सुहाग की लाल चूड़ियों के बीच अपने हाथों में रची गहरी मेहंदी को निहारते हुए मैं एक अलग ही दुनिया में खोई थी। तभी मेरे पति, रघुनाथ जी ने अखबार से नजरें हटाकर एक व्यंग्यात्मक सवाल उछाल दिया, "क्या बात है सुमेधा? आज यह हाथों में मेहंदी और चेहरे पर इतनी चमक किस खुशी में है? घर में कोई तीज-त्यौहार या किसी खास व्रत-उपवास का दिन है क्या जो मुझे याद नहीं?"
मैंने अपनी मेहंदी को सूखने के लिए फूंक मारते हुए, उसी लहजे में एक सवाल उनके सामने रख दिया, "आपको सच में नहीं मालूम? अरे, अपनी अंजलि का रिश्ता तय हो गया है।"
"कौन अंजलि?" उन्होंने अपना चश्मा नाक पर नीचे खिसकाते हुए पूछा।
"आप भी न, कमाल करते हैं। अरे, अपने सामने वाले फ्लैट में रहने वाले वर्मा जी की बेटी। जिसे आप बचपन से अपने आंगन में खेलते-कूदते देखते आ रहे हैं। इतनी सुंदर, सुशील, संस्कारों से भरी और हर काम में निपुण..."
मेरी बात अभी अधूरी ही थी कि रघुनाथ जी ने बीच में टोकते हुए कहा, "वही अंजलि न, जिसे हमारे बेटे रोहन ने यह कहकर रिजेक्ट कर दिया था कि वह बहुत 'साधारण' है और उसके मॉडर्न लाइफस्टाइल में फिट नहीं बैठेगी?"
उनके इस एक वाक्य ने मेरे दिल के किसी गहरे कोने में दबे हुए घाव को फिर से हरा कर दिया। मेरे चेहरे की मुस्कान अचानक एक गहरी उदासी में बदल गई। मैंने एक लंबी सांस ली और कहा, "हां, वही अंजलि। जिसे हमने और हमारे बेटे ने कांच का टुकड़ा समझकर ठुकरा दिया था, आज किसी ने उस हीरे की असली कीमत पहचान ली है।"
कमरे में एक भारी खामोशी छा गई। रघुनाथ जी ने अखबार एक तरफ रख दिया। अंजलि हमारे लिए सिर्फ पड़ोस की लड़की नहीं थी। जब मैं पिछले साल टाइफाइड से महीनों बिस्तर पर पड़ी थी, तो वह अंजलि ही थी जो कॉलेज से लौटकर अपना समय निकालकर मेरे लिए सूप बनाती, मेरे सिरहाने बैठकर मेरे बाल सहलाती और मुझे अपनी मीठी बातों से हंसाती थी। मैंने हमेशा मन ही मन चाहा था कि अंजलि मेरे घर की बहू बने। वर्मा जी भी इस रिश्ते के लिए राजी थे। लेकिन जब हमने यह बात रोहन के सामने रखी, तो उसने साफ इंकार कर दिया।
रोहन एक मल्टीनेशनल कंपनी में ऊंचे पद पर था। उसका कहना था कि अंजलि एक साधारण सी स्कूल टीचर है, जो न तो कॉर्पोरेट पार्टियों में उसके साथ जाने लायक है और न ही उसका पहनावा मॉडर्न है। रोहन ने अपनी पसंद से निहारिका से शादी की। निहारिका बहुत पढ़ी-लिखी, बड़े पैकेज वाली और बेहद 'मॉडर्न' लड़की थी। लेकिन उस मॉडर्निटी के साथ जो अहंकार इस घर में आया, उसने हमारे आंगन की सारी खुशियां छीन लीं। निहारिका के पास हमारे लिए कभी दो मिनट का समय नहीं होता। वह हमारे साथ बैठकर एक कप चाय पीना भी अपनी शान के खिलाफ समझती है। जब रघुनाथ जी की तबीयत खराब होती है, तो वह फोन पर पिज्जा तो ऑर्डर कर लेती है, लेकिन उनके लिए एक कटोरी खिचड़ी बनाने में उसे शर्मिंदगी महसूस होती है। रोहन भी अपनी पत्नी के इस व्यवहार पर चुप रहता है, क्योंकि उसे लगता है कि उसका 'स्टेटस' यही है।
मैंने अपनी भीगी आंखों को पोंछते हुए रघुनाथ जी से कहना शुरू किया, "आपको पता है अंजलि का रिश्ता कहां तय हुआ है? सेना के एक बहुत बड़े अफसर के साथ। मेजर विक्रम। लड़का देखने में जितना रुबदार है, स्वभाव से उतना ही जमीन से जुड़ा हुआ। कल जब वे लोग अंजलि को देखने आए, तो मेजर विक्रम ने वर्मा जी के पैर छूकर कहा कि उन्हें कोई बहुत ज्यादा कमाने वाली या क्लब जाने वाली लड़की नहीं चाहिए, बल्कि एक ऐसी जीवनसाथी चाहिए जो घर को घर बना सके, जिसमें संस्कार हों और जो रिश्तों की कद्र करे।"
