केक

 आज नई मेमसाब के बेटे का पाँचवां जन्मदिन है। शाम में बहुत सारे मेहमान आएंगे। मुझे भी बुलाया है मेरी आठ साल की बिटिया को लेकर। माना काम आज थोड़ा ज्यादा होगा पर बिटिया को नहीं बुलाना चाहिए था मेमसाब को। आज उसका भी तो जन्मदिन है। पर मना नहीं कर सकती मैं।नया काम पकड़ा है यहां मैंने। मेहमानों को पानी या छोटा मोटा काम तो कर ही सकती है। वैसे भी हम गरीबों को अपने मन को मारना बचपन से आना चाहिए तभी हम जी सकते हैं। मैं बिटिया को लेकर साहब के यहाँ निकल ली

"माँ! आज तूने वो आटे वाला हलवा भी नहीं बनाया"  उसकी बात सुनकर मेरे दिल की तकलीफ बढ़ गई। कुछ भी तो माँगती नहीं है ये मुझसे। मुझे हलवा बनाकर आना चाहिए था।

"आज साहब के घर भी पार्टी है ना, कुछ अच्छा खाने को मिलेगा ही, नहीं मिला तो आकर बना दूँगी" साहब का घर आ चुका था। पूरा घर सजा हुआ है, बहुत सारे बच्चे और मेहमान हैं।

"माफ़ करना मेमसाब, थोड़ा लेट हो गई मैं, मुझे और बिटिया को काम बता दीजिए" मैंने बेटी की तरफ देख अनमने मन से पूछा

"मैंने आज काम करने के लिए नहीं बुलाया तुम्हें माया!..मेरी तरफ से ये नयी ड्रेस इसे पहना दो..आज इसका भी जन्मदिन है ना?"

"आपको कैसे मालूम.."

"तुम जब इसका फॉर्म मुझसे भरवा रही थी तो मैंने देख लिया था। मैंने सोचा दोनों का बर्थडे एकसाथ मना देते हैं..वहां देखो दो केक भी है"

मेरी बेटी मुझे खुशी से और मैं मेमसाब को आश्चर्य से देख रही थी

"ऐसे मत देखो..अलग से कुछ नहीं किया मैंने"

मेमसाब को लगता है उन्होंने अलग से कुछ नहीं किया पर मुझे पता है, हम गरीबों के साथ इतना अलग करने की कोई सोचता भी नहीं है..!

©️विनय कुमार मिश्रा


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