साँवली

 संध्या ऑफिस में सबकी पसंदीदा थी — मेहनती, सुलझी हुई और अपनी बातों से सबका दिल जीत लेने वाली। रंग उसका गेहुँआ था, पर आत्मविश्वास और व्यक्तित्व इतना मजबूत कि लोग उसकी उपस्थिति भर से प्रभावित हो जाते थे। अपने ऑफिस में उसके साथ ही काम करता था अरविंद — गोरा, लंबा, स्मार्ट और बेहद आकर्षक व्यक्तित्व वाला। शुरुआत में संध्या ने उसे बस सहकर्मी समझा, पर वक्त के साथ दोनों के बीच एक गहरी समझ और लगाव पनपने लगा।

अरविंद का परिवार बड़े व्यवसायी वर्ग से था। संध्या को देखकर पहली बार उसकी माँ ने कहा था —
“बेटा, लड़की तो ठीक लग रही है, पर थोड़ी सी साँवली है ना?”

अरविंद ने मुस्कुराकर कहा,
“माँ, मुझे उसके रंग से नहीं, उसके दिल से प्यार हुआ है। रंग तो वक्त के साथ बदल जाता है, लेकिन स्वभाव और समझदारी कभी नहीं बदलती।”

अरविंद की बात सुनकर माँ चुप हो गईं, और शादी तय हो गई। शादी बड़े धूमधाम से हुई। संध्या के माता-पिता ने भी अपनी तरफ़ से कोई कमी नहीं रखी। अरविंद के घरवालों ने बाहरी तौर पर तो मुस्कुराकर सब स्वीकार किया, मगर अंदर ही अंदर उन्हें अपने “सुंदर” बेटे के लिए “सांवली” बहू पर गर्व नहीं, बोझ महसूस होता था।

शादी के शुरुआती कुछ महीने तो अच्छे बीते, लेकिन धीरे-धीरे सास की ज़ुबान ज़हर घोलने लगी। जब भी मेहमान आते, वो मुस्कुराते हुए कह देतीं —
“हमारे घर में तो सब गोरे-गोरे हैं, पर बहू ने तो हमारी नस्ल पर बट्टा लगा दिया।”
सबके सामने वो ऐसा कह देतीं और फिर हँसतीं, जैसे कोई मज़ाक किया हो।

संध्या पहले तो चुप रह जाती। सोचती, “सास हैं, उम्र में बड़ी हैं, शायद समझ न पाती हों कि ऐसे शब्द कितने चोट पहुँचाते हैं।”
लेकिन बात यहीं तक नहीं रुकी।

जब किसी पड़ोसी ने शादी की तारीफ़ करते हुए कहा —
“आपके बेटे की तो बहुत किस्मत खुल गई इतनी अच्छी बहू पाई है,”
तो सास ने ठहाका मारकर कहा —
“अरे किस्मत? अब रंगरूप देखो बहू का, गोरा बेटा और साँवली बहू — भला ये जोड़ी कौन सी जँचती है?”

संध्या का चेहरा सुर्ख पड़ गया था। अंदर गहरा दर्द हुआ, लेकिन उसने अपने चेहरे पर कोई भाव नहीं आने दिया। वह बस वहाँ से उठकर कमरे में चली गई।

रात को अरविंद से कहा —
“तुम्हारी माँ मुझे क्यों हर बार सबके सामने नीचा दिखाती हैं? क्या मेरे रंग से इतनी नफ़रत है उन्हें?”

अरविंद ने थके हुए स्वर में कहा —
“माँ का स्वभाव ही ऐसा है, उन्हें आदत है मज़ाक में बोलने की। तुम दिल पे मत लो।”

संध्या ने कहा —
“अगर कोई रोज़ तुम्हारे आत्मसम्मान पर तंज़ कसता रहे, तो क्या वो भी मज़ाक कहलाएगा?”

अरविंद चुप हो गया। शायद उसके पास कोई जवाब नहीं था।

दिन बीतते गए। सास का व्यवहार और कटु होता गया। कभी कहतीं —
“काली बहू तो घर में आई, अब तो हमारे खानदान की किस्मत भी काली हो जाएगी।”
कभी कहतीं —
“देखो, ये तो हमारी दादी से भी सांवली है, अब तो भगवान ही जाने इसके बच्चों का क्या होगा।”

हर बार जब सास ऐसे शब्द बोलतीं, संध्या की आत्मा तक कांप उठती। पर उसने हमेशा संयम रखा, क्योंकि वो अपने रिश्ते को तोड़ना नहीं चाहती थी।

एक दिन नीलम — अरविंद की बहन — मायके आई हुई थी। उसने देखा कि उसकी माँ रोज़ किसी न किसी बात पर भाभी को नीचा दिखा रही है।
उसने हँसते हुए कहा —
“माँ, आप भी ना! अब ज़माना बदल गया है, कोई किसी के रंग से किसी की क़ीमत नहीं आँकता।”
माँ बोलीं —
“तू तो चुप रह! तू क्या जाने, लोग क्या कहेंगे? गोरा बेटा, काली बहू!”

उस दिन शाम को, जब सास फिर मेहमानों के सामने वही “रंग” का मज़ाक दोहराने लगीं, तो संध्या का सब्र टूट गया।
वो शांत स्वर में, लेकिन दृढ़ नज़रों से सास की तरफ़ देखती हुई बोली —
“माँ जी, मैं आपको एक बात साफ़-साफ़ कहना चाहती हूँ। रंग भगवान देता है, और स्वभाव इंसान बनाता है। अगर मुझे साँवला बनाया है, तो ये उसकी मर्ज़ी है। लेकिन जो दिल में अंधेरा लिए बैठे हैं, वो शायद कभी नहीं समझेंगे कि असली सौंदर्य रंग में नहीं, इंसानियत में होता है।”

कमरे में सन्नाटा छा गया।
संध्या आगे बोली —
“आप हर बार मेरे रंग पर ताना देती हैं, लेकिन अपने बेटे की आदतों पर कभी कुछ नहीं कहतीं। क्या आपने देखा है कि वो रोज़ शराब पीकर आता है? आपने कभी पूछा क्यों वो ऑफिस से देर रात घर आता है? आपने कभी सोचा कि वो जुआ क्यों खेलता है? अगर मैं सांवली हूँ तो वो भी कोई देवता नहीं। पर मैंने कभी आपके बेटे को नीचा नहीं दिखाया, क्योंकि मैं मानती हूँ कि इज़्ज़त रिश्तों की होती है, रंगों की नहीं।”

अरविंद भी उस वक्त वहीं बैठा था। उसकी नज़रें झुक गईं। सास की बोलती बंद हो गई। वो बुदबुदाई,
“तू तो बहुत ज़बान वाली हो गई है बहू!”

संध्या ने दृढ़ता से कहा —
“नहीं माँ जी, अब तक चुप थी क्योंकि मैं सम्मान देती थी। लेकिन आज इसलिए बोली हूँ ताकि मेरा बच्चा जब इस दुनिया में आए, तो उसे अपनी माँ के रंग पर नहीं, उसकी हिम्मत पर गर्व हो।”

इतना कहकर वह अपने कमरे में चली गई।

रात में अरविंद ने बहुत देर तक सोचा। उसे एहसास हुआ कि उसने हमेशा अपनी माँ को गलत होने के बावजूद सही ठहराया। उसने संध्या से माफ़ी माँगी।
“मैंने तुम्हारे साथ बहुत अन्याय किया संध्या, मुझे तुम्हारे आत्मसम्मान के लिए पहले ही आवाज़ उठानी चाहिए थी।”

संध्या ने कहा —
“गलती मान लेना ही सबसे बड़ा सुधार होता है। बस वादा करो, आगे कभी किसी के ताने पर तुम चुप नहीं रहोगे।”

अरविंद ने सिर हिलाया।

धीरे-धीरे घर का माहौल बदलने लगा। सास को अपनी गलती का एहसास तो नहीं हुआ, लेकिन उन्होंने ताने देने बंद कर दिए।
कुछ महीनों बाद संध्या माँ बनी। उसके गोद में प्यारी सी बिटिया आई। सब उसे देखकर बोले —
“अरे वाह! बिलकुल माँ जैसी है — सुंदर और समझदार!”

संध्या मुस्कुराई और कहा —
“हाँ, क्योंकि सुंदरता वही होती है जो दिल में होती है।”

उस दिन अरविंद की माँ ने पहली बार बिना किसी ताने के बहू को गले लगाया। शायद उन्हें समझ आ गया था कि जो लड़की अपने रंग को ही नहीं, अपने सम्मान को भी गर्व से जीना जानती है — वही सच में घर की रोशनी होती है।

और उस दिन पहली बार, इस घर में किसी का रंग नहीं, उसका चरित्र चर्चा का विषय बना।

रंजीता पाण्डेय


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