रघुनाथ जी की आंखें नीचे झुकी हुई थीं। उनके चेहरे पर एक पिता होने की बेबसी और अपने बेटे के गलत फैसले का गहरा पश्चाताप साफ झलक रहा था।
"वर्मा जी बता रहे थे," मैंने अपनी बात जारी रखी, "लड़के वालों ने दहेज के नाम पर एक रुपया नहीं मांगा। उल्टा उन्होंने कहा है कि अंजलि जैसी पढ़ी-लिखी और संस्कारी बेटी पाकर उनका घर धन्य हो गया। मेजर विक्रम ने तो यहां तक कहा कि अगर अंजलि शादी के बाद भी पढ़ाना चाहे, तो उन्हें बहुत खुशी होगी। उस लड़के ने अंजलि के उस सीधेपन को उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि उसका सबसे बड़ा गहना माना है।"
रघुनाथ जी ने अपनी नम आंखें उठाईं और रुंधे हुए गले से बोले, "हम अभागे निकले सुमेधा। हमारे आंगन में साक्षात लक्ष्मी खुद चलकर आई थी, लेकिन हमारे बेटे ने झूठी चमक-दमक के पीछे भागकर उसे ठुकरा दिया। आज इस घर में सब कुछ है— बड़ी गाड़ियां, महंगे गैजेट्स, नौकर-चाकर... लेकिन वो सुकून और वो अपनापन नहीं है, जो एक संस्कारी बहू के आने से होता है। आज मुझे महसूस हो रहा है कि अंजलि का रिजेक्ट होना अंजलि का नहीं, बल्कि हमारी किस्मत का रिजेक्ट होना था।"
मैं उठकर उनके पास गई। मेरी मेहंदी लगभग सूख चुकी थी। मैंने कहा, "मैंने यह मेहंदी अपनी खुशी के लिए नहीं लगाई है। मैंने यह मेहंदी उस बेटी की विदाई के लिए लगाई है, जिसे मैं अपनी बहू बनाना चाहती थी। मैं कल सगाई में जाऊंगी, उसे अपना आशीर्वाद दूंगी और ईश्वर से प्रार्थना करूंगी कि निहारिका को भी सद्बुद्धि मिले। शायद रोहन को किसी दिन यह अहसास हो कि उसने क्या खोया है, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होगी।"
अगले दिन अंजलि की सगाई में पूरा मोहल्ला शामिल था। लाल जोड़े में अंजलि किसी अप्सरा जैसी लग रही थी। मेजर विक्रम के साथ उसकी जोड़ी देखकर हर किसी की आंखें खुशी से छलक रही थीं। मैं और रघुनाथ जी एक कोने में खड़े यह सब देख रहे थे। हमने आगे बढ़कर अंजलि को आशीर्वाद दिया। उसने छलकती आंखों से मेरे गले लगकर कहा, "आप हमेशा मेरी मां जैसी रहेंगी आंटी।"
उस रात जब हम अपने आलीशान लेकिन ठंडे और खामोश घर में लौटे, तो रोहन और निहारिका अपने कमरे में तेज आवाज में संगीत सुनकर पार्टी कर रहे थे। उन्हें हमारी मौजूदगी या हमारी उदासी से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। रघुनाथ जी ने अपने कमरे का दरवाजा धीरे से बंद किया और बिस्तर पर लेट गए। उस बंद कमरे के अंधेरे में आज सिर्फ दो बूढ़े माता-पिता के आंसुओं की खामोश आवाज थी, जो अपने बेटे की उस भूल पर विलाप कर रही थी जिसे अब कभी सुधारा नहीं जा सकता था।
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**आपकी क्या राय है?**
क्या रोहन का अंजलि को सिर्फ उसके सीधेपन और साधारण रहन-सहन के कारण ठुकराना सही था? क्या बाहरी दिखावा, मॉडर्न लाइफस्टाइल और हाई सैलरी ही आज के समाज में शादी और एक सफल जीवनसाथी का इकलौता पैमाना रह गया है? जब घर में संस्कार और सम्मान की कमी हो, तो क्या बड़ी-बड़ी डिग्रियां किसी काम आती हैं? अंजलि और रोहन के इस फैसले पर अपने विचार हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।
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