आंचल का आठवां महीना लग चुका था और अब उसने अपने ऑफिस से मैटरनिटी लीव ले ली थी। शहर की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में आंचल और उसका पति विनीत दोनों ही अकेले पड़ रहे थे। डिलीवरी का समय जैसे-जैसे नज़दीक आ रहा था, घर में एक अजीब सी घबराहट और उत्साह का माहौल था। दोनों परिवारों ने फोन पर लंबी बातचीत की और आपसी सहमति से यह तय हुआ कि डिलीवरी के शुरुआती और सबसे नाज़ुक समय में विनीत की माँ, यानी आंचल की सास कावेरी देवी उनके पास शहर आकर रहेंगी। तय यह भी हुआ कि प्रसव के एक महीने बाद कावेरी देवी वापस अपने घर लौट जाएंगी और तब आंचल की सगी माँ, सुधा जी आकर आगे की ज़िम्मेदारी संभाल लेंगी।
कावेरी देवी के लिए यह ज़िम्मेदारी खुशी से ज़्यादा एक चुनौती थी। उन्होंने अपने पति रघुनाथ जी के लिए एक महीने का सूखा राशन, घर के बने स्नैक्स, मठरियां और अचार डिब्बों में भर कर रख दिए। पड़ोस वाली ताई से रघुनाथ जी के लिए दोनों वक्त के टिफिन का भी पक्का इंतज़ाम कर दिया ताकि उनके पीछे से उन्हें कोई तकलीफ़ न हो। भारी मन लेकिन ढेर सारी उम्मीदों के साथ कावेरी देवी ट्रेन में बैठकर विनीत और आंचल के शहर पहुँच गईं।
शुरुआती कुछ दिन आंचल के लिए थोड़े असहज थे। एक बहू के लिए अपनी सास के सामने हर तरह की कमज़ोरी या दर्द जाहिर करना आसान नहीं होता। उसे बार-बार अपनी माँ सुधा की याद आती थी। उसे लगता था कि माँ होती तो बिना कहे उसकी थकान समझ जाती, उसके पैर दबा देती, लेकिन सास से ये सब कैसे करवाया जाए? यह झिझक आंचल के मन में एक दीवार की तरह खड़ी थी।
लेकिन कावेरी देवी इस दीवार को बहुत बारीकी से देख और समझ रही थीं। उन्होंने सास का चोला उसी दिन उतार दिया था जिस दिन उन्होंने आंचल के सूजे हुए पैरों को देखा था। एक शाम जब आंचल कमर दर्द से बेहाल होकर अपने बिस्तर पर करवटें बदल रही थी, तब कावेरी देवी चुपचाप गुनगुना तेल लेकर आईं और आंचल के पैरों के पास बैठ गईं।
"अरे माँ जी! आप यह क्या कर रही हैं? मुझे पाप लगेगा, आप मेरे पैर मत दबाइए," आंचल हड़बड़ा कर उठने लगी।
कावेरी देवी ने प्यार से उसे वापस लिटाते हुए कहा, "पाप तो मुझे तब लगेगा बेटा, जब मेरी बच्ची दर्द में तड़पे और मैं सास होने के झूठे गुरूर में बैठी रहूँ। तू इस वक़्त मेरी बहू नहीं है, तू बस एक माँ बनने वाली है, और मैं तेरी माँ हूँ। चुपचाप लेट जा।"
उस रात कावेरी देवी के हाथों के स्पर्श में आंचल को सचमुच अपनी माँ सुधा का अहसास हुआ। उसके बाद से कावेरी देवी ने आंचल को एक फूल की तरह सहेज कर रखा। सुबह उसके उठने से पहले पौष्टिक गोंद और मेवे के लड्डू तैयार रहते। आंचल को क्या खाने का मन है, इसका ध्यान विनीत से भी ज़्यादा कावेरी देवी रखने लगी थीं।
आखिरकार वह रात आ ही गई जिसका सबको इंतज़ार था। आंचल को अचानक बहुत तेज़ दर्द शुरू हुआ। विनीत और कावेरी देवी उसे तुरंत अस्पताल ले गए। लेबर रूम के बाहर कावेरी देवी एक पल के लिए भी कुर्सी पर नहीं बैठीं। उनके होंठ लगातार प्रार्थना में हिल रहे थे। जब आंचल दर्द से चीख रही थी, तो अंदर से उसकी आवाज़ सुनकर कावेरी देवी की आँखों से आंसू बहने लगे। कुछ ही देर में डॉक्टर ने खुशखबरी दी कि घर में एक प्यारी सी लक्ष्मी आई है। कावेरी देवी ने जैसे ही उस नन्हीं सी जान को अपनी गोद में लिया, उनके सारे कष्ट, सारी थकान जैसे छूमंतर हो गई।
