आज सुबह से ही मीना का मूड कुछ उखड़ा-उखड़ा था। वो बिना किसी से कुछ कहे रसोई में गई, जल्दी-जल्दी अपना टिफ़िन बनाया और ऑफिस के लिए निकल गई।
न माँ से कुछ कहा, न भाभियों से। यहाँ तक कि जाते वक्त "चलती हूँ" तक नहीं बोली।
घर में सबको अजीब लगा।
दोनों भाभियाँ—रीता और कविता—जो आमतौर पर मीना के साथ अच्छा व्यवहार करती थीं, आज उसकी चुप्पी से हैरान थीं। लेकिन हैरानी ज़्यादा देर टिकती कहाँ है, जल्द ही कानाफूसी का दौर शुरू हो गया।
रीता बोली, “क्या बात है बहनजी की? कल तक तो हँस-हँस के बात कर रही थी, आज सुबह से जैसे कोई तुफ़ान आ गया हो।”
कविता ने मुस्कुराते हुए कहा, “लगता है किसी से झगड़ा हुआ होगा। ऑफिस में या फिर किसी खास से।”
उनकी बातें जब निर्मला देवी के कानों तक पहुँचीं तो उन्हें बुरा लगा।
वो बोलीं, “तुम दोनों बेकार की बातें मत करो। मीना का ऑफिस में बहुत काम बढ़ गया है। सुना है, वहाँ के दो लोग छुट्टी पर हैं। सुबह-सुबह जल्दी निकल गई होगी, इसलिए मूड थोड़ा खराब होगा। अब इतना तो चलता है।”
उन्होंने बात तो संभाल ली, पर उनके मन में भी सवाल उठ रहे थे — क्या सच में यही वजह है?
मीना ऐसी नहीं थी। वो अपनी हर बात माँ से साझा करती थी। फिर आज बिना कुछ कहे चली गई — ये बात उनके दिल में जैसे अटक सी गई।
निर्मला देवी ने सोचा, “शाम को लौटेगी तो बैठकर धीरे से पूछूँगी। जो भी बात होगी, मिलकर सुलझा लेंगे।”
वो मन ही मन यही सोचकर मंदिर की ओर चली गईं।
दूसरी ओर मीना ऑफिस पहुँची तो मन भारी था।
कंप्यूटर स्क्रीन के सामने बैठी रही, लेकिन ध्यान कहीं और था।
फाइलें खुली पड़ी थीं, ईमेल आते जा रहे थे, पर मीना का मन किसी काम में नहीं लग रहा था।
वो बस एक ही बात सोच रही थी — क्यों उसके साथ हमेशा ऐसा होता है? क्यों उसे हर बार अपनी सच्चाई साबित करनी पड़ती है?
तभी पीछे से किसी ने हँसते हुए कहा, “हेलो मिस सीरियस! आज सूरज किस दिशा से उगा?”
मीना चौंककर पीछे मुड़ी — उसकी सहेली निशा थी।
निशा ने हँसते हुए उसकी आँखों में देखा, “क्यों रे, क्या हुआ? आज इतनी उदास क्यों है?”
मीना ने बस हल्की सी मुस्कान दी, “कुछ नहीं, बस सिर दर्द है।”
निशा ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया, “मीना, मुझे झूठ मत बोल। तू जितनी अच्छी झूठ छिपाने में है, उतनी ही खराब झूठ बोलने में।”
मीना की आँखों में आँसू आ गए। उसने नजरें झुका लीं।
कुछ पल की चुप्पी के बाद बोली, “निशा… कल रात घर में बहुत बड़ी बात हो गई।”
निशा थोड़ी गंभीर हो गई, “क्या हुआ?”
मीना बोली, “माँ ने कल मुझसे कहा कि अब मेरी शादी करनी चाहिए। उन्होंने किसी रिश्तेदार के लड़के का रिश्ता बताया। लड़का बैंक में नौकरी करता है, घर ठीक-ठाक है, लेकिन मैंने मना कर दिया।”
“क्यों?” निशा ने पूछा।
मीना बोली, “क्योंकि मैं उस शादी के लिए तैयार नहीं हूँ। मैं किसी से प्यार करती हूँ… लेकिन माँ को ये बात बताने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही हूँ।”
निशा ने चौंककर पूछा, “कौन है वो?”
