माँ की चिट्ठी

 सुबह का वक़्त था।

खिड़की से आती हल्की धूप कमरे में फैल रही थी।
रवि ऑफिस जाने की तैयारी में था, और उसकी 10 साल की बेटी सिया स्कूल के लिए तैयार हो रही थी।

“पापा, मम्मी की फोटो यहाँ क्यों रखी है?”
सिया ने अलमारी पर रखी फ्रेम की ओर इशारा किया।

रवि मुस्कुराया — वो मुस्कान जो अब सिर्फ़ आदत बन गई थी।
“क्योंकि वहीं से तुम्हारी मम्मी हमें देखती हैं, बेटा।”
सिया ने भोलेपन से कहा, “तो वो हमें सुन भी सकती हैं?”
रवि की आँखें भर आईं, लेकिन उसने खुद को संभालते हुए कहा, “हाँ बेटा, वो हर वक़्त सुनती हैं… और जब तू हँसती है ना, तो ऊपर आसमान में वो भी मुस्कुराती हैं।”

सिया चुप हो गई। उसने अपनी मम्मी की फोटो को नमस्ते की और स्कूल चली गई।


रवि ने सिया को स्कूल छोड़ा और फिर गाड़ी मोड़ते हुए पुरानी सड़क की ओर निकल गया — वही सड़क जो अब कम ही जाता था।
वो रास्ता उसकी यादों से भरा था…
वहीं से उसने और प्रिया ने साथ में जिंदगी की शुरुआत की थी।

प्रिया — रवि की पत्नी।
छह साल पहले एक सड़क दुर्घटना में वो रवि और सिया को छोड़कर चली गई थी।
रवि ने तब वादा किया था कि वो सिया को माँ और बाप दोनों का प्यार देगा।
पर माँ का प्यार कहाँ किसी से पूरा होता है?


रात को जब सिया सोने गई, उसने धीरे से कहा,
“पापा, क्या मम्मी ने कभी मुझे कुछ लिखा था?”
रवि ने चौककर देखा, “क्यों बेटा?”
“मेरी क्लास में न, एक टीचर ने कहा कि माँ-बाप बच्चों के लिए हमेशा कुछ न कुछ छोड़ जाते हैं… तो मैंने सोचा, मम्मी ने मेरे लिए भी कुछ छोड़ा होगा?”

रवि का गला रुँध गया।
उसे याद आया — हाँ, प्रिया ने सच में कुछ छोड़ा था…
एक चिट्ठी — जो उसने सिया के जन्म के समय लिखी थी।


उस रात रवि ने अलमारी खोली। पुराने कपड़ों, बक्शे और फाइलों के बीच एक छोटा सा लिफाफा रखा था — जिस पर लिखा था —
“मेरी बिटिया सिया के लिए”

रवि ने लिफाफा हाथ में लिया, पर उसे खोलने की हिम्मत नहीं हुई।
वो लिफाफा उसने सालों से संभालकर रखा था, जैसे कोई धड़कन, जो अब भी चलती हो।

सुबह जब सिया उठी, तो रवि ने उसे वो चिट्ठी दी।
“ये तेरी मम्मी की है बेटा… उन्होंने तेरे लिए लिखी थी।”
सिया की आँखें चमक उठीं। उसने काँपते हाथों से लिफाफा खोला।


“मेरी प्यारी सिया,

जब तू ये चिट्ठी पढ़ रही होगी, शायद मैं तेरे पास न रहूँ।
लेकिन याद रखना, मम्मी की खुशबू तेरे हर साँस में रहेगी।
जब तू पहली बार स्कूल जाएगी, मैं तेरे साथ रहूँगी — तेरे बालों में रिबन बाँधने की तरह।
जब तू गिरकर उठेगी, मैं तेरे आँसू पोंछने हवा बनकर आऊँगी।

बिटिया, तेरे पापा बहुत अच्छे इंसान हैं।
कभी सोच मत लेना कि वो सख्त हैं। वो बस तुझे दुनिया से बचाना चाहते हैं।
जब तू उनसे झगड़ेगी, तो याद रखना, वो हर बार तेरी हार देखकर भी मुस्कुराएँगे — क्योंकि वो तेरा चेहरा उदास नहीं देख सकते।

और बेटा… जब कभी तू अकेली महसूस करे, तो आसमान की तरफ देखना —
वहीं एक तारा है जो सबसे तेज़ चमकता है, वही हूँ मैं।
बस मुस्कुरा देना, ताकि वो तारा और चमक उठे।

– तेरी मम्मी”


सिया चुपचाप चिट्ठी पढ़ती रही।
उसकी आँखों से आँसू गिरते रहे, और रवि उसे देखता रहा — जैसे कोई अधूरा वादा फिर पूरा हो रहा हो।
सिया ने चिट्ठी सीने से लगाई और बोली,
“पापा, मम्मी ने सच में तारा बनकर हमें नहीं छोड़ा… वो आज भी यहीं हैं।”

रवि ने सिर झुकाया, “हाँ बेटा, और अब तू उनका सबसे प्यारा हिस्सा है।”


