ही ठहर जाते हैं । मैं हाथ –मुँह धोकर कपड़े बदल लूँगी ।" बिना किसी वार्तालाप के हम दोनों  कमरे में आ गए ।       "आपके साथ और कौन रहता है ?"       "मैं अकेला ही रहता हूँ ।"       "बिस्तर तो दो लगे हुये हैं ।"       "कभी –कभी मेरी  माँ आ जाती हैं ।"   ...

बिंदास

  चाची क्या हो रहा, चाय साय हो गई, नहीं रे अभी तो उठी हूं अब शुरू करूंगी धीरे धीरे सारे काम झाड़ू बहाडू बर्तन चौंका फिर पूजा कमरा साफ़ करके बर्तन धोना,तब न नहाना होगा। इतनी जल्दी कहां चाय नसीब होती है । पर तू बता कहां सुबह सुबह निकल पड़ा। कुछ नहीं चाची बस यूंही मन बहुत घबरा रहा था तो सोचा चलो सुबह की ताजी हवा खा आता हूं , तुम तो जानती हो कहते हुए तैरते आंसुओ को आंखों में समेट  उन्हीं के काम में हाथ बंटाने लगा। अच्छा सुनो मैं झाड़ू बर्तन पोंछा कर देता हूं ,तुम जाकर नहा लो जाके जल्दी से पूजा करके अदरक वाली चाय बनाओ। आज चाय पीने का मन है।बहुत दिन हो गए , तुम्हारे हाथ की चाय पिएं कहते हुए हाथ से झाडू छीन लिया और जबरन उन्हें नहाने  भेज दिया। लौटकर आई तो घर एकदम चमाचम चमक रहा था। और वो पूजा करने चली गई। ऐसा तकरीबन साल भर से चल रहा कोई रिश्ता न होते हुए भी एक अजीब रिश्ता कायम हो गया दोनों के बीच। होता भी क्यों न उसके कोई न इनके कोई बस दोनों ही एक दूसरे का सहारा हैं। हुआ यूं की बचपन में ही मां बाप किसी हादसे का शिकार हो गए , पालन पोषण दादी बाबा ने किया पर वो भी कब तक करते । उम्र ...

पंचिंग बैग

  बेटा घर में घुसते ही बोला :- "मम्मी कुछ खाने को दे दो यार बहुत भूख लगी है..!! यह सुनते ही मैंने कहा :- "बोला था ना ले जा कुछ कॉलेज, सब्जी तो बना ही रखी थी..!! बेटा बोला :- "यार मम्मी अपना ज्ञान ना अपने पास रखा करो..!! अभी जो कहा है वो कर दो बस और हाँ, रात में ढंग का खाना बनाना पहले ही मेरा दिन अच्छा नहीं गया है..!! कमरे में गई तो उसकी आंख लग गई थी..!! मैंने जाकर उसको जगा दिया कि कुछ खा कर सो जाए..!! चीख कर वो मेरे ऊपर आया कि जब आँख लग गई थी तो उठाया क्यों तुमने.? मैंने कहा :- तूने ही तो कुछ बनाने को कहा था..!! वो बोला :- "मम्मी एक तो कॉलेज में टेंशन ऊपर से तुम यह अजीब से काम करती हो, दिमाग लगा लिया करो कभी तो..!! तभी घंटी बजी तो बेटी भी आ गई थी..!! मैंने प्यार से पूछा :- "आ गई मेरी बेटी कैसा था दिन.?" बैग पटक कर बोली :- "मम्मी आज पेपर अच्छा नहीं हुआ" मैंने कहा :- "कोई बात नहीं, अगली बार कर लेना" मेरी बेटी चीख कर बोली :- "अगली बार क्या रिजल्ट तो अभी खराब हुआ ना, मम्मी यार तुम जाओ यहाँ से..!! तुमको कुछ नहीं पता" मैं उसके कमरे ...

जोरू का गुलाम

  ’’रामलाल तुम अपनी बीबी से इतना क्यों डरते हो?’’मैने अपने घरेलू नौकर से पूछा।। ’’मै डरता नही मैडम उसकी कद्र करता हूँ उसका सम्मान करता हूँ।’’उसने जबाव दिया। मैं हंसी और बोली-’’ ऐसा कया है उसमें। ना सूरत ना पढी लिखी।’’ जबाव मिला-’’ कोई फर्क नही पडता मैडम कि वो कैसी है पर मुझे सबसे प्यारा रिश्ता उसी का लगता है।’’ ’’जोरू का गुलाम।’’मेरे मुँह से निकला।’’और सारे रिश्ते कोई मायने नही रखते तेरे लिये।’’मैने पूछा। उसने बहुत इत्मिनान से जबाव दिया- ’’मैडम जी माँ बाप रिश्तेदार नही होते। वो भगवान होते हैं। उनसे रिश्ता नही निभाते उनकी पूजा करते हैं। भाई बहन के रिश्ते जन्मजात होते हैं , दोस्ती का रिश्ता भी मतलब का ही होता है। आपका मेरा रिश्ता भी दजरूरत और पैसे का है पर, पत्नी बिना किसी करीबी रिश्ते के होते हुए भी हमेशा के लिये हमारी हो जाती है अपने सारे रिश्ते को पीछे छोड़कर। और हमारे हर सुख दुख की सहभागी बन जाती है आखिरी साँसो तक।’’ मै अचरज से उसकी बातें सुन रही थी। वह आगे बोला-’’मैडम जी, पत्नी अकेला रिश्ता नही है, बल्कि वो पूरा रिश्तों की भण्डार है। जब वो हमारी सेवा करती है हमारी देख भाल करती है...

हीरे की परख

  सुहाग की लाल चूड़ियों के बीच अपने हाथों में रची गहरी मेहंदी को निहारते हुए मैं एक अलग ही दुनिया में खोई थी। तभी मेरे पति, रघुनाथ जी ने अखबार से नजरें हटाकर एक व्यंग्यात्मक सवाल उछाल दिया, "क्या बात है सुमेधा? आज यह हाथों में मेहंदी और चेहरे पर इतनी चमक किस खुशी में है? घर में कोई तीज-त्यौहार या किसी खास व्रत-उपवास का दिन है क्या जो मुझे याद नहीं?" मैंने अपनी मेहंदी को सूखने के लिए फूंक मारते हुए, उसी लहजे में एक सवाल उनके सामने रख दिया, "आपको सच में नहीं मालूम? अरे, अपनी अंजलि का रिश्ता तय हो गया है।" "कौन अंजलि?" उन्होंने अपना चश्मा नाक पर नीचे खिसकाते हुए पूछा। "आप भी न, कमाल करते हैं। अरे, अपने सामने वाले फ्लैट में रहने वाले वर्मा जी की बेटी। जिसे आप बचपन से अपने आंगन में खेलते-कूदते देखते आ रहे हैं। इतनी सुंदर, सुशील, संस्कारों से भरी और हर काम में निपुण..." मेरी बात अभी अधूरी ही थी कि रघुनाथ जी ने बीच में टोकते हुए कहा, "वही अंजलि न, जिसे हमारे बेटे रोहन ने यह कहकर रिजेक्ट कर दिया था कि वह बहुत 'साधारण' है और उसके मॉडर्न लाइफस...

**ममता की छाँव: एक अनकहा रिश्ता**

  आंचल का आठवां महीना लग चुका था और अब उसने अपने ऑफिस से मैटरनिटी लीव ले ली थी। शहर की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में आंचल और उसका पति विनीत दोनों ही अकेले पड़ रहे थे। डिलीवरी का समय जैसे-जैसे नज़दीक आ रहा था, घर में एक अजीब सी घबराहट और उत्साह का माहौल था। दोनों परिवारों ने फोन पर लंबी बातचीत की और आपसी सहमति से यह तय हुआ कि डिलीवरी के शुरुआती और सबसे नाज़ुक समय में विनीत की माँ, यानी आंचल की सास कावेरी देवी उनके पास शहर आकर रहेंगी। तय यह भी हुआ कि प्रसव के एक महीने बाद कावेरी देवी वापस अपने घर लौट जाएंगी और तब आंचल की सगी माँ, सुधा जी आकर आगे की ज़िम्मेदारी संभाल लेंगी। कावेरी देवी के लिए यह ज़िम्मेदारी खुशी से ज़्यादा एक चुनौती थी। उन्होंने अपने पति रघुनाथ जी के लिए एक महीने का सूखा राशन, घर के बने स्नैक्स, मठरियां और अचार डिब्बों में भर कर रख दिए। पड़ोस वाली ताई से रघुनाथ जी के लिए दोनों वक्त के टिफिन का भी पक्का इंतज़ाम कर दिया ताकि उनके पीछे से उन्हें कोई तकलीफ़ न हो। भारी मन लेकिन ढेर सारी उम्मीदों के साथ कावेरी देवी ट्रेन में बैठकर विनीत और आंचल के शहर पहुँच गईं। शुरुआती कुछ दिन आं...

अनकहे फैसले

  "निधि में आखिर बुराई क्या है अंश? वह सुशील है, संस्कारी है और हमारे परिवार के लिए एकदम सही है। मैंने उसे अपने हाथों से परखा है बेटा, वह तुम्हें बहुत खुश रखेगी..." कावेरी ने अपनी रुंधती हुई आवाज़ में अपने बेटे को रोकने का आखिरी प्रयास किया था। लेकिन अंश ने दरवाजे की चौखट पर रुककर, बिना पीछे मुड़े एक ही झटके में सारी उम्मीदें तोड़ दीं। "आई एम सॉरी माँ, मैं उस लड़की से शादी नहीं कर सकता जिससे मैं प्यार नहीं करता। मेरे लिए शादी का मतलब सिर्फ आपका दिया हुआ कोई आदेश या परिवार की पसंद नहीं है। यह मेरी पूरी ज़िंदगी का सवाल है," अंश इतना कहकर अपने कमरे में चला गया और दरवाज़ा ज़ोर से बंद कर लिया। उस बंद होते दरवाज़े की आवाज़ कावेरी के कानों में किसी धमाके की तरह गूंजी। कावेरी वहीं सोफे पर बेजान सी होकर बैठ गई। उसकी आँखों से आँसुओं की धारा बह निकली। उसने तो सपने सजा लिए थे कि निधि लाल जोड़े में उसके घर की बहू बनकर आएगी और इस घर के आँगन को खुशियों से भर देगी। लेकिन तभी सामने बैठे उसके पति, रमेश बाबू ने एक ऐसा कड़वा सच कहा, जो कावेरी को तीरों की तरह चुभ गया। "ग़लती तुम्हा...