डिलीवरी के बाद के दिन और भी मुश्किल थे। रात-रात भर बच्ची के रोने से आंचल की नींद पूरी नहीं हो पाती थी। ऐसे में कावेरी देवी ने खुद को एक ढाल बना लिया। वे आंचल को सिर्फ दूध पिलाने के लिए जगातीं और बाकी पूरी रात बच्ची को अपने सीने से लगाकर लोरी सुनातीं और टहलती रहतीं, ताकि आंचल कम से कम कुछ घंटे चैन की नींद सो सके। आंचल का शरीर कमज़ोर था, और कावेरी देवी ने उसे बिस्तर से नीचे पांव तक नहीं रखने दिया। वे उसे अपने हाथों से खाना खिलातीं, उसके बाल संवारतीं और उसका दर्द बांटतीं।
एक महीना कैसे बीत गया, किसी को पता ही नहीं चला। अब तय योजना के अनुसार कावेरी देवी को वापस अपने घर लौटना था, क्योंकि उनके पति वहां अकेले थे, और आंचल की माँ सुधा जी शहर आ चुकी थीं।
सुधा जी के आने पर घर में रौनक तो थी, लेकिन कावेरी देवी के जाने की तैयारी देखकर आंचल का दिल भारी हो रहा था। जिस सास से वह एक महीने पहले तक थोड़ा कतराती थी, आज उसी सास में उसे अपना सबसे बड़ा सहारा दिखने लगा था।
कावेरी देवी ने अपना बैग पैक किया और सुधा जी के हाथ में घर की चाबियां और आंचल की दवाइयों का पर्चा थमाते हुए बोलीं, "सुधा जी, अब मेरी ज़िम्मेदारी पूरी हुई। आंचल और मेरी पोती अब आपके हवाले हैं। मैंने इसे बिल्कुल अपनी बच्ची की तरह रखा है।"
तभी आंचल, जो कमरे के दरवाज़े पर खड़ी थी, फूट-फूट कर रोने लगी। वह दौड़कर आई और कावेरी देवी के गले से लिपट गई। "माँ जी... आप मत जाइए ना! मुझे आपकी आदत हो गई है। मेरी बेटी जब रात को रोती है तो वो सिर्फ आपकी आवाज़ सुनकर चुप होती है। आप चली जाएंगी तो मेरा क्या होगा?"
आंचल के ये शब्द सुनकर कावेरी देवी की आँखों से भी आंसू छलक पड़े। सुधा जी, जो अब तक सास-बहू के इस रूप को सिर्फ कहानियों में सुनती आई थीं, आज अपनी आँखों के सामने इस पवित्र रिश्ते को देखकर भावविभोर हो गईं। उन्होंने आगे बढ़कर कावेरी देवी का हाथ पकड़ लिया।
"बहन जी," सुधा जी ने रुंधे हुए गले से कहा, "एक जन्म देने वाली माँ से कहीं बड़ी होती है वो माँ, जो दर्द में अपनी बच्ची को संभालती है। आपने मेरी बेटी को जो प्यार दिया है, उसके आगे मैं भी छोटी पड़ गई हूँ। आप जा तो रही हैं, लेकिन आंचल के दिल में अब मैं नहीं, आपकी जगह सबसे ऊपर है।"
कावेरी देवी ने आंचल का माथा चूमा और उसे समझाते हुए कहा, "पगली, मैं कोई हमेशा के लिए थोड़े ही जा रही हूँ। तेरे बाबूजी वहां अकेले परेशान हो रहे होंगे। तू जल्दी से ठीक होकर दिवाली पर मेरी पोती को लेकर घर आ जा। तेरा कमरा इंतज़ार कर रहा है।"
आंचल ने अपने आँसू पोंछे और मुस्कुराते हुए हामी भरी। उस दिन जब कावेरी देवी घर से विदा हुईं, तो वह सिर्फ एक सास की विदाई नहीं थी, बल्कि एक माँ की विदाई थी, जिसने अपने निस्वार्थ प्रेम से एक बहू का दिल हमेशा के लिए जीत लिया था।
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