मीना बोली, “हमारे ही ऑफिस में है, अजय। लेकिन अजय और मैं अलग जाति से हैं। वो मेरे से तीन साल छोटा भी है। माँ को ये बात कभी स्वीकार नहीं होगी। कल रात जब उन्होंने रिश्ता बताया तो मैं कुछ कह नहीं पाई, बस चुप रही। और माँ ने समझ लिया कि मुझे रिश्ता पसंद नहीं, इसलिए नाराज़ हो गईं। उन्होंने कहा, ‘मीना, अब और देर नहीं, मैं तेरे लिए रिश्ता तय कर रही हूँ।’ बस वहीं से मेरा मन टूट गया।”
मीना की आँखों से आँसू गिरने लगे।
निशा ने उसे पानी दिया और बोली, “तू डर क्यों रही है? अपनी माँ को सच बता दे। वो नाराज़ होंगी, लेकिन आखिर माँ हैं — तुझे समझेंगी ज़रूर।”
मीना बोली, “शायद नहीं निशा… माँ बहुत परंपरावादी हैं। उन्हें जाति-पाति की बातों से फर्क पड़ता है। वो मेरे फैसले को अपनी परवरिश की हार समझेंगी।”
निशा ने उसका हाथ थामा, “कभी-कभी हमें सही के लिए थोड़ा गलत लगने वाला कदम उठाना पड़ता है। अगर अजय तुझसे सच्चा प्यार करता है, तो उसे अपनी माँ से बात करने को कह। और अगर वो तेरा साथ देगा, तो सब ठीक हो जाएगा।”
शाम को जब मीना घर पहुँची, तो माँ पूजा के बाद आँगन में बैठी थीं।
उनकी नज़र मीना पर पड़ी, तो चेहरे पर चिंता साफ झलक रही थी।
उन्होंने धीरे से कहा, “आ गई बेटा… दिन भर कुछ खाया?”
मीना ने सिर हिला दिया, “नहीं माँ, ऑफिस में बहुत काम था।”
निर्मला देवी ने उसे पास बिठाया, “बेटा, अगर तुझे कल वाली बात पसंद नहीं आई तो बता दे। मैं किसी पर ज़बरदस्ती नहीं करूँगी। लेकिन अब तेरी उम्र भी निकल रही है, इसलिए मैं चिंता करती हूँ।”
मीना की आँखों में आँसू भर आए।
उसने कहा, “माँ, मैं आपकी चिंता समझती हूँ, लेकिन… एक बात कहनी है।”
निर्मला देवी ने उसका चेहरा देखा, “बोल बेटा, क्या बात है?”
मीना ने काँपते हुए कहा, “माँ, मैं किसी से प्यार करती हूँ। उसका नाम अजय है। वो हमारे ऑफिस में काम करता है।”
निर्मला देवी ने एकदम चौंककर पूछा, “क्या? अजय? कौन जाति का है वो?”
मीना ने धीमे स्वर में कहा, “माँ, वो ब्राह्मण नहीं है… पर बहुत अच्छा इंसान है। आपकी इज़्ज़त करेगा, मेरा ख्याल रखेगा।”
निर्मला देवी का चेहरा उतर गया।
कुछ पल के लिए घर में सन्नाटा छा गया। फिर उन्होंने भारी आवाज़ में कहा, “मीना, मैंने तुझे हमेशा अपनी मर्ज़ी से जीने दिया, लेकिन इस बात पर मैं चुप नहीं रह सकती। समाज क्या कहेगा? रिश्तेदार क्या सोचेंगे?”
मीना ने पहली बार अपनी माँ की आँखों में सीधे देखा और कहा, “माँ, समाज तो तब भी कुछ न कुछ कहेगा जब मैं किसी अनजान व्यक्ति से शादी करूँगी और दुख पाऊँगी। मैं किसी की सोच के लिए अपनी खुशी कुर्बान नहीं कर सकती। अगर आप नहीं चाहेंगी, तो मैं शादी नहीं करूँगी, पर झूठ नहीं बोलूँगी।”
निर्मला देवी ने मीना की आँखों में सच्चाई देखी — वो वही लड़की थी जिसने हमेशा घर की इज़्ज़त रखी, सबकी मदद की।
उनका दिल पिघल गया।
उन्होंने धीरे से मीना का सिर अपने सीने से लगा लिया, “बेटा, तू अगर खुश है तो मैं भी खुश हूँ। बस अजय को एक बार घर लेकर आना। मैं देखना चाहती हूँ कि तू जिस पर इतना भरोसा करती है, वो वाकई उसके लायक है या नहीं।”
मीना के चेहरे पर महीनों बाद मुस्कान लौट आई।
अगले रविवार को अजय घर आया। सादा कपड़ों में, विनम्र मुस्कान के साथ। उसने नमस्ते की और निर्मला देवी के पैर छुए।
निर्मला देवी ने उसे गौर से देखा — और शायद उसी पल समझ गईं कि उनकी बेटी का चुनाव गलत नहीं है।
शाम तक बातचीत का माहौल सहज हो गया।
निर्मला देवी ने मीना से कहा, “तूने सही कहा था बेटा, इतिहास तब बदलता है जब हथियार बदलते हैं… और सोच भी।”
मीना की आँखों में कृतज्ञता और राहत दोनों थीं।
उस दिन मीना का मौन टूटा — और साथ ही एक माँ की सोच की सीमाएँ भी।
समाप्त।
मूल लेखिका : शनाया अहम
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