दिन बीतते गए।
सिया बड़ी होती गई।
अब वो 17 साल की थी, स्कूल खत्म कर कॉलेज में दाखिला लेने की तैयारी कर रही थी।
रवि उसे हमेशा प्रोत्साहित करता था —
“बेटा, जिंदगी में आगे बढ़, पर अपनी मम्मी की तरह दिल का साफ रखना।”

सिया ने माँ की चिट्ठी को अपने कमरे की दीवार पर लगा रखा था।
हर बार जब वो कोई फैसला लेती, पहले उस चिट्ठी को पढ़ती, जैसे किसी सलाह की तरह।


एक दिन रवि को तेज़ बुखार आया।
सिया उसके पास बैठी थी, माथा सहला रही थी।
रवि ने धीमे से कहा, “बेटा, अगर कभी मैं भी…”
सिया ने झट से बीच में कहा, “नहीं पापा! आप कुछ मत कहिए। मम्मी के बाद अब आपको खोने की बात भी नहीं सोच सकती।”

रवि मुस्कुराए, “अरे पगली, मैं बस इतना कह रहा था कि अगर कभी मैं थक जाऊं… तो तू मुझे वही चिट्ठी सुना देना। उसमे तेरी माँ का हौसला है, और मेरी ज़िंदगी भी।”


समय ने करवट ली।
सिया अब कॉलेज में थी — आत्मनिर्भर, आत्मविश्वासी और संवेदनशील लड़की।
वो हर सुबह अपने कमरे की दीवार पर लगी मम्मी की चिट्ठी को एक बार जरूर पढ़ती।
उसे लगता कि माँ उससे बातें कर रही हैं।

एक दिन कॉलेज से लौटते वक्त उसे किसी कार्यक्रम में स्पीच देनी थी — विषय था “माँ – एक अनकहा रिश्ता”
उसने माइक पकड़ा और बोली —

“माँ वो नहीं होती जो सिर्फ हमारे साथ रहती है, माँ वो होती है जो हमें खुद में बसा जाती है।
मेरी माँ नहीं हैं… लेकिन वो हर उस पल में हैं जब मैं मुस्कुराती हूँ, रोती हूँ, या किसी की मदद करती हूँ।
उन्होंने मेरे लिए एक चिट्ठी छोड़ी थी — उस चिट्ठी ने मुझे माँ से ज़्यादा माँ बना दिया।
आज मैं जो भी हूँ, उनकी उस चिट्ठी की वजह से हूँ।”

पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा।
रवि पीछे की सीट पर बैठा था — आँखों में आँसू और चेहरे पर गर्व का समंदर।


रात को घर लौटकर सिया बोली,
“पापा, आज मैंने मम्मी की चिट्ठी सबको सुनाई। सब रो पड़े।”
रवि ने मुस्कुराते हुए कहा, “तेरी मम्मी भी आज बहुत खुश होगी, बेटा।”
सिया ने हँसते हुए कहा, “पापा, अब मेरी बारी है। मैं मम्मी के लिए एक नई चिट्ठी लिखूँगी।”

उसने कागज उठाया और लिखा —


“प्रिय मम्मी,

अब आपकी सिया बड़ी हो गई है।
पापा का ख्याल रखती हूँ, जैसे आप रखती थीं।
आपका तारा रोज़ रात चमकता है, और जब मैं मुस्कुराती हूँ तो लगता है आप पास ही हैं।

मम्मी, आपने कहा था कि दुनिया बड़ी है, डरना नहीं।
मैं अब डरती नहीं। क्योंकि आपके प्यार ने मुझे मज़बूत बना दिया।

और हाँ, अब आपकी दी हुई रिबन मैं अपने बालों में नहीं बाँधती —
क्योंकि अब वो मेरे दिल में बंध गई है।

आपकी सिया।”


रवि ने वह चिट्ठी पढ़ी और सिया को गले लगा लिया।
“बेटा, अब तू नहीं रोएगी, समझी? तेरी मम्मी को आँसू पसंद नहीं हैं।”

सिया मुस्कुराई, “नहीं पापा, अब मैं सिर्फ मुस्कुराऊँगी — ताकि मम्मी का तारा और चमक उठे।”


उस रात जब रवि और सिया छत पर बैठे थे, आसमान में एक तारा बहुत तेज़ चमक रहा था।
सिया ने कहा, “पापा, देखिए ना, मम्मी मुस्कुरा रही हैं।”
रवि ने कहा, “हाँ बेटा, और शायद कह रही हैं — अब मेरी बिटिया मेरी तरह मजबूत हो गई है।”

हवा हल्की चली, जैसे किसी ने दोनों को गले लगा लिया हो।
और आसमान में वह तारा — पहले से कहीं ज़्यादा चमक रहा था।


कहानी का सार:
माँ कभी जाती नहीं, वो बस एक रूप से दूसरे रूप में बदल जाती है —
बच्चों के दिल की आवाज़ बनकर, उनकी सांसों में बसकर।
और पिता वो पुल होते हैं, जो उस याद को कभी टूटने नहीं देते।

क्योंकि कुछ रिश्ते शरीर से नहीं, आत्मा से जुड़े होते हैं।

– समाप्